ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 1
श्रीनन्दकिशोरदास गोस्वामी प्रभु की कथा
विनम्रता, गुरु-निष्ठा और श्रीनन्दलाल की दिव्य लीलाओं से जुड़ी श्रीनन्दकिशोरदास गोस्वामी प्रभु की अद्भुत भक्तिमय कथा।

क्या कोई ऐसा भी हो सकता है, जिसे संसार से मिलने वाला सम्मान अच्छा न लगे और जो केवल एक सच्चे वैष्णव के चरणों में बैठकर भजन सीखना चाहता हो? श्रीनन्दकिशोरदास गोस्वामी प्रभु की यह कथा हमें ऐसे ही महान भक्त के जीवन से परिचित कराती है। इसमें गुरु-निष्ठा, विनम्रता, ब्रज की सरलता और भगवान की अद्भुत दिव्य लीला का भावपूर्ण वर्णन है।
श्रीनन्दकिशोरदास गोस्वामी प्रभु की कथा
श्रीनन्दकिशोरदास गोस्वामी प्रभु की कथा
बंगाल के बाँकुड़ा जिले में श्रीनन्दकिशोरदास गोस्वामी प्रभु रहते थे। वे श्रीश्री नित्यानन्द प्रभु के वंशज थे। नित्यानन्द प्रभु के वंशज होने के कारण वैष्णव समाज में सभी लोग उनका बहुत सम्मान करते थे। छोटे-बड़े, गृहस्थ और त्यागी—सभी उन्हें पूज्य मानते थे।
भक्ति के मार्ग में बाहरी प्रतिष्ठा से कहीं अधिक महत्व हृदय की विनम्रता का होता है। श्रीनन्दकिशोरदास गोस्वामी प्रभु के जीवन में यह भाव विशेष रूप से दिखाई देता है।
लेकिन नन्दकिशोरदास जी के मन में हमेशा “तृणादपि सुनीचेन” अर्थात् स्वयं को सबसे छोटा और विनम्र मानने का भाव था। इसलिए लोगों का इतना सम्मान करना उन्हें अच्छा नहीं लगता था। उनके मन में बहुत इच्छा थी कि वे किसी महान वैष्णव के आश्रय में रहकर भजन की शिक्षा प्राप्त करें।
लेकिन समस्या यह थी कि वे स्वयं नित्यानन्द प्रभु के वंशज थे और वैष्णव समाज में पूज्य माने जाते थे। इसलिए कोई वैष्णव उन्हें अपना शिष्य मानकर भजन की शिक्षा देने के लिए सहज रूप से तैयार नहीं होता।
जिस सम्मान को पाने के लिए संसार के लोग प्रयास करते हैं, उसी सम्मान को श्रीनन्दकिशोरदास जी अपने भजन-मार्ग में बाधा के रूप में अनुभव कर रहे थे। उनके मन की अभिलाषा केवल इतनी थी कि उन्हें एक ऐसे गुरु का आश्रय मिले, जिनके मार्गदर्शन में वे निष्ठापूर्वक साधना कर सकें।
इसी कारण नन्दकिशोरदास जी बिना किसी को बताए अपना घर छोड़कर वृन्दावन चले गए।
वृन्दावन की पावन भूमि उनके लिए भजन और साधना की आशा लेकर आई। उन्होंने अपने परिचय और प्रतिष्ठा को पीछे छोड़कर आध्यात्मिक जीवन की खोज को प्राथमिकता दी।
उस समय वृन्दावन में गौड़ीय वैष्णव समाज के महान आचार्य श्रीविश्वनाथ चक्रवर्तीपाद रहते थे। नन्दकिशोरदास जी ने भी उनके सामने अपनी असली पहचान नहीं बताई। उन्होंने उनसे भजन की शिक्षा और शास्त्रों का अध्ययन कराने की प्रार्थना की।
विश्वनाथ चक्रवर्तीपाद ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। नन्दकिशोरदास जी कुछ समय तक उनके आश्रय में रहकर भजन और शास्त्रों का अध्ययन करते रहे। किसी को भी पता नहीं था कि वे नित्यानन्द प्रभु के वंशज हैं।
