ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 3

श्रीजयकृष्णदास बाबाजी (काम्ब्यवन) की अलौकिक कथा

भक्त के प्रेम और समर्पण के वशीभूत होकर भगवान् की लीला, श्रीराधा-मदनमोहन का आगमन तथा सिद्ध श्रीजयकृष्णदास बाबाजी के जीवन चरित्र की मार्मिक कथा।

श्रीजयकृष्णदास बाबाजी (काम्ब्यवन) की अलौकिक कथा
श्रीजयकृष्णदास बाबाजी (काम्ब्यवन) की अलौकिक कथा — ब्रज के भक्त भाग 1

भक्तों को भगवान् को खोजना नहीं पड़ता, अपितु भगवान् स्वयं अपने प्रेमी भक्तों की खोज में रहते हैं। भक्तों की प्रेम-सेवा में जो सुख प्रभु को मिलता है, वह वैकुण्ठ में भी दुर्लभ है।

1. श्रीराधा-मदनमोहन का आगमन और विरह-मिलन

एक समय श्रीनित्यानन्द प्रभु के वंशज श्रीनवलकिशोर गोस्वामी अपने ठाकुर श्रीराधा-मदनमोहन को साथ लेकर ब्रज-दर्शन करने आए थे। जब वे कुछ दिन श्रीजयकृष्णदास बाबा की भजन-कुटी में रहने के पश्चात् अपने ठाकुर को वहीं छोड़कर लौटने लगे, तो दोनों ओर अश्रु-विसर्जन का दिव्य दृश्य उत्पन्न हुआ।

रात्रि में श्रीराधा-मदनमोहन ने स्वप्न में आज्ञा दी कि वे अब बाबाजी की सेवा स्वीकार करेंगे और इसी स्थान पर रहेंगे। इस प्रकार अयाचित रूप से बाबाजी को अपने हृदय-धन की प्राप्ति हुई।

2. गुरु-प्रणालिका का रहस्य और वृन्दादेवी की कृपा

कुछ समय पश्चात् एक अल्पवयस्क बाबाजी उनकी सेवा में सहायता करने लगे, जिन्हें जयकृष्णदास बाबा ने रागानुगा भजन की शिक्षा देने का निर्णय किया। जब छोटे बाबा को गुरु-प्रणालिका लाने के लिए गौरमण्डल भेजने की बात आई, तो वे वियोग के भय से रो पड़े।

मार्ग में व्याकुल होकर जब वे पुकारने लगे, तब रात्रि में वृन्दादेवी ने श्रीजयकृष्णदास बाबा को स्वप्न में डाँट बताई कि गुरु-प्रणाली तो पहले से ही सिंहासन के नीचे रखी है। बाबा ने व्याकुल होकर जब सिंहासन पर देखा, तो गुरु-प्रणाली वहीं विद्यमान थी। छोटे बाबा भी चमत्कारिक रूप से लौट आए, जिससे यह प्रसंग अत्यंत भावुक बन गया।

3. राजा का छद्मवेष और बाबा की दृढ़ता

सिद्ध जयकृष्णदास बाबा की महिमा दूर-दूर तक फैल गई। भरतपुर के राजा ने जब उनके दर्शन करने की चेष्टा की और वे विषयी पुरुष होने के कारण सफल न हुए, तो राजा भेष बदलकर कुटिया के सामने बैठ गए।

बाबा ने मधुकरी से लौटते समय गाँव में जाकर कहा कि मेरी कुटिया में आग लगी है जाकर बुझाओ। जब ग्रामीण वहाँ पहुँचे तो उन्होंने छद्मवेष में राजा को देखा और समझ गए। राजा ने अपनी भूल स्वीकार की और बाबा के वैराग्य व निष्ठा का सम्मान किया।

4. ग्वाल-बालों की क्रीड़ा और गोपाल-मूर्ति की प्राप्ति

एक दिन मध्याह्न में विमलाकुण्ड के पास असंख्य गायें और गोप-बालक आकर उपस्थित हुए और बाबा से जल मँगाया। जब बाबा ने उन्हें पुनः देखना चाहा, वे अंतर्धान हो गए। तब श्रीकृष्ण ने प्रकट होकर उन्हें सान्त्वना दी कि कल वे फिर आएँगे।

अगले दिन एक वृद्धा ब्रजमाई एक गोपाल-मूर्ति लेकर आई और सेवा सौंप गई। कुछ समय प्रेम से सेवा करने के पश्चात् चैत्र शुक्ला द्वादशी को सिद्ध बाबा अपना पार्थिव शरीर छोड़कर नित्य-लीला में प्रविष्ट हुए।

5. कथा से सीख और भक्ति का संदेश

यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान और उनके भक्त एक-दूसरे के पूर्णतः अधीन हैं। जहाँ निष्कपट समर्पण, दैन्य भाव और अटूट गुरु-निष्ठा होती है, वहाँ भगवान स्वयं सभी भौतिक बाधाओं को दूर करके अपने भक्तों को अपने चरणों की अलौकिक सेवा प्रदान करते हैं।

कथा का सार

श्रीजयकृष्णदास बाबाजी का जीवन यह सिद्ध करता है कि दीनता, शरणागति और अनन्य भजन से भगवान भक्त के प्रेम जाल में बंध जाते हैं। ऐसी अन्य प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इस ग्रंथ के अन्य अध्याय देखें।