श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 32
अक्रूर के साथ कंस: कृष्ण-बलराम को मथुरा बुलाने भेजे गए अक्रूर
कंस ने स्वामिभक्त अक्रूर को वृंदावन भेजा ताकि वे कृष्ण और बलराम को यज्ञ के बहाने मथुरा ले आएँ। अक्रूर मन में श्रीकृष्ण के दर्शन की आस लिए चले और वृंदावन पहुँचकर उन्होंने नंद को कंस की असली योजना बता दी। पढ़ें पूरी कथा।

यज्ञ की तैयारियों के बाद कंस ने अपने विश्वासपात्र अक्रूर को वृंदावन भेजा, ताकि वे कृष्ण और बलराम को मथुरा ले आएँ। कंस की असली योजना जानते हुए भी अक्रूर का मन श्रीकृष्ण के दर्शन की आस से भरा हुआ था।
कंस ने अक्रूर को बुलाया
मंत्रियों के जाने के बाद कंस ने अक्रूर को बुला भेजा। अक्रूर एक प्रमुख यादव सरदार थे और कंस को उनकी स्वामिभक्ति पर बहुत विश्वास था। यद्यपि अक्रूर कंस के दरबार में काम करते थे, लेकिन हृदय से वे बड़े ही सज्जन प्रकृति के व्यक्ति थे। यही कारण था कि सभी लोग उनका आदर करते थे। अक्रूर को एक आसन पर बिठाकर कंस ने कहा, ‘‘अक्रूर, तुमने सदा मेरे प्रति स्वामिभक्ति का परिचय दिया है। मैं भी सदा तुम्हारी भावनाओं का आदर करता हूँ। जब भी मैं किसी समस्या में होता हूँ, मुझे तुम्हारी ही याद आती है।’’ ‘‘मुझे आदेश दीजिए, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?’’ अक्रूर ने कंस से पूछा।
कंस की योजना: कृष्ण-बलराम को वृंदावन से लाना
‘‘वृंदावन जाकर कृष्ण और बलराम को मथुरा में आयोजित होने वाले यज्ञ में सम्मिलित होने का आमंत्रण दो। तुम्हें उन्हें अपने साथ ही लेकर आना है। जब वे यहाँ आ जाएँगे तो उन्हें कुवलयापीड अपने भारी पैरों के नीचे कुचलकर मार डालेगा। अगर किसी प्रकार वे कुवलयापीड से बच भी गए तो मेरे पहलवान उसे मौत के घाट उतार देंगे।’’ अक्रूर कंस की बात ध्यान से सुन रहे थे। कंस आगे बोला, ‘‘उसके बाद मैं नंद और वृंदावन के सारे निवासियों को मथुरा बुलाकर मार डालूँगा। तत्पश्चात् जरासंध की सहायता से मैं पूरी पृथ्वी पर अधिकार कर लूँगा।’’
अक्रूर का प्रश्न और कंस का कठोर उत्तर
‘‘अपराध क्षमा हो, महाराज,’’ अक्रूर बोला, ‘‘क्या एक साथ इतने लोगों की हत्या उचित होगी?’’ ‘‘मत भूलो, अक्रूर, कि तुम एक सेवक हो और तुम्हारा कार्य स्वामी की आज्ञा का पालन करना है। तुम उतना ही करो, जितना तुमसे कहा जाए।’’ कंस ने अक्रूर से कठोर आवाज में कहा। ‘‘आपकी आज्ञा का पालन करना मेरा धर्म है, महाराज। मैं कल प्रातःकाल ही रथ लेकर वृंदावन चला जाऊँगा।’’ अक्रूर ने कंस से कहा।
वृंदावन की ओर यात्रा और अक्रूर की श्रीकृष्ण-दर्शन की आस
घर पहुँचकर अक्रूर ने अपने सेवकों से अगले दिन वृंदावन चलने के लिए रथ को तैयार रखने का आदेश दिया। सुबह ही वह उस रथ पर सवार होकर वृंदावन की ओर चल पड़े। मार्ग में वह सोच रहे थे, ‘मैं कितने ही दिनों से श्रीकृष्ण के दर्शन करने की सोच रहा था। नियति ने आज मुझे उनके दर्शन करने का सौभाग्य दे ही दिया। यह सौभाग्य विरलों को ही मिलता है। अवश्य ही मैंने अपने पिछले जन्म में कुछ पुण्य किए होंगे, जिनके कारण आज मुझे श्रीकृष्ण और उनके भ्राता बलराम को देखने का अवसर मिला है।’
नंद के घर पहुँचे अक्रूर, कृष्ण के चरणों में गिरे
वृंदावन पहुँचकर अक्रूर सीधे नंद के घर गए। उस समय कृष्ण और बलराम अपने घर के बाहर ही खेल रहे थे। उन्हें देखते ही अक्रूर अपने स्वामी को पहचान गए। वे रथ से कूद पड़े और दौड़कर उनके चरणों में गिर गए। कृष्ण और बलराम, दोनों ने ही उनका स्वागत किया और उन्हें घर के अंदर ले गए। नंद अक्रूर से प्रेमपूर्वक गले मिले और उन्हें आसन पर बैठाया। फिर उन्होंने अक्रूर से पूछा, ‘‘हमारे महाराज कंस कैसे हैं? मथुरा में सब कुछ कुशल है न?’’