उनके लिए यह समय केवल शास्त्रों का अध्ययन करने का नहीं, बल्कि अपने जीवन को भक्ति और विनम्रता के अनुरूप ढालने का अवसर भी था।
माता की चिंता और गुरु की आज्ञा
इधर, उनके अचानक घर छोड़कर चले जाने से उनकी माँ बहुत दुखी थीं। उन्होंने उन्हें खोजने के लिए कई वैष्णवों को अलग-अलग जगह भेजा। खोजते-खोजते एक वैष्णव वृन्दावन पहुँचा और विश्वनाथ चक्रवर्तीपाद के पास गया।
एक ओर नन्दकिशोरदास जी वृन्दावन में भजन और शास्त्रों के अध्ययन में लगे थे, वहीं दूसरी ओर उनकी माँ अपने पुत्र की चिंता में व्याकुल थीं।
उसने चक्रवर्तीपाद को नन्दकिशोरदास जी की वास्तविक पहचान बताई और उनकी माँ की पीड़ा के बारे में बताया। उसने उनसे अनुरोध किया कि वे नन्दकिशोरदास जी को घर वापस जाने और अपनी माँ की इच्छा के अनुसार विवाह करने की आज्ञा दें।
विश्वनाथ चक्रवर्तीपाद ने नन्दकिशोरदास जी को बुलाकर कहा कि वे अपनी गुरु-दक्षिणा के रूप में अब घर लौट जाएँ और अपनी माँ की इच्छा के अनुसार विवाह करें।
नन्दकिशोरदास जी ने गुरु की आज्ञा स्वीकार की। वे घर लौटे, विवाह किया और एक पुत्र को जन्म दिया। इसके बाद वे फिर से गृहस्थ जीवन छोड़कर वृन्दावन चले गए।
गुरु की आज्ञा का पालन उनके लिए व्यक्तिगत इच्छा से अधिक महत्वपूर्ण था। उन्होंने अपने गुरु के निर्देश को स्वीकार किया और उसके अनुसार अपना कर्तव्य पूरा किया।
वृन्दावन में भोंदू से भेंट
वृन्दावन में रहते हुए वे भजन और साधना में लगे रहे। इसी दौरान उनकी भेंट एक भोले-भाले ब्रजवासी बालक भोंदू से हुई। भोंदू श्रीपाद की गायों की देखभाल करता था और उन्हें चराने के लिए भांडीरवन ले जाता था।
ब्रज की भूमि में गायों की घंटियों की मधुर ध्वनि, वन की हरियाली और यमुना के आसपास का शांत वातावरण इस कथा की पृष्ठभूमि को और भी मनमोहक बना देता है।
भोंदू बहुत सीधा-सादा बालक था। उसे श्रीपाद से बहुत प्रेम था। वह रोज़ उनके पास आता और बालभोग का प्रसाद पाकर उनकी गायों को चराने के लिए जमुनापार भांडीरवन चला जाता।
उसे पता चला कि भांडीरवन में एक बालक नन्दलाल भी गायें चराता है। भोंदू के मन में इच्छा हुई कि वह नन्दलाल से मित्रता करे और उसके साथ खेले।
एक दिन दोनों की भेंट हो गई और जल्दी ही उनकी मित्रता हो गई। भोंदू जब भी भांडीरवन जाता, अपने साथ खाने-पीने की सामग्री लेकर जाता। नन्दलाल और उनके ग्वाल-बाल साथी उसके साथ खाते, खेलते और नाचते-कूदते।
भोंदू के लिए नन्दलाल एक प्रिय मित्र थे। वह उनके साथ समय बिताने और भोजन बाँटने में आनंद अनुभव करता था। उसकी सरलता में किसी प्रकार का दिखावा नहीं था।
नन्दलाल के बारे में श्रीपाद की जिज्ञासा
