ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 8
श्रीगौरचरणदास बाबाजी महाराज की पावन कथा
यशोहर जिले से गृह त्यागकर ब्रज पधारे, भगवान बलदाऊजी के आशीर्वाद प्राप्त सिद्ध श्रीगौरचरणदास बाबाजी महाराज की भक्ति और साधना की अनन्य कथा।

गुरु की आज्ञा और भगवान की विशेष कृपा से जब साधक का जीवन पूरी तरह समर्पित हो जाता है, तब भगवान स्वयं उसे अपने सान्निध्य में रखकर उसकी साधना को पूर्ण करते हैं। श्रीगौरचरणदास बाबाजी महाराज का जीवन इसी दिव्य कृपा का जीवंत प्रमाण है।
1. गृह त्याग और नवद्वीप में गुरु-सेवा
श्रीगौरचरणदास बाबाजी महाराज का जन्म यशोहर जिले के तालखड़ी गाँव में हुआ था। वे श्रीमहाप्रभु के परिवार की श्रीश्रीलोकनाथ गोस्वामी वंशज और सिद्ध श्रीगौरचरणदास बाबाजी महाराज थे।
अल्पवयस्क अवस्था में ही लोकनाथ गोस्वामी प्रभु और श्रीनरोत्तम ठाकुर की गुण-गरिमा से प्रभावित होकर उन्होंने गृह त्याग दिया और नवद्वीप पहुँचकर सिद्ध श्रीचैतन्यदास बाबा का आश्रय लिया तथा लंबे समय तक गुरु-सेवा की।
2. ब्रजमंडल की परिक्रमा और दाऊजी का आदेश
गुरुदेव से आज्ञा लेकर वे ब्रजमंडल के दर्शन और चौरासी कोस की परिक्रमा करने वृंदावन आए। परिक्रमा के अंत में जब वे महावन पहुँचे और रात्रि विश्राम के पश्चात नवद्वीप लौटने का विचार करने लगे, तब रात्रि में दाऊजी ने उन्हें नाम लेकर पुकारा।
दाऊजी ने अपनी गुफा में ही रहकर भजन करने की इच्छा प्रकट की और उन्हें सर्वार्थ सिद्धि का आशीर्वाद दिया, क्योंकि भगवान को वह भक्त अत्यंत प्रिय होता है जिसका भजन भगवान को भी आनंदित कर दे।
3. महावन की गुफा में भजन और साधना
दाऊजी के आदेशानुसार श्रीगौरचरणदास बाबाजी उसी गुफा में रहने लगे और संपूर्ण रूप से भगवद्भक्ति में लीन हो गए। उनका जीवन साधना, भजन और पूर्ण समर्पण का आदर्श बन गया।
वे किसी भी परिस्थिति में अपनी साधना से विचलित नहीं होते थे और उनके लिए भजन ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य था, जिससे उनकी साधना निरंतर प्रगाढ़ होती गई।
4. कुंजरा गाँव और मणिपुरी कुंज में अप्राकट्य
कुछ समय पश्चात बाबाजी कुंजरा गाँव में रहकर भजन करने लगे। अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में वे वृंदावन पधारे और अपने शिष्य श्रीकृष्ण चैतन्यदास (राय साहब श्रीकैलाशदास) के साथ मणिपुरी कुंज में निवास करने लगे।
इसी पवित्र मणिपुरी कुंज में उनका लीला-संवरण यानी अप्राकट्य हुआ, और वे नित्य-लीला में प्रवेश कर गए।
5. कथा से सीख और भक्ति का संदेश
यह कथा हमें सिखाती है कि गुरु की निष्ठा और भगवान के प्रति अनन्य प्रेम मनुष्य के जीवन को कृतार्थ कर देता है। जब साधक का हृदय पूरी तरह निर्मल और समर्पित होता है, तो भगवान स्वयं उसकी साधना की डोर थाम लेते हैं।
कथा का सार
श्रीगौरचरणदास बाबाजी महाराज का जीवन यह प्रमाणित करता है कि भगवत्कृपा और साधु-संग से ही जीवन की सार्थकता सिद्ध होती है। ऐसी अन्य प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इस ग्रंथ के अन्य अध्याय देखें।