ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 13
श्रीमाधवदास बाबाजी (वृन्दावन) की जीवन-कथा
बंगाल से वृन्दावन पहुँचे, कठोर वैराग्य, संतोष और भगवत्कृपा के प्रतीक श्रीमाधवदास बाबाजी महाराज के जीवन की प्रेरणादायक और पावन कथा।

संसार की सुख-सुविधाओं को त्यागकर जब कोई साधक गुरु के सान्निध्य में संतोष और संयम का मार्ग अपनाता है, तब स्वयं राधारानी उसकी सुधि लेने आती हैं। श्रीमाधवदास बाबाजी का जीवन इस दिव्य सत्य का जीवंत प्रमाण है।
1. प्रारंभिक जीवन और वृन्दावन आगमन
श्रीमाधवदास बाबाजी का जन्म सन् 1845 में बंगाल के महानन्दा और पद्मानदी के संगम पर स्थित बारसारिया गाँव में हुआ था। बचपन में ही पिता का देहांत होने के कारण औपचारिक शिक्षा सीमित रही, किंतु सत्संग और भक्ति-ग्रंथों के पठन से उनका मन बाल्यावस्था से ही भगवद्भक्ति में लग गया था।
विशुद्ध वैष्णवों के संग की तीव्र इच्छा के कारण सत्ताईस वर्ष की आयु में उन्होंने पारिवारिक मोह त्यागकर वृन्दावन की शरण ली और श्रृंगारवट के श्रीपरमानन्द प्रभुपाद के आश्रय में भजन करने लगे।
2. जगदानन्ददास जी का मार्गदर्शन और संयम
संकेतवट में वे श्रीजगदानन्ददासजी के साथ रहकर भजन करने लगे। एक दिन जब माधवदासजी ने मट्ठे के साथ थोड़ा नमक माँगने की इच्छा जताई, तब जगदानन्ददासजी ने उन्हें समझाया कि मन बहुत लोभी है, इसे छूट देने पर इच्छाएँ बढ़ती जाती हैं।
एक अन्य प्रसंग में उत्सव से लौटने पर मालपुए खाने से हुई थकान के माध्यम से उन्होंने समझाया कि स्वाद और उत्सवों के मोह से दूर रहकर अपनी कुटिया में संतोषपूर्वक भजन करना ही साधक के लिए श्रेष्ठ है।
3. काम्यवन निवास और मन का पश्चाताप
बरसाने और भानुकुण्ड के पश्चात वे काम्यवन में विमलाकुण्ड के निकट कुटिया बनाकर लंबे समय तक भजन करते रहे। एक दिन भजन के बाद भी राधारानी की कृपा न मिलने का विचार कर वे अपनी त्रुटि मानकर फूट-फूटकर रोने लगे और मधुकरी के लिए भी नहीं गए।
4. किशोरी बालिका का रूप धरकर राधारानी की कृपा
उसी समय एक किशोरी ब्राह्मण-बालिका पूरी, कचौड़ी और नाना प्रकार की खाद्य-सामग्री से भरी थाली लेकर उनके दरवाजे पर आई और कहा कि मैया ने उनके लिए भोजन भेजा है।
वह भोजन ग्रहण करने के पश्चात उसकी दिव्य सुगंध और स्वाद से बाबाजी चमत्कृत हो गए और समझ गए कि यह राधारानी की ही अहेतुकी कृपा है, जिससे उनकी श्रद्धा और अधिक दृढ़ हो गई।
5. महाप्रयाण और कथा से सीख
सन 1913 में श्रीभगवानगोपाल गोस्वामी की गोद में मस्तक रखकर तथा गणेशदास का कीर्तन सुनते हुए श्रीमाधवदास बाबाजी ने अपना शरीर त्यागकर नित्य-लीला में प्रवेश किया। यह कथा हमें सिखाती है कि संतोष, वैराग्य और दीनता ही साधक को भगवान की कृपा का पात्र बनाते हैं।
कथा का सार
श्रीमाधवदास बाबाजी का जीवन यह प्रमाणित करता है कि संयमित जीवन और अनन्य निष्ठा से ही भगवत्प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। ऐसी अन्य प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इस ग्रंथ के अन्य अध्याय देखें।