ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 5

श्री कृष्णदास बाबा जी (रनवारी) की अलौकिक कथा

रनवारी के सिद्ध श्री कृष्णदास बाबा के त्याग, ब्रज-निष्ठा, विरह-अग्नि से देह विलय और उनके वरदान की मार्मिक और प्रेरणादायक कथा।

श्री कृष्णदास बाबा जी (रनवारी) की अलौकिक कथा
श्री कृष्णदास बाबा जी (रनवारी) की अलौकिक कथा — ब्रज के भक्त भाग 1

ब्रजधाम की अनन्य निष्ठा और सेवा में तन्मय रहने वाले साधक के जीवन में बाह्य परंपराओं का अतिक्रमण किस प्रकार आंतरिक पश्चाताप और विरह की पराकाष्ठा बन जाता है, इसका जीवंत उदाहरण श्री कृष्णदास बाबा की इस कथा में मिलता है।

1. गृह त्याग और रनवारी में भजन

श्री कृष्णदास बाबा का पूर्व नाम श्री कृष्णप्रसाद चट्टोपाध्याय था और उनका जन्म बंगाल के यशोर जिले के मोहम्मदपुर ग्राम में हुआ था। विवाह के प्रस्ताव से विरक्त होकर वे शेष रात्रि में घर से निकल पड़े और पैदल ही वृन्दावन पहुँच गए।

वृन्दावन में श्री मदनमोहन की सेवा के पश्चात वे एक भीषण जंगल रनवारी चले आए, जहाँ एक छोटी कुटिया बनाकर भजन करने लगे। संध्या समय वे मधुकरी माँगकर लाते और अपने प्रयोजन के पश्चात शेष अन्न मार्ग की गायों को प्रेमपूर्वक खिला देते थे।

2. तीर्थयात्रा की भूल और तप्त-मुद्रा धारण

लगभग पचास वर्ष बाद उनके मन में चारों धाम की यात्रा की वासना जागी। राधारानी ने स्वप्न में उन्हें वृन्दावन में ही रहकर भजन करने का आदेश दिया, किंतु उन्होंने उसकी अवहेलना की और द्वारका चले गए।

वहाँ उन्होंने सदाचार की उपेक्षा कर 'हरिभक्ति-विलास' के मतानुसार तप्त-मुद्रा धारण कर ली, जिससे उनके चित्त में विक्षेप आ गया और वे पुनः ब्रज लौट आए।

3. प्रियाजी का दूसरा स्वप्न और मानसिक व्यथा

ब्रज लौटने पर रात्रि में राधारानी ने पुनः स्वप्न में कहा कि तप्त-मुद्रा धारण कर वे सत्यभामा के गणों में शामिल हो गए हैं और अब ब्रजधाम के उपयुक्त नहीं रहे। किंकर्त्तव्यविमूढ़ होकर वे गोवर्धन के सिद्ध श्री कृष्णदास बाबा के पास गए, जिन्होंने दिव्यानुभूति के कारण उन्हें स्पर्श करने से असमर्थता जताई।

अन्य महात्माओं से भी उचित मार्गदर्शन न मिलने पर हताश होकर वे रनवारी लौट आए और अन्न-जल त्यागकर कुटिया में पड़ गए।

4. विरहानल और दिव्य शरीर विलय

अनुताप और प्रियाजी के विरह की अग्नि से उनका हृदय दग्ध होने लगा। तीन महीने बीतने के बाद वह भीतर की अग्नि बाहर फूट पड़ी और चौथे दिन सिद्ध श्री जगन्नाथदास बाबा के सहयोग से उनका सारा शरीर भस्मीभूत हो गया।

अग्नि में जलते हुए भी उनके मुख से स्पष्ट हरिनाम का उच्चारण हो रहा था और जाने से पूर्व उन्होंने ब्रजवासियों को कभी भी दुर्भिक्ष या महामारी से सुरक्षित रहने का वरदान दिया।

5. कथा से सीख और भक्ति का संदेश

यह कथा हमें सिखाती है कि ब्रजधाम की अनन्य शरण और वहाँ की मर्यादाओं के प्रति निष्ठा सर्वोच्च है। अपनी बुद्धि या मर्यादाओं का अहंकार त्यागकर जब साधक पूरी तरह शरणागत होता है, तभी उसे सच्ची आंतरिक शांति और भगवत्कृपा प्राप्त होती है।

कथा का सार

श्री कृष्णदास बाबा जी का जीवन यह सिद्ध करता है कि ब्रज की पावन भूमि में प्रेम और विरह की पराकाष्ठा ही साधक को भौतिक बंधनों से मुक्त कर देती है। आज भी रनवारी के वासी उनके आशीर्वाद से सुरक्षित और कृतार्थ हैं। ऐसी अन्य प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इस ग्रंथ के अन्य अध्याय देखें।