कुछ दिनों तक यह सब चलता रहा। एक दिन श्रीपाद ने भोंदू को सिर पर सामान लेकर जाते हुए देखा। उन्होंने पूछा कि वह क्या लेकर जा रहा है।
भोंदू ने बताया कि वह दाल-बाटी लेकर जा रहा है, जिसे वह नन्दलाल और अपने ग्वाल-बाल साथियों के साथ मिलकर बनाता है।
श्रीपाद ने पूछा कि यह नन्दलाल कौन है।
भोंदू ने बताया कि वह वही बालक है जो भांडीरवन में गायें चराता है। उसके सिर पर मोर-मुकुट है, कानों में कुण्डल हैं और गले में वनमाला है। वह बहुत सुंदर और मनमोहक है।
भोंदू के वर्णन में मोर-मुकुट, कुण्डल और वनमाला से सुसज्जित एक मनमोहक बालक की छवि उभरती है। उसके लिए यह अपने मित्र के रूप का सहज वर्णन था, लेकिन श्रीपाद के लिए यह बात विशेष महत्व रखती थी।
श्रीपाद भोंदू की बातें सुनकर आश्चर्यचकित हो गए। उन्हें भोंदू की बात पर विश्वास भी हुआ, क्योंकि वे जानते थे कि भोंदू झूठ नहीं बोलता।
उन्होंने भोंदू से कहा कि एक दिन नन्दलाल और उसके साथियों को अपने यहाँ दाल-बाटी के निमंत्रण पर लेकर आए।
भोंदू बहुत खुश हुआ। उसे लगा कि जब वह नन्दलाल को श्रीपाद के निमंत्रण के बारे में बताएगा तो नन्दलाल भी बहुत प्रसन्न होगा।
श्रीपाद के मन में अब उस बालक से मिलने की उत्सुकता जाग चुकी थी। उन्होंने भोंदू के माध्यम से नन्दलाल और उनके साथियों को भोजन का निमंत्रण दिया।
भोंदू का रूठना और नन्दलाल का प्रेम
लेकिन जब भोंदू ने नन्दलाल से निमंत्रण की बात कही, तो नन्दलाल ने वहाँ जाने से मना कर दिया। भोंदू को बहुत बुरा लगा। उसने कहा कि उसने श्रीपाद से कह दिया है कि वह नन्दलाल को लेकर आएगा।
नन्दलाल ने फिर भी जाने से मना कर दिया। इससे भोंदू को क्रोध आ गया। वह अपनी गायों को अलग करके वहाँ से जाने लगा। वह नन्दलाल से बिना कुछ कहे आगे बढ़ गया, जैसे उसने मन ही मन कह दिया हो कि अगर नन्दलाल को श्रीपाद से कोई काम नहीं, तो उसे भी नन्दलाल से कोई काम नहीं।
बालसुलभ मित्रता में कभी-कभी रूठना भी प्रेम का ही एक रूप बन जाता है। भोंदू अपने मित्र के व्यवहार से दुखी था और अपने वचन को पूरा न कर पाने की चिंता भी उसके मन में थी।
लेकिन भोंदू थोड़ी दूर ही गया था कि नन्दलाल ने उसे पुकार लिया।
नन्दलाल उसके पीछे दौड़कर आया और उसका रास्ता रोककर खड़ा हो गया। उसकी आवाज़ में विनय थी। उसकी आँखों में आँसू थे।
यह दृश्य भोंदू के लिए अप्रत्याशित था। जिस नन्दलाल से वह नाराज होकर जा रहा था, वही अब उसे रोकने के लिए स्वयं उसके पीछे दौड़कर आया था।
नन्दलाल ने कहा कि वह श्रीपाद के निमंत्रण को अस्वीकार नहीं करेगा। वह भोंदू के साथ श्रृंगारवट जाएगा। लेकिन उसने कहा कि वहाँ जाना उसके लिए आसान नहीं है, क्योंकि उसके साथ उसके सभी सखा भी हैं।
फिर नन्दलाल ने कहा कि यदि श्रीपाद स्वयं उनके लिए सामग्री लेकर आएँ और अपने हाथों से दाल-बाटी बनाएँ, तभी वे सब वहाँ जाकर दाल-बाटी खाएँगे।
