ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 12
श्रीबलरामदास बाबाजी (वृन्दावन) की कथा
वृन्दावन के झाड़मण्डल में श्रीमद्भागवत का पाठ करने वाले सिद्ध श्रीबलरामदास बाबाजी के कठोर वैराग्य, सदाचार, आत्मनिरीक्षण और अलौकिक निष्ठा की कथा।

कठोर वैराग्य, आत्मनिरीक्षण और आचरण की निर्मलता ही एक सच्चे साधक की वास्तविक पूँजी है। श्रीबलरामदास बाबाजी का जीवन इसी निष्कलंक सदाचार और भगवद्भक्ति का अद्भुत प्रतीक है।
1. झाड़मण्डल में भागवत पाठ और बाबाजी का पश्चाताप
वृन्दावन में श्रृंगारवट से कुछ दूर यमुना के तट पर झाड़मण्डल नामक स्थान में एक प्राचीन वटवृक्ष के नीचे व्यासासन पर सिद्ध बलरामदास बाबाजी विराजमान रहकर श्रीमद्भागवत का पाठ करते थे, जहाँ श्रोता उनकी तल्लीनता से मुग्ध होकर कथा सुनते थे।
एक दिन अचानक पाठ बंद कर उन्होंने पुस्तक बाँध दी और नेत्रों में आँसू भरकर स्वयं को अपराधी मानते हुए कहा कि पाठ के समय मन विचलित होने के कारण वे इस प्रायश्चित हेतु यमुना में प्राण त्याग देंगे, जो उनके उच्च आत्म-निरीक्षण को दर्शाता है।
2. कठोर वैराग्य और आँखों पर पट्टी
सिद्ध बलरामदास बाबाजी श्री कृष्णदास बाबाजी महाराज के शिष्य थे और वे सदाचार तथा वैराग्य का अत्यंत कठोरता से पालन करते थे।
वे स्त्रियों से कभी बात नहीं करते थे और मंदिर में दर्शन के समय अपनी आँखों पर कपड़ा बाँधकर लाठी के सहारे चलते थे, जिससे इन्द्रियों पर उनका पूर्ण नियंत्रण बना रहे।
3. मधुसूदन गोस्वामीपाद से संवाद
एक बार श्रीराधारमणजी के मंदिर के द्वार पर बैठे सेवायत मधुसूदन गोस्वामीपाद ने उनके अत्यधिक वृद्ध शरीर को देखकर स्त्रियों से इतना भय खाने का कारण पूछा।
बाबाजी ने उत्तर दिया कि महाप्रभु ने वैरागी के लिए स्त्री-दर्शन निषिद्ध बताया है, क्योंकि जब तक शरीर में मांस और रक्त है, काम-प्रवृत्ति जागृत हो सकती है, इसलिए साधु को हरसंभव सतर्क रहना चाहिए।
4. श्रीजगदानन्ददास बाबा का यज्ञोपवीत विसर्जन
बाबाजी अपने आचरण के प्रति बहुत कड़े थे और दूसरों की भूल को भी बिना डरे सुधारते थे। जब उत्कलवासी श्रीजगदानन्ददास बाबा उनके दर्शन करने आए, तो बाबाजी ने उनके जाति-अभिमान और यज्ञोपवीत पर आपत्ति जताई।
यह सुनकर जगदानन्दजी ने उसी समय यमुना में अपना यज्ञोपवीत विसर्जित कर दिया और बाबाजी से दण्डवत् कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
5. कथा से सीख और भक्ति का संदेश
यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची साधना के लिए मन और इंद्रियों पर कड़ा नियंत्रण तथा सूक्ष्म से सूक्ष्म दोष के प्रति भी सचेत रहना आवश्यक है। आचरण की शुद्धता के बिना भक्ति का मार्ग प्रशस्त नहीं होता।
कथा का सार
श्रीबलरामदास बाबाजी का जीवन यह प्रमाणित करता है कि कठोर वैराग्य और निष्कलंक सदाचार ही साधक को आध्यात्मिक उन्नति के शिखर पर पहुँचाते हैं। ऐसी अन्य प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इस ग्रंथ के अन्य अध्याय देखें।