ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 4
श्री कृष्णदास बाबाजी (गोवर्धन) की अलौकिक कथा
गोवर्धन के सिद्ध श्री कृष्णदास बाबा की अद्भुत कथा, दिग्विजयी पंडित का गर्व-भंजन, महाप्रसाद का रहस्य, ललिता सखी की कृपा और उनकी दिव्य अष्टयाम लीलाओं का प्रसंग।

सच्ची विद्या और साधना जागतिक पांडित्य से परे होती है। जब साधक का हृदय पूरी तरह दीन और शरणागत हो जाता है, तब साक्षात दिव्य शक्तियाँ और निकुंजेश्वरी राधारानी उसकी रक्षा और मार्गदर्शन करती हैं।
शास्त्रार्थ, ज्ञान और भगवद्भक्ति
यह दक्षिणदेशीय दिग्विजयी टेलंग पंडित जैसे खंभ ठोककर सबको ललकार रहा है; पर शास्त्रार्थ करने की बात तो दूर, उसके सम्मुख होने का भी कोई साहस नहीं बटोर पा रहा है। ब्रज के लिए कैसी लज्जा की बात है यह! जो ब्रज सैकड़ों वर्षों से भारत का सांस्कृतिक केंद्र रहा है, वह आज एक टेलंगी पंडित के आगे नतमस्तक हो रहा है! किस प्रकार ब्रज की नाक रखी जाय—इस विषय को लेकर वृन्दावन के पंडित चिंताग्रस्त हैं। एक ही उपाय है दिग्विजयी को नीचा दिखाने का। उसे गोवर्धन के सिद्ध श्री कृष्णदास बाबा के पास भेज दिया जाय।
पर, वे यदि भजनोंवेश के कारण उससे शास्त्रलाप न करें, या अपने स्वाभाविक दैन्य के कारण उससे अपनी योग्यता ही प्रकट कर दें, तब तो रही-सहि बात भी बिगड़ जाएगी। ऐसी कोई युक्ति करनी चाहिए, जिससे दिग्विजयी उनके पीछे पड़ जाए और उन्हें उससे पीछा छुड़ाने के लिए उससे टक्कर लेनी ही पड़े।
आखिर पंडितों ने एक युक्ति सोच ली। वे दिग्विजयी के पास गए। यथोचित आदर-सत्कार, प्रशंसा और स्तुति के पश्चात् बोले— "महामना, हम सब आपकी प्रतिभा से प्रभावित हैं। हम्मॆं ऐसा कोई नहीं जो आपसे आलाप भी कर सके। हमारा निवेदन है कि आप गोवर्धन के श्री कृष्णदास बाबा के पास जाने का कष्ट करें। ब्रज के पंडितों के मुकुट-मणि हैं वे। यदि उन्हें आपने परास्त कर दिया तो समझ लीजिए कि विश्व में आपकी विजय का डंका पिट गया।
पर, वे आसानी से हाथ आने वाले व्यक्ति नहीं; उन्हें शास्त्रलाप को तैयार करने के लिए आग्रह करना होगा, अपने पांडित्य का कुछ प्रदर्शन भी करना होगा। वे हर किसी से शास्त्रलाप नहीं करते; उसी से करते हैं, जिसे यत्किंचित आलाप के योग्य समझते हैं।"
दिग्विजयी के अभियान को उकसाने के लिए इतना पर्याप्त था। वह दूसरे ही दिन वृन्दावन से गोवर्धन गया। श्री कृष्णदास बाबा के पास जाकर बोला— "सुना है आप ब्रज के पंडितों के मुकुट-मणि हैं। मैं आपसे शास्त्रलाप कर विजय-पत्र लिखवाने आया हूँ।" बाबा ने मेहा-मुसियात समझकर बहुत चेष्टा की दैन्य और छल-वाक्यों का प्रयोग कर उसे टाल देने की, पर वह किसी प्रकार उन्हें छोड़ने को राजी न हुआ। उसने क्रोधित ho दुःख प्रदर्शित करते हुए कहा कि मैं ब्रज में बड़ा पंडित समझकर आया था। सिद्ध बाबा के कहा— "हाँ आपके समान वेद-परायण पंडित यहाँ कोई विरला ही होगा।
आप यदि सामवेद का कोई मंत्र पढ़कर सुनाएँ तो बड़ी कृपा होगी।" पंडित ने सुललित स्वर में एक श्रुति-मंत्र का पाठ किया। सिद्ध बाबा ने सुनकर कहा— "स्वर में तीन दोष हैं।" दिग्विजयी बोला— "इससे शुद्ध स्वर में मंत्र उच्चारण कर सके ऐसा कोई पंडित भारतवर्ष में मुझे नहीं दिखता। आप ही शुद्ध रूप में उच्चारण करें, देखूँ।" तब सिद्ध बाबा ने स्वयं शुद्ध स्वर में मंत्र का पाठ किया। दिग्विजयी उसे सुनकर स्तब्ध और चकित रह गया। उसने बाबा को साष्टांग दंडवत कर कहा— "आपकी विद्या जागतिक नहीं है! ऐसा कोई व्यक्ति इस जगत में नहीं, जो आपकी बराबरी कर सके!"
