ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 9
श्रीगौरदास बाबाजी और फूल-सेवा की अलौकिक कथा
नन्दग्राम के पावन सरोवर तट पर फूल-सेवा करने वाले सिद्ध श्रीगौरदास बाबाजी की अनन्य कथा, अभिमान-भंजन और साक्षात श्रीकृष्ण के दर्शन का दिव्य प्रसंग।

अभिमान और अदूरदर्शिता साधक के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा होती है। जब साधक सेवा में कमी मानकर भगवान को दोष देने लगता है, तब करुणावान प्रभु स्वयं अपने मुख से अपनी सेवा का महत्व समझाकर उसका अभिमान चूर कर देते हैं।
1. नन्दग्राम में भजन और नित्य फूल-सेवा
सन 1853 के आसपास नन्दग्राम में पावन सरोवर के तट पर श्रीसनातन गोस्वामीपाद की प्राचीन भजन-कुटी में श्रीगौरदास बाबाजी भजन करते थे। वे एक सिद्ध पुरुष थे जो नित्य प्रेमसरोवर के निकट गाजीपुर से फूल चुनकर लाते थे और माला पिरोकर श्रीलालजी को पहनाते थे।
वे पिछले चार-पाँच वर्षों से अनन्य भाव से यह फूल-सेवा कर रहे थे और इसी सेवा के माध्यम से उन्हें श्रीकृष्ण-कृपा की प्राप्ति हुई थी।
2. अभिमान का उदय और बरसाना प्रस्थान
एक दिन उनके मन में अभिमान आ गया कि इतने दिनों की सेवा के बाद भी लालजी ने उन पर कृपा नहीं की, जबकि वृषभानुनंदिनी अवश्य कृपा करतीं। यह सोचकर उन्होंने नन्दग्राम छोड़कर आज ही बरसाने जाने का निश्चय कर लिया।
संध्या के समय वे कथा के पश्चात बरसाने की ओर चल दिए, किंतु मार्ग में ही उनकी परीक्षा का समय आ गया।
3. ग्वाल-बाल का रूप धरकर प्रभु का रोकना
जब वे नन्दग्राम से एक मील दक्षिण में एक मैदान से जा रहे थे, तब एक साँवले रंग के सुंदर बालक ने गौचारण से लौटते हुए उनसे पूछा कि वे कहाँ जा रहे हैं।
बाबाजी के बरसाने जाने की बात सुनकर बालक की आँखें डबडबा आईं और उसने व्याकुल होकर रास्ता रोकते हुए कहा, 'बाबा, मान जा, मत जा। मेरी फूल-सेवा कौन करेगा?'
4. सत्य का बोध और विरह का क्रंदन
बालक की बात सुनकर जब बाबाजी ने चौंककर देखा, तो वहाँ न वह बालक था, न उसके साथी और न ही गायें। सत्य का आभास होते ही उनके प्राण रो पड़े और वे भूमि पर लोट-पोट होकर 'हा कृष्ण! हा कृष्ण!' पुकारने लगे।
चेतना लौटने पर वे अपने अभिमान और योग्यताहीनता पर विलाप करने लगे, जबकि उधर पुजारी को स्वप्न में आदेश हुआ कि गौरदास से फूल-सेवा न छोड़ी जाए क्योंकि प्रभु केवल उसी की फूल-सेवा अंगीकार करते हैं।
5. कथा से सीख और भक्ति का संदेश
यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान हमारी सेवा और समर्पण को भली-भांति देखते हैं, किंतु अभिमान आते ही वे अदृश्य हो जाते हैं। सच्ची भक्ति में अधीरता नहीं, बल्कि अनन्य धैर्य और निष्कपट सेवा भाव होना चाहिए।
कथा का सार
श्रीगौरदास बाबाजी का जीवन यह प्रमाणित करता है कि निस्वार्थ भाव से की गई सेवा कभी निष्फल नहीं होती। जब साधक का अहंकार गल जाता है, तब भगवान स्वयं उसके प्रेम के अधीन हो जाते हैं। ऐसी अन्य प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इस ग्रंथ के अन्य अध्याय देखें।