नन्दलाल की यह बात सुनकर भोंदू के मन की नाराजगी दूर होने लगी। उसके लिए सबसे बड़ी खुशी यही थी कि उसका मित्र निमंत्रण स्वीकार करने को तैयार हो गया था।
भांडीरवन में दिव्य लीला के दर्शन
यह सुनकर भोंदू बहुत प्रसन्न हो गया। वह तुरंत श्रीपाद के पास गया और नन्दलाल की पूरी बात उन्हें बता दी।
अगले दिन श्रीपाद बहुत सारी सामग्री अपने सिर पर लेकर भांडीरवन पहुँचे। वहाँ उन्होंने राम-कृष्ण और ग्वाल-बालों के साथ उनकी क्रीड़ा और विनोद देखा और स्वयं को धन्य समझा।
वह क्षण श्रीपाद के लिए अत्यंत अद्भुत था। जिस लीला के बारे में उन्होंने भोंदू से सुना था, उसी लीला के दर्शन का अवसर उन्हें प्राप्त हुआ। भांडीरवन का वातावरण उनके लिए एक अविस्मरणीय आध्यात्मिक अनुभव बन गया।
कुछ समय बाद वह पूरी दिव्य लीला उनकी आँखों के सामने से अंतर्धान हो गई। श्रीपाद उसी भाव में मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े।
उस समय उन्हें आदेश मिला कि वे अधीर न हों, घर लौट जाएँ और भगवान की इन लीला-स्थलियों का वर्णन करें।
इस आदेश में उनके लिए एक महत्वपूर्ण कार्य निहित था। उन्हें अपने अनुभव को अपने तक सीमित नहीं रखना था, बल्कि भगवान की लीला-स्थलियों की महिमा का वर्णन करके उसे भक्तों तक पहुँचाना था।
श्रीपाद ने उस आदेश का पालन किया और आगे चलकर ‘श्रीवृन्दावन-लीलामृत’ तथा ‘श्रीश्रीरसकलिका’ नामक दो ग्रंथों की रचना की।
इस प्रकार उनकी साधना, गुरु-निष्ठा और दिव्य लीला का अनुभव उनके जीवन के महत्वपूर्ण प्रसंग बन गए। उनकी ग्रंथ-रचना ने इस कथा की परंपरा में एक विशेष स्थान प्राप्त किया।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
श्रीनन्दकिशोरदास गोस्वामी प्रभु की कथा हमें सिखाती है कि सच्ची विनम्रता केवल शब्दों में नहीं, बल्कि आचरण में दिखाई देती है।
गुरु की आज्ञा का सम्मान करना, अपने कर्तव्य को स्वीकार करना और प्रतिष्ठा के मोह से दूर रहना भक्ति-मार्ग के महत्वपूर्ण गुण हैं।
भोंदू और नन्दलाल का प्रसंग यह भी दर्शाता है कि सरल हृदय, निष्कपट प्रेम और सहज मित्रता किसी व्यक्ति के जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
यह कथा हमें याद दिलाती है कि भक्ति में सेवा, विनम्रता और गुरु-निष्ठा का स्थान बहुत ऊँचा है।
कथा का सार
श्रीनन्दकिशोरदास गोस्वामी प्रभु की यह कथा विनम्रता, गुरु-निष्ठा, ब्रज की सरलता और भगवान की दिव्य लीलाओं के प्रति श्रद्धा का संदेश देती है। भोंदू और नन्दलाल का प्रसंग कथा को भावपूर्ण बनाता है, जबकि श्रीपाद के दिव्य अनुभव और ग्रंथ-रचना इसके आध्यात्मिक पक्ष को सामने लाते हैं। ऐसी ही भक्तिमय कथाओं के माध्यम से भक्ति, सेवा और सदाचार के महत्व को समझा जा सकता है।