बात बिल्कुल ठीक थी। बाबा की विद्या जागतिक नहीं थी। उनका कुछ भी तो जागतिक नहीं था। प्रारंभ से ही उनका जीवन किसी दिव्य शक्ति द्वारा परिचालित और परिपूर्ण था। उनका जन्म नरोत्तम ठाकुर महाशय की वंश-परंपरा के अंतर्गत ओडिशा के एक समृद्ध परिवार में हुआ था। पिता, श्री सनातन कानूगो का स्वर्गवास होने पर उनकी माता सती हो गयी थीं। दाह-कर्म के समय उन्होंने अपने तीनों पुत्रों को कुछ आदेश दिया था। सबसे छोटे पुत्र वटकृष्ण को वृन्दावन में रहकर भजन करने का आदेश दिया था। वटकृष्ण ही सिद्ध श्री कृष्णदास बाबा के नाम से विख्यात हुए।
16 वर्ष की अवस्था में वे मा द्वारा निर्दिष्ट पथ के पथिक बनकर वृन्दावन चले आए थे। दो वर्ष वृन्दावन में पठाभ्यास करने के पश्चात् जयपुर गए श्री गोविंदजी की सेवा के उद्देश्य से। वहाँ राजा से गोविंदजी की सेवा का अधिकार प्राप्त कर आठ-दस वर्ष तक उनकी सेवा की। बराबर गोविंदजी का राजभोग का प्रसाद ग्रहण करते रहे। गोविंदजी का प्रसाद ग्रहण करते हुए भी वे प्रबल कामवेग से पीड़ित होने लगे। यह देख उन्हें चिंता हुई। शंका जागी कि गोविंदजी की सेवा में संलग्न रहते हुए और उनके चिन्मय प्रसाद का सेवन करते हुए भी काम विकार क्यों?
जयपुर में ऐसा कोई न था जो उनकी शंका का समाधान कर सकता। इसलिए काम्ब्यवन के सिद्ध श्री जयकृष्णदास बाबा के पास जाकर उन्होंने इस शंका का समाधान करने की प्रार्थना केली। बाबा के उत्तर दिया— "देख बेटा, एक हरे वृक्ष को काटकर पानी में डुबाओ। कुछ दिन बाद उसे निकालकर बिना सुखाये अग्नि में डाल दो, तो वह जलेगा क्या? जीव अनादिकाल से संसार-सागर में निपतित है। पानी में डूबे कष्ट की तरह विषय-रस में डूबा हुआ है। उसे हठात भक्तिरूपी अग्नि में डाल दो तो परिणाम वही होगा जो गीले कष्ट को अग्नि में डालनेसे होता है।
गोवर्धन में साधना के प्रसंग
यदि चाहो कि भक्ति-अग्नि उसे पकड़े तो विषय-रस को सुखाकर भक्ति का याजन करना होगा। यदि कहो कि महाप्रसाद का विषय-रस से क्या संबंध? महाप्रसाद तो चिन्मय है, साधारण विषयों से सर्वथा भिन्न, तो क्या तुम भूल गए महाप्रभु के वे वाक्य, जो उन्होंने रघुनाथदास से कहे थे?" उन्होंने रघुनाथदास गोस्वामी का उदाहरण दिया और एक घटना सुनायी कि रघुनाथदासजी ने विषयियों के अन्न को रजोगुण का निमंत्रण बताया था, पर जब उन्होंने जगन्नाथजी का सदा-बासी प्रसाद धोकर खाया तो महाप्रभु ने उसे छीन कर खाया था।