अक्रूर ने बताया कंस की असली योजना
अक्रूर ने उत्तर दिया, ‘‘मथुरा में महाराज कंस तो कुशल हैं, लेकिन वे आपकी अकुशलता चाहते हैं। कृष्ण के जन्म के पीछे जो रहस्य है, वह उन्हें भली भाँति ज्ञात है। अतः वे येन-केन-प्रकारेण कृष्ण का जीवन समाप्त कर देना चाहते हैं। बलराम से भी वे बैर रखते हैं। उन्होंने मथुरा में एक यज्ञ का आयोजन किया है। उन्होंने कृष्ण और बलराम के नाम यज्ञ में भाग लेने का निमंत्रण लेकर मुझे भेजा है, ताकि मैं उन्हें अपने साथ ही मथुरा ले आऊँ। लेकिन वास्तव में उनका उद्देश्य दोनों भाइयों की हत्या करना है।’’
नंद का पितृ-हृदय और मथुरा जाने की तैयारी
नंद भी जानते थे कि कंस और कृष्ण की भेंट को टाला नहीं जा सकता। फिर भी उनका पितृ-हृदय उन्हें व्याकुल बना रहा था। उन्होंने स्नेहभरी दृष्टि से दोनों भाइयों को निहारा। फिर भारी आवाज में बोले, ‘‘बच्चों, तुम लोग मथुरा जाने के लिए तैयार हो जाओ। मैं गोपों से महाराज कंस के लिए उपहारों की व्यवस्था करने को कहता हूँ।’’
भक्ति से जुड़ा संदेश: अक्रूर की भक्ति और दर्शन की आस
इस कथा में अक्रूर का चरित्र भक्ति का सुंदर उदाहरण है। वे कंस के दरबार में सेवक थे, पर हृदय से सज्जन और श्रीकृष्ण के भक्त थे। मार्ग में उनके मन में बस यही भाव था कि नियति ने उन्हें श्रीकृष्ण के दर्शन का सौभाग्य दिया है।
जैसे ही उन्होंने कृष्ण को देखा, वे रथ से कूदकर उनके चरणों में गिर पड़े। सच्चे भक्त के लिए भगवान का दर्शन ही सबसे बड़ी पूँजी है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि अक्रूर ने कंस की योजना नंद को सच-सच बता दी। भक्ति हृदय को सत्य और सज्जनता से जोड़ती है, चाहे परिस्थिति कैसी भी हो।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पहली सीख यह है कि सज्जनता और सत्य का साथ कठिन परिस्थिति में भी नहीं छोड़ना चाहिए। अक्रूर ने कंस के दरबार में रहते हुए भी नंद के सामने कंस की असली योजना रख दी।
दूसरी सीख यह है कि अनुचित कार्य पर विनम्रता से प्रश्न उठाना चाहिए। अक्रूर ने कंस से पूछा कि क्या एक साथ इतने लोगों की हत्या उचित होगी।
तीसरी सीख यह है कि भगवान के दर्शन का अवसर बड़े सौभाग्य से मिलता है, और उसे पाने की आस मन में रखनी चाहिए। अक्रूर पूरे मार्ग में श्रीकृष्ण के दर्शन के सौभाग्य के बारे में ही सोचते रहे।
चौथी सीख यह है कि अत्याचारी अपने क्रूर इरादों से अपने ही विश्वासपात्रों को भी धर्म-संकट में डाल देता है। कंस की आज्ञा और अक्रूर के धर्म के बीच की यह उलझन इसी का उदाहरण है।
कथा का सार
अक्रूर कंस का आदेश लेकर वृंदावन पहुँचे और कृष्ण-बलराम को मथुरा ले जाने की तैयारी शुरू हो गई। यह कथा सिखाती है कि भक्त का हृदय सत्य और सज्जनता से जुड़ा रहता है और भगवान के दर्शन की आस उसके हर कदम को पवित्र बना देती है। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।