ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 2
श्रीहरिदास बाबाजी और जगन्नाथजी के वृन्दावन आगमन की कथा
भक्त के प्रेम के अधीन होकर श्रीजगन्नाथपुरी से वृन्दावन पधारे महाप्रभु श्रीजगन्नाथजी और रामानन्दी महात्मा श्रीहरिदास बाबाजी की अलौकिक कथा।

भगवान अपने ऐश्वर्य से सर्वसमर्थ होते हुए भी केवल भक्तों के प्रेम के अधीन हैं। जब एक सच्चे अनुरागी महात्मा का प्रेम उमड़ता है, तो साक्षात त्रिलोकपति भी अपनी सीमा छोड़कर भक्त के पास खिंचे चले आते हैं।
1. श्रीधाम पुरी के भगवान का वृन्दावन प्रेम
त्रिलोकी में समस्त स्थान भगवान के हैं, किंतु ब्रजभूमि उन्हें सबसे अधिक प्रिय है। आज से लगभग दो सौ वर्ष पूर्व श्रीधाम पुरी के श्रीजगन्नाथजी के मन में वृन्दावन के मनोहर यमुनापुलिन पर वास करने की उत्कट इच्छा जागी।
भगवान सर्वसमर्थ होने पर भी अपने विग्रहरूप में भक्तों के पूरी तरह अधीन हैं। वे स्वयं वृन्दावन तभी जा सकते थे जब उनका कोई अनन्य भक्त उन्हें वहाँ ले जाकर सेवा करता। इसी निमित्त उन्हें एक सच्चे साधक की खोज थी।
2. हरिदास बाबाजी को प्रभु का दर्शन
वृन्दावन में यमुनातट पर श्रीहरिदास नामक एक रामानन्दी अनुरागी महात्मा निवास करते थे जो दिन-रात प्रभु-चिंतन और उनके विरह में अश्रुपात किया करते थे। उनकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर एक दिन भगवान ने उन्हें दिव्य दर्शन दिए।
प्रभु ने उनकी प्रेममयी सेवा स्वीकार करने की इच्छा जताते हुए कहा कि वे जगन्नाथपुरी जाएँ, जहाँ आगामी आषाढ़ में विग्रह-परिवर्तन होगा और पुराना विग्रह लाकर वे वृन्दावन में उसकी सेवा करें।
3. जगन्नाथपुरी की यात्रा और राजा की विवशता
गुरु-आज्ञा पाकर हरिदासजी अपने शिष्यों के साथ कीर्तन करते हुए पैदल ही बीहड़ जंगलों को पार कर जगन्नाथपुरी पहुँचे। वहाँ महा-महोत्सव का अवसर था और लाखों श्रद्धालु उपस्थित थे।
जब हरिदासजी ने पुजारियों और राजा से पुराना विग्रह माँगा, तो राजा ने पुरानी परंपरा का हवाला देते हुए विग्रह को समुद्र में प्रवाहित करने की विवशता जताई और प्रार्थना अस्वीकार कर दी।
4. राजा का स्वप्न और वृन्दावन में स्थापना
निराश होकर हरिदासजी समुद्र तट पर अन्न-जल त्यागकर भगवान का ध्यान करते हुए बैठ गए कि वे विग्रह के साथ अपने शरीर को भी जल में प्रवाहित करेंगे। अर्धरात्रि में भगवान ने राजा को स्वप्न में दर्शन देकर डाँटा और महात्मा की आज्ञा का पालन करने का आदेश दिया।
राजा ने क्षमा माँगते हुए विशाल रथ में श्रीजगन्नाथजी, श्रीबलदाऊजी और श्रीसुभद्राजी को विराजमान कर राजकीय सम्मान के साथ वृन्दावन विदा किया। कई महीनों की यात्रा के बाद हरिदासजी उन्हें उसी यमुनातट पर ले आए और मन्दिर की स्थापना की, जो आज 'जगन्नाथ घाट' के नाम से प्रसिद्ध है।
5. कथा से सीख और भक्ति का संदेश
यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान बाह्य कर्मकांडों या राजसी वैभव से नहीं, बल्कि केवल अनन्य प्रेम, निष्कपट पुकार और समर्पण से बंधते हैं। भक्त की सच्ची निष्ठा असंभव को भी संभव बना देती है।
कथा का सार
श्रीहरिदास बाबाजी और जगन्नाथजी की यह लीला प्रमाणित करती है कि जहाँ भक्त का सच्चा अनुराग होता है, वहाँ भगवान स्वयं चलकर पधारते हैं। ऐसी अन्य प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इस ग्रंथ के अन्य अध्याय देखें।