फिर जयकृष्णदास बाबा ने उन्हें एक और घटना सुनायी कि बंग देश में जब वैष्णव-मंडली नृत्य-कीर्तन कर रही थी, तब एक प्रसिद्ध वेश्या ने कीर्तनकारी वैष्णवों की पद-धूलि में लोटपोट होकर वैष्णव-सेवा में अपनी सारी धन-संपत्ति लगाने का संकल्प किया। महत ने उसे वृन्दावन जाकर श्री गोविंददेवजी को सर्वस्व समर्पित करने को कहा। पर गोविंददेवजी के पुजारी ने उसका धन अस्वीकार कर दिया। वेश्या तीन दिन तक यमुना-तट पर बिना अन्न-जल के पड़ी रही। तब गोविंदजी ने पुजारी को स्वप्न में आदेश दिया कि उसका धन लेकर मेरा भोग लगाओ और शृंगार करने दो। पुजारी ने वैसा ही किया।
वेश्या के धन से गोविंददेवजी का भोग लगा और वैष्णवों को भोजन कराया गया। उसी रात प्रसाद-भोजनकारी वैष्णवों को स्वप्नदोष हुआ। सभी दुःखी होकर तीन दिन तक बिना अन्न-जल के पड़े रहे। तीसरे दिन गोविंदजी ने स्वप्न में कहा— "मैंने कब कहा था तुमसे वेश्या का अन्न खाने को? मैं तो सब कुछ खा सकता हूँ, पर तुमसे सब कुछ खाने को कहूँ तब ना!" जब पंडितों ने पूछा कि महाप्रसाद आने पर उपेक्षा कैसे करें, तो गोविंददेवजी ने उन्हें ऐसी स्थिति में प्रसादा का केवल एक कण लेकर उसका सम्मान करने का आदेश दिया।
जयकृष्णदास बाबा के वचनों में श्री कृष्णदास की शंका का समाधान हुआ। उन्होंने निश्चय किया गोविंददेवके राजभोग-प्रसाद का सेवन न करने का। ये जयपुर छोड़कर नंदगांव के पास डोमान वन में पूर्ण वैराग्य से रहकर भजन करने लगे। नंदगांव से आते की भिक्षा कर लाते। उसमें नीम के पत्ते मिला, कभी पानी में संखर, कच्चा, और कभी बाटी की तरह सेंककर खा लेते। धीरे-धीरे उनका शरीर दुर्बल होता गया। दृष्टि-शक्ति जाती रही। भिक्षा के लिए जाना भी बंद हो गया। कई दिन तक कुंड का जल पीकर रहे। अंत में कुंड तक जाने की शक्ति भी न रही। दो-तीन दिन बिना जल के बीत गए।
तब करुणामयी राधारानी का हृदय विगलित हुआ। उन्होंने ललिता सखी से कहा— "तू क्या अब भी कृष्णदास पर कृपा ना करेगी? प्रसाद की थाली ले जा और उसे भोजन करा।"
ललिताजी प्रसाद की थाली लेकर ब्रजबाला के रूप में डोमान वन में श्री कृष्णदास बाबा के पास जा उपस्थित हुई और बोली— "बाबा प्रसाद पायले। मेरी मैया ने तेरो दुःख देखके मोकू भेषो है प्रसाद लाइकें।" इस वाणी-सुधा के श्रवण-पुटों में पड़ते ही और प्रसाद की दिव्य गंध से कृष्णदास में दिव्य शक्ति का संचार हुआ। उन्होंने प्रेम से प्रसाद का सेवन किया। प्रसाद सेवन कर थल को रज से मांज दिया। ब्रजबालारूपी ललिता ने उनकी आँखों में अंजन लगा दिया, जिससे उनकी आँखों में रोशनी आ गई! पर उन्हें न तो वह बालिका दिखी न वह थल।
ऐसा लगा कि एक अप्राकृत सुगंध से वातावरण परिपूर्ण हो रहा है। इसका यथार्थ मर्म जानने के लिए वे तीन दिन तक वैसे ही पड़े रहे। तीसरे दिन रात्रि में तन्द्रावस्था में उन्होंने देखा कि दिव्य कांति संपन्न एक देवी उनसे कह रही है— "तुम क्यों दुःखी हो रहे हो? मैं तुम्हारी हूँ और तुम मेरे। मेरी अभिन्न सखी ललिता के ललित कर से दृष्टि-शक्ति प्राप्त करने के साथ-साथ तुम सर्वशक्ति प्राप्त हो चुके हो। अब निश्चिंत होकर गोवर्धन चले जाओ।"
