ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 15

श्रीसीतानाथास बाबाजी (गोवर्धन) की अलौकिक कथा

गोवर्धन के गोविंदकुंड पर निवास करने वाले, अनपढ़ किंतु अगाध प्रेम और साधना के प्रतीक सिद्ध श्रीसीतानाथास बाबाजी महाराज की पावन जीवन-कथा।

श्रीसीतानाथास बाबाजी (गोवर्धन) की अलौकिक कथा
श्रीसीतानाथास बाबाजी (गोवर्धन) की अलौकिक कथा — ब्रज के भक्त भाग 1

सांसारिक शिक्षा या पांडित्य भगवद्भक्ति के लिए आवश्यक नहीं है। हृदय की सरलता, अनन्य समर्पण और निरंतर रोदन-कीर्तन से ही भगवान और उनके पार्षदों की अहेतुकी कृपा प्राप्त होती है, जिसका जीवंत उदाहरण श्रीसीतानाथास बाबाजी का जीवन है।

1. उत्कल प्रदेश से गोवर्धन आगमन और दैनिक दिनचर्या

पूर्वाश्रम के उत्कलवासी गोप, श्रीसीतानाथास बाबाजी महाराज अनपढ़, किंतु अति सरल और उदार थे। वे गोवर्धन के गोविंदकुंड में श्रीनाथजी के मंदिर के उत्तर की एक कुटिया में निवास करते थे।

वे शेष रात्रि में स्नानादि के पश्चात गिरधारी की सेवा कर उनके सामने पाँच घंटे लगातार क्रंदन करते हुए नृत्य-कीर्तन करते थे। इसके बाद तुलसी की सेवा कर उत्कल भाषा में रो-रोकर प्रार्थना करते और ज्येष्ठ मास की भीषण धूप में भी बिना छत्र-पादुका के मधुकरी के लिए जाते थे।

2. नियम की निष्ठा और अस्वतंत्र भाव

बाबा प्रतिदिन दो बार गोविंदकुंड में स्नान करते और रात्रि में दो बजे उठकर तीन बजे प्रथम स्नान करते थे। एक बार श्रीअद्वैतदास बाबाजी द्वारा इस समय स्नान करने को 'आसुरिक काल' कहे जाने पर उन्होंने उत्तर दिया कि वे पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हैं, क्योंकि श्रीनाथजी जिस समय जगा देते हैं, वे उसी समय उठ बैठते हैं।

3. अंतिम समय में भी नियमों का पालन और महाप्रयाण

अप्रकट होने से दो-तीन दिन पूर्व तीव्र ज्वर से पीड़ित होने पर भी उनका स्नानादि का नियम नहीं छूटा। माघ मास की भयंकर शीत में भी वे रात के ठीक तीन बजे कुंड में स्नान करने गए।

अंतिम दिन दोपहर के समय उन्होंने श्रीअद्वैतदास जी के सहारे श्रीनाथजी के सामने वरुण वृक्ष के वेदी पर पहुँचकर स्नान किया, तिलक लगवाया और सभी के प्रसाद पाने की पुष्टि करने के बाद तुलसी का स्नानीय जल मुख में लेते ही अपना शरीर त्याग दिया।

4. वृन्दादेवी की कृपा और रूप-माधुरी का वर्णन

वृन्दादेवी की उन पर अगाध कृपा थी; उनके स्नान कराने मात्र से कीड़े द्वारा चाटा गया सूखा तुलसी का पौधा भी हरा-भरा हो जाता था।

एक बार उन्होंने श्रीअद्वैतदास बाबा के आग्रह पर वृन्दादेवी की रूप-माधुरी का ऐसा सजीव और भावाविष्ट वर्णन किया कि उसकी दिव्य स्फूर्ति स्वतः अद्वैतदास बाबा के हृदय में होने लगी।

5. कथा से सीख और भक्ति का संदेश

यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति दंभ या पांडित्य की मोहताज नहीं होती। जब साधक का हृदय पूरी तरह दीन, सरल और भगवान की सेवा में समर्पित हो जाता है, तब भगवान और उनके पार्षद स्वयं उसकी हर आवश्यकता को पूर्ण करते हैं।

कथा का सार

श्रीसीतानाथास बाबाजी का जीवन यह प्रमाणित करता है कि अनन्य प्रेम, दैन्य और सेवा-भाव से ही भगवत्कृपा और नित्य-लीला का प्रवेश द्वार खुलता है। ऐसी अन्य प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इस ग्रंथ के अन्य अध्याय देखें।