श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 18
अघासुर वध: वनभोज के दिन अजगर बने राक्षस का अंत
वनभोज के लिए निकले ग्वालबालों के मार्ग में अघासुर विशाल अजगर बनकर लेट गया। गोप उसे गुफा समझकर उसके मुँह में चले गए, पर कृष्ण ने अपने शरीर का विस्तार करके उसका अंत कर दिया और सबकी जान बचाई। पढ़ें पूरी कथा।

अब ग्वालबाल निर्भय होकर चरागाहों में घूमते थे, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि जब तक कृष्ण साथ हैं, कोई भय नहीं। उसी विश्वास के साथ एक दिन वे वनभोज के लिए निकले, पर उन्हें पता नहीं था कि जंगल में एक बड़ा खतरा उनकी प्रतीक्षा कर रहा है।
निर्भय गोप और वनभोज की योजना
अब गोप निश्चिंत होकर निर्भयता के साथ चरागाहों में घूमते थे। वे जानते थे कि जब तक कृष्ण उनके साथ हैं, उन्हें किसी तरह का डर नहीं है। एक दिन कृष्ण ने वनभोज का आयोजन करने का निश्चय किया और मित्रों से कहा कि हमें वनभोज करना चाहिए, इसमें खूब आनंद आएगा।
गोपों ने उनकी योजना तुरंत मान ली और अपनी माताओं से वनभोज के लिए स्वादिष्ट पकवान तैयार करने को कह दिया। गोपियों ने वे सभी पकवान बनाए जो विशेषकर कृष्ण को पसंद थे और अपने पुत्रों को सौंप दिए। सारे गोप उछलते-कूदते और हँसी-मजाक करते वनभोज के लिए निकल पड़े। उन्हें पता नहीं था कि जंगल में एक खतरा उनका इंतजार कर रहा है।
अघासुर का विशाल अजगर रूप
व्योमासुर की मृत्यु के बाद कंस ने उसके छोटे भाई अघासुर को अपने भाई की मौत का बदला लेने के लिए प्रेरित किया। अघासुर वृंदावन के जंगलों में जा पहुँचा। एक विशाल अजगर का रूप धारण करके वह ग्वालबालों के मार्ग पर लेट गया।
उसने अपने जबड़े इतने फैला रखे थे कि ऊपरी जबड़ा बादलों को छू रहा था और उसका शरीर तीन मील लंबा था। जिस मार्ग से ग्वालबालों को गुजरना था, वह उसी पर उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। अजगर को देखकर ग्वालबालों ने उसे एक विशाल गुफा समझ लिया। उन्हें यह ख्याल तक नहीं आया कि वह कोई गुफा नहीं, अजगर है। वे बस यही सोच रहे थे कि इतने दिनों से रोज जंगल में आने के बावजूद उनकी नजर इस गुफा पर अब तक क्यों नहीं पड़ी।
अजगर के मुँह में गोप
अजगर के मुँह में पहुँचकर एक लड़के ने उसके मुँह का अंदरूनी कोमल हिस्सा स्पर्श किया और साथियों से कहा कि उसे यह गुफा नहीं लगती, क्योंकि गुफा की दीवारें इतनी कोमल नहीं हो सकतीं, चट्टानें तो कठोर होती हैं। दूसरे गोप ने चिल्लाकर कहा कि उसे तो यह कोई साँप लगता है, इसके दाँत तो देखो!
पहले गोप ने कहा कि चलो पता करते हैं कि यह क्या है, जब तक कृष्ण साथ हैं, किस बात का भय? दूसरे ने सहमति में सिर हिलाया, और सभी लड़के अजगर के रक्तिम नम मुँह में प्रवेश कर गए।
कृष्ण, जो गोपों में सबसे पीछे चल रहे थे, खतरा भाँप गए। उन्होंने चिल्लाकर मित्रों से अजगर के मुँह में प्रवेश न करने को कहा, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अधिकतर गोप अजगर के भयानक मुँह में प्रवेश कर चुके थे।
कृष्ण का शरीर विस्तार
अघासुर ने अभी तक मुँह बंद नहीं किया था। दरअसल वह कृष्ण के भी मुँह के अंदर आने की प्रतीक्षा कर रहा था, क्योंकि वह वहाँ आया ही उन्हें मारने था। वह सोच रहा था कि यह ग्वाला मेरे मुँह में आए तो सही, मैं इसे इसके साथियों सहित पीसकर रख दूँगा और इन्हें तड़पने का मौका तक नहीं मिलेगा।
कृष्ण को भला क्या भय था? वे आराम से चलते हुए अजगर के मुँह में प्रवेश कर गए, पर इससे पहले कि वह मुँह बंद कर पाता, वे उसके गले में पहुँचकर अपने शरीर का विस्तार करने लगे। इसका परिणाम यह हुआ कि अजगर के लिए साँस लेना दूभर हो गया। जो कृष्ण और उनके साथियों के प्राण लेने आया था, उसे अपने ही प्राण हलक में अटके लगने लगे और वह साँस के लिए छटपटाने लगा।
अघासुर का अंत और देवताओं की पुष्पवर्षा
कृष्ण ने साथियों से मौके का फायदा उठाकर अजगर के मुँह से निकल जाने को कहा। सारे गोप तेजी से बाहर निकल भागे। अब कृष्ण ने अपने शरीर को और भी बढ़ाना शुरू किया। अंत में अजगर साँस लेने के लिए छटपटाता हुआ मर गया।
कंस के एक और शक्तिशाली राक्षस के इस तरह मारे जाने पर देवता अत्यंत प्रसन्न हुए और कृष्ण पर पुष्पवर्षा करने लगे। गोपों ने भी जीवन बचाने के लिए उन्हें धन्यवाद दिया। उधर कंस अपने महल में बौखलाया हुआ घूम रहा था और फिर कृष्ण को मारने की नई योजना बनाने में व्यस्त हो गया।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पहली सीख यह है कि जो ईश्वर पर विश्वास रखता है, उसे हर संकट में उनका साथ मिलता है। ग्वालबालों को पूरा भरोसा था कि कृष्ण साथ हैं तो कोई भय नहीं, और अंत में यही भरोसा उनके प्राणों की रक्षा का कारण बना।
दूसरी सीख यह है कि बिना सोचे-समझे आगे बढ़ जाना खतरनाक हो सकता है। गोपों ने अजगर को गुफा समझ लिया और संकेत मिलने पर भी जाँच के बजाय मुँह में प्रवेश कर गए। सावधानी और विवेक भी विश्वास के साथ जरूरी हैं।
तीसरी सीख यह है कि जो दूसरों के प्राण लेने के लिए जाल बिछाता है, वह स्वयं उसी में फँस जाता है। अघासुर कृष्ण को मारने आया था, पर कृष्ण के विस्तार से वही साँस लेने को तरस गया।
कथा का सार
अघासुर के अंत के साथ कंस का एक और प्रयास विफल हुआ, पर वह अब भी कृष्ण को मारने की नई योजना बनाने में लगा था। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।