इतना कह देवी अंतर्धान हो गई। उसके पश्चात् अपने को सर्वशक्ति-संपन्न जान वे गोवर्धन-तट पर आ लगे। श्री कृष्णदास बाबा गोवर्धन में चक्रेश्वर नामक स्थान पर रहने लगे। उन्हें संस्कृत-भाषा का यथेष्ट ज्ञान न था। इसलिए वे किसी वृद्धा वैष्णव के निकट हरिनाममृत व्याकरण का अध्ययन करने लगे। उनका अध्ययन भजन में बाधक होने लगा और भजन अध्ययन में। एक दिन अत्यंत दुःखी होकर उन्होंने मानसीगंगा में प्राण त्याग देने का संकल्प कर लिया।
शेष रात्रि में उन्होंने सुना कि उनकी कुटी के बाहर से कोई आवाज दे रहा है— "कृष्णदास, कृष्णदास!" बाहर आए तो प्रत्यक्ष रूप से सामने खड़े देखा अपने अंतश्चिंतित श्री सनातन प्रभुपाद और श्री ललितादेवी को। सनातन गोस्वामी ने कहा— "कृष्णदास! कुशलपूर्वक तो हो? मधुकरी भर पेट मिल जाती है ना?" उन्होंने कहा— "देख बेटा, शास्त्र अनंत है। शास्त्राध्ययन के कारण तुझे मरने की आवश्यकता नहीं!
गुरु-कृपा और अंतर्मुखी भजन
आज से मेरे आशीर्वाद से सभी शास्त्रों की तुझे स्वतः स्फूर्ति होगी।" ललितादेवी ने आशीर्वाद दिया— "तू जब भी हमारा स्मरण करेगा, तभी तेरे हृदय में हमारी स्फूर्ति होगी।" इतना कह दोनों श्री कृष्णदास बाबा के मस्तक पर चरण रख अंतर्धान हो गए।
इस घटना के पश्चात् श्री कृष्णदास बाबा समुद्रवत् गंभीर हो गए। उन्होंने छात्रों को हरिनाममृत व्याकरण पढ़ाना और साधकों को भजन-संबंधी उपदेश देना प्रारंभ कर दिया। उन्होंने 'श्री गोविंदलीलामृत', 'संकल्प-कल्पद्रुम', 'पद-कल्पतरु', 'क्षणदागीति चिंतामणि', 'पदमृत समुद्र' आदि बहुत से ग्रंथों का अध्ययन कर श्रीमान् महाप्रभु की अष्टकालीये लीला-स्मरण के साथ श्री राधगोविंद की अष्टयाम लीला-स्मरण की एक पद्धति का प्रणयन किया। अनुगत वैष्णवों की वे उसके अनुसार भजन-दीक्षा देने लगे। येही भजन-पद्धति पर्वर्ती काल में 'गुटिका' के नाम से प्रसिद्ध हुई।
सिद्ध बाबा ने जिसे-जिसे भजन का उपदेश दिया, वे सभी सिद्ध हो गए। उनके आनुगत्य में भजन कर जो लोग सिद्ध हो गए, उनमें मुख्य हैं गोवर्धन के द्वितीय श्री कृष्णदास, मदन-मोहन ठौर के श्री नित्यानंददास, झाडू मंडल के श्री बलरामदास और लाला बाबू (तृतीय श्री कृष्णदास)।
सिद्ध श्री कृष्णदास बाबा की भजन-सिद्धि से संबंधित बहुत-सी घटनाओं के लोगों ने प्रत्यक्ष दर्शन किए हैं। एक बार वे होली-लीला का स्मरण करते हुए अंतश्चिंतित देह से राधारानी का आनुगत्य कर रहे थे। लीला में उनका अंग अबीर, गुलाल, कुमकुम, कस्तूरी आदिसे लिस गया। अर्द्धबाह्यावस्था में जब वे भजन-कुटी से बाहर गए तो वैष्णव-गण उन्हें रंग में रंगे देखकर और अप्राकृत कस्तूरी आदिदी दिव्य गंध का अनुभव कर कृतार्थ हुए।
