ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 6

श्रीनित्यानन्ददास बाबाजी (ब्रह्मकुण्ड) की अलौकिक कथा

रागाणुगीय सिद्ध महात्माओं में अद्वितीय, 'तृणादपि सुनिचेन' के सजीव प्रतीक श्रीनित्यानन्ददास बाबा की अनन्य स्थिति, दैन्य भाव और महिमा की कथा।

श्रीनित्यानन्ददास बाबाजी (ब्रह्मकुण्ड) की अलौकिक कथा
श्रीनित्यानन्ददास बाबाजी (ब्रह्मकुण्ड) की अलौकिक कथा — ब्रज के भक्त भाग 1

सच्चे सिद्ध महापुरुषों की आंतरिक अनुभूति उन्हें सर्वथा दीन और नम्र बना देती है। वे हर प्राणी में परमात्मा का दर्शन कर खुद को सबसे छोटा मानते हैं, जिसका जीवंत स्वरूप्रीनित्यानन्ददास बाबाजी के जीवन में दिखाई देता है।

1. समाधिस्थ स्थिति और जाग्रत-निद्रा का अभेद

रागाणुगीय सिद्ध महात्माओं में गोवर्धन के सिद्ध श्री कृष्णदास बाबा के शिष्य श्रीनित्यानन्ददास बाबा अद्वितीय थे। उनकी मनोदशा गंगा के प्रवाह के समान अविच्छिन्न थी, जहाँ स्वप्न, जागरण और सुषुप्ति तीनों अवस्थाएँ एक जैसी थीं।

वे जागरण में गंभीर और निःस्पंद समाधिस्थ रहते, जबकि निद्रित अवस्था में लीला का दर्शन करते हुए हास्य, रोदन और प्रलाप करते थे। सेवकों के लिए यह जानना कठिन होता था कि वे सो रहे हैं या जाग रहे हैं, फिर भी उनकी सान्निध्य मात्र से जिज्ञासुओं की शंकाओं का स्वतः समाधान हो जाता था।

2. 'तृणादपि सुनिचेन' की सजीव मूर्ति

नित्यानन्ददास बाबा 'तृणादपि सुनिचेन' श्लोक के सजीव प्रतीक थे। जो कोई उनके सामने आता, यहाँ तक कि उनका शिष्य भी, उसके दण्डवत् करने से पूर्व वे स्वयं उसे दण्डवत् करने लगते थे।

यदि कोई उनके सामने अपनी दीनता प्रकट करता, तो उन्हें रोना आ जाता, क्योंकि वे संसार में स्वयं को सबसे अधिक दीन मानते थे और सोचते थे कि वह व्यक्ति परोक्ष रूप से उनकी प्रशंसा कर रहा है।

3. अकृत्रिम दीनता और सरल स्वभाव

बाबा स्वयं सिद्ध महात्मा और पंडित रामकृष्णा बाबा तथा गौरकिशोर शिरोमणि जैसे महापुरुषों के गुरु होने के बावजूद कभी नाटक नहीं करते थे। उनका आंतरिक भाव ही उन्हें दीन-अति-दीन बना देता था।

जब कोई उनसे कहता कि उनके इस प्रकार बार-बार प्रणाम करने से शिष्य दुःखी होते हैं, तो वे भयभीत होकर क्षमा माँगते और कहते कि वे सब तो महाभागवत हैं, किंतु अगले ही क्षण अपने स्वभाववश वे पुनः पूर्ववत् सबको प्रणाम करने लगते थे।

4. वृन्दावन आसन और महान शिष्य परंपरा

सिद्ध बाबा वृन्दावन में मदनमोहन ठौर में रहकर भजन करते थे, जहाँ आज भी उनका आसन विराजमान है। उनके शिष्यों में श्री गौरकिशोर शिरोमणि महाराज, श्री व्रजकिशोरदास बाबाजी, श्री नृसिंहदासजी, श्री रामकृष्णादास पंडित बाबाजी और श्री नरोत्तमदास अधिकारी प्रमुख थे।

नवद्वीप के प्रसिद्ध सिद्ध महात्मा श्री गौरकिशोरदास बाबाजी ने भी उन्हीं से भजन-शिक्षा प्राप्त कर दिव्यता प्राप्त की थी।

5. कथा से सीख और भक्ति का संदेश

यह कथा हमें सिखाती है कि जैसे-जैसे साधक भगवत्प्राप्ति की उच्च अवस्था में पहुँचता है, उसका अहंकार पूरी तरह समाप्त हो जाता है और उसके हृदय में प्रत्येक जीव के प्रति अगाध सम्मान तथा सहज दीनता प्रकट होती है।

कथा का सार

श्रीनित्यानन्ददास बाबाजी का जीवन यह प्रमाणित करता है कि सच्ची महानता दंभ में नहीं, बल्कि संपूर्ण शरणागति और निरभिमानता में निहित है। ऐसी अन्य प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इस ग्रंथ के अन्य अध्याय देखें।