ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 47
स्वामी श्रीकृष्णनन्ददासजी: कर्मचंद से सख्य-भाव के सिद्ध संत बनने की अलौकिक गाथा
पंजाब के कर्मचंद से वृन्दावन के सिद्ध संत स्वामी श्रीकृष्णनन्ददासजी बनने, काशी के मठ का वैभव त्यागकर सख्य-भाव की उपासना अपनाने और 'भैया' के साथ भगवल्लीला के प्रेरणादायक प्रसंग।

काशी के मठ का भारी-भरकम वैभव और मठाधीश का पद ठुकराकर, विरक्त संन्यासी का मार्ग चुनने वाले तथा सख्य-भाव की अनन्य उपासना से भगवान श्रीकृष्ण को अपना बाल-सखा बनाने वाले स्वामी श्रीकृष्णनन्ददासजी का जीवन त्याग, विद्वत्ता और प्रेम का अनूठा संगम है।
प्रारंभिक जीवन, काशी में अध्ययन और मठाधीश का पद त्याग
स्वामी श्रीकृष्णनन्ददासजी का पूर्वाश्रम का नाम श्रीकर्मचंद था। उनका जन्म सन् १८८३ में पंजाब के जालंधर जिले के बुण्डाला नामक उपनगर में एक गौड़-ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बचपन से ही ध्रुव-प्रह्लाद जैसे चरित्रों से प्रभावित कर्मचंद ने संसार त्यागकर काशी प्रस्थान किया, जहाँ एक मठाधिपति ने उन्हें आश्रय दिया और वे संस्कृत व्याकरण, न्याय, मीमांसा एवं वेदान्त में पारंगत हुए।
मठाधीश उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे, किंतु अर्धनिद्रा में एक दिव्य बालक के संकेत पर वे दण्ड-कमंडल लेकर मठ से बाहर निकल आए और गंगा-भ्रमण करते हुए अनूपशहर के महात्मा अच्युत मुनि के उपदेश से ब्रज आ गए।
वृन्दावन आगमन, सख्य-भाव की सिद्धि और 'भैया' का प्रसंग
वृन्दावन में रासबिहारी की रासलीला देखकर उनका ब्रह्मज्ञान प्रेम-रस में विलीन हो गया। उन्होंने प्राणगोपाल गोस्वामी से माध्व-गौड़ीय संप्रदाय में दीक्षा ग्रहण की और हिंडौल ग्राम में रहकर भजन करने लगे। गुरुदेव ने उन्हें मधुर-भाव की उपासना का उपदेश दिया था, किंतु उनकी स्वाभाविक रुचि बाल-कृष्ण के प्रति 'सख्य-भाव' में थी।
हिंडौल के पास नगला लक्ष्मणपुर की एक बाल-विधवा (जिसे लोग 'भैया' कहते थे) ने सख्य-भाव से श्रीकृष्ण की ऐसी उपासना की कि उसे साक्षात् राम-कृष्ण के दर्शन हुए और वह उन्हीं के धाम को सिधारी। स्वामीजी ने ग्वारिया बाबा के साथ मिलकर 'प्रेम महाविद्यालय' के छात्र बनकर बाल-लीला का अनुभव किया।
धर्म प्रचार, ग्रंथ रचना और नित्यधाम गमन
गुरुदेव की आज्ञा से उन्होंने गाँव-गाँव में कीर्तन का प्रचार किया, अद्वैतवाद व आर्यसमाज के मतों का खंडन किया और 'भक्ति-रत्नावली', 'श्रीमद्भागवत-तत्त्व-विमर्श' व 'वैदिक प्रमाण-पत्रिका' जैसे अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की।
सन् १९४१ की फाल्गुन कृष्ण सप्तमी की रात्रि को ठीक १२ बजे 'हरे कृष्ण' का उच्चारण करते हुए उन्होंने प्रसन्न मुद्रा में राम-कृष्ण के नित्यधाम में प्रवेश किया।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि साधक को बाह्य ऐश्वर्य, पद और प्रतिष्ठा की कोई चाह नहीं होनी चाहिए। भगवान अपने भक्त के अंतरंग भाव और उसकी सच्ची पुकार को सुनकर किसी भी रूप में उसे अपना सखा बना सकते हैं।
भक्ति का संदेश
भगवान श्रीकृष्ण केवल स्वामी या आराध्य ही नहीं, बल्कि वे अपने अनन्य भक्तों के प्रिय सखा और सहचर भी हैं। जब हृदय में उनके प्रति बाल-सुलभ प्रेम जागृत होता है, तब वे समस्त ऐश्वर्य छोड़कर भक्त के साथ खेलने और झूमने को विवश हो जाते हैं।
कथा का सार
स्वामी श्रीकृष्णनन्ददासजी का पावन चरित्र विद्वत्ता, त्याग, सख्य-भक्ति और गुरुनिष्ठा का एक महान प्रकाशस्तंभ है। ऐसी और प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के अन्य अध्याय अवश्य पढ़ें।