एक बार राधा-कृष्ण मानसीगंगा में जल-केली कर चुके थे। तटपर ललिता-विशाखा आदि उनकी वेष-भूषा करने में लगी थीं। सिद्ध बाबा मंजरी रूप में इत्र की शीशी लिए अपेक्षाकृत रहे थे। उनके देह में स्तंभ हुआ और इत्र की शीशी हाथ से गिर पड़ी। उसका सौरभ चारों ओर वातावरण में व्याप्त हो गया। मानसीगंगा पर स्नान के लिए आए हुए वैष्णवों ने उस दिव्य गंध का अनुभव किया। सिद्ध बाबा से उसका कारण पूछा, तो वे अपराधी की तरह बोले— "क्या करूँ भाई! मैं अपराधी जीव हूँ, सेवा की योग्यता मुझमें है नहीं। प्रिया-प्रियतम की सेवा के समय इत्र की शीशी हाथ से गिरा दी।
उसी की गंध तुम लोग ले रहे हो।"
एक दिन बाबा हाथ में करुआ ले मानसीगंगा में स्नान के लिए गए। वहाँ जुगलकिशोर की जल-केली देख वे भावाविष्ट हो अगाध जल में कूद पड़े। सात दिन बाद बाबा करुआ हाथ में लिए मानसीगंगा से बाहर निकले। लोगों ने विस्मय से पूछा— "बाबा, सात दिन कहाँ थे आप?" वे भी विस्ममित हो बोले— "यहीं तो, मैं स्नान करके निकल रहा हूँ। इतनी-सी देर में सात दिन कैसे बीत गए?"
भरतपुर के राजा यशवंत सिंह सिद्ध बाबा के दर्शन करने गए और उनकी सेवा स्वीकार करने की प्रार्थना की। बाबा ने उन्हें भू-संपत्ति ब्रजवासियों को दान में देने को कहा। राजा द्वारा स्वयं उनके लिए कुछ करने का आग्रह करने पर बाबा ने उनसे उनकी सबसे प्रिय रानी लक्ष्मी को भेजने को कहा। रानी लक्ष्मी जब सज-धजकर आयी, तो कंकणा, किंकिणी और नूपुर की मधुर ध्वनि सुनते ही बाबा राधारानी के कंकन-किंकिणी की ध्वनि का उद्दीपन हो जाने से दो दिन तक आनंद-सागर में निमज्जित रहे।
बाद में रानी द्वारा वैष्णव-सेवा के लिए गोबर के कांडे पाथकर उससे प्राप्त धन भेजने पर वैष्णवों ने उसे स्वीकार किया।
सिद्ध बाबा कई-कई दिन तक मानसीगंगा में डूबे रहकर जल-स्पर्श-शून्यता श्री विश्वनाथ चक्रवर्तिपाद के स्वहस्तलिखिखित ग्रंथ लेकर बाहर निकलते। यह भी प्रसिद्ध है कि श्री विश्वनाथ चक्रवर्तिपाद जब आवरण-शून्यता स्थान में बैठकर ग्रंथ लिखते, तो चारों ओर घनघोर वृष्टि होने पर भी, उनके ग्रंथ या शरीर को जल का एक बिंदु भी स्पर्श न करता। सिद्ध बाबा भजन के अनुकूल प्रायः सभी ग्रंथ संग्रहकर योग्य व्यक्तियों की सहायता से उनका आस्वादन करते। श्री ब्रजमंडल के सारे वैष्णव सिद्ध बाबा के पास जाकर भजन-विषयक जिज्ञासा करते।
बाबा निरंतर भजनोंवेश में रहते हुए भी उनके अनुकूल उपदेशकर उन्हें भजन में उत्साहित करते।
कथा का सार
श्रीकृष्णदास बाबाजी (गोवर्धन) की कथा के ये प्रसंग भक्ति और साधना पर मनन करने का अवसर देते हैं। इसी संग्रह की अन्य कथाएँ भी पढ़ें।