ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 14
श्रीराधारमण घोष 'भागवतभूषण' की पावन कथा
त्रिपुरा नरेश के प्राइवेट सेक्रेटरी श्रीराधारमण घोष के जीवन की अद्भुत कायापलट, बन्दर की लीला, तमाल वृक्ष से श्रीश्यामसुन्दर के दर्शन और श्रीमद्भागवत सेवा की प्रेरक कथा।

सच्चे संतों के संग और दिव्य घटनाओं के प्रभाव से जब किसी अभिमानी या सांसारिक व्यक्ति का हृदय पिघल जाता है, तब वह भगवत्कृपा का पात्र बनकर इतिहास रच देता है। श्रीराधारमण घोष का जीवन इसी कायापलट का अद्भुत उदाहरण है।
1. परिचय और वैष्णवाचार के प्रति दृष्टिकोण
ढाका-निवासी परम भक्त श्रीकृष्णगोविन्द घोष के पुत्र श्रीराधारमण घोष बी.ए. पास करने के बाद महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर के स्टेट के प्रधान कार्याध्यक्ष और बाद में त्रिपुराधिपति श्रीवीरचन्द्र माणिक्य बहादुर के प्राइवेट सेक्रेटरी बने।
महाराज वीरचन्द्र परम गौरभक्त थे और घोष महाशय उनका बहुत आदर करते थे, किंतु वे स्वयं वैष्णव विचारधारा और वैष्णवी दैन्य से परिचित न होने के कारण इसे अधिक पसंद नहीं करते थे।
2. बन्दर की घटना और राजा का रहस्य
एक बार वृन्दावन में महाराजा के कुंज के पास एक बन्दर बहुमूल्य शाल लेकर पेड़ पर चढ़ गया और उसे चीरने लगा। कर्मचारियों के प्रयास असफल रहने पर भी राजा शांत भाव से प्रेमाश्रुओं से भरकर उसे देखते रहे।
संध्या समय जब घोष महाशय ने इसका कारण पूछा, तो राजा ने समझाया कि वह बन्दर के रूप में एक महापुरुष थे जिन्होंने राजसी अभिमान त्यागने की बड़ी शिक्षा दी है और वैष्णव-धर्म का प्राण 'दीनता' है। इस बात ने घोष महाशय के हृदय को झकझोर दिया।
3. तमाल वृक्ष के नीचे भागवत पाठ और दिव्य दर्शन
वृन्दावन प्रवास के दौरान एक दिन घोष महाशय ने एक निष्किञ्चन वैष्णव को तमाल वृक्ष के सामने बैठकर तमाल-रूपी श्रीकृष्ण को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से श्रीमद्भागवत की कथा सुनाते देखा।
कुछ दिन वहाँ कथा सुनने के पश्चात पाठ के अंतिम दिन एक अद्भुत घटना घटी—तमाल वृक्ष का तना फट गया और उसके भीतर से द्विभुज मुरलीधर श्रीश्यामसुन्दर के साक्षात दर्शन हुए, जिससे वे मूर्छित हो गए।
4. भागवत प्रचार और ग्रंथ प्रकाशन का कार्य
चेतना लौटने पर उन महापुरुष ने उन्हें नित्य भागवत्-पाठ करने का आदेश दिया। इसके बाद घोष महाशय एकान्त में बैठकर भागवत के प्रत्येक श्लोक की अत्यंत सरस और गौरपरक व्याख्या करने लगे।
उनकी प्रेरणा और महाराजा वीरचन्द्र के आर्थिक सहयोग से श्रीमद्भागवत की चार टीका और अनुवाद सहित वरहमपुरवाला संस्करण तथा अन्य कई महत्वपूर्ण वैष्णव ग्रंथ प्रकाशित हुए, जिसके लिए भक्त-समाज उनका सदैव ऋणी रहेगा।
5. कथा से सीख और भक्ति का संदेश
यह कथा हमें सिखाती है कि अहंकार का त्याग और वैष्णवी दीनता ही भगवत्प्राप्ति का मार्ग है। जब साधक का हृदय सरलता और अनन्य प्रेम से भर जाता है, तब भगवान स्वयं उसके भीतर प्रकट होकर उसे अपनी सेवा का अधिकार देते हैं।
कथा का सार
श्रीराधारमण घोष 'भागवतभूषण' का जीवन यह प्रमाणित करता है कि सच्ची भगवद्भक्ति और शास्त्र-सेवा मनुष्य के जीवन को अमर बना देती है। ऐसी अन्य प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इस ग्रंथ के अन्य अध्याय देखें।