ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 17

श्रीपाद नवकिशोर गोस्वामी एवं श्रीपाद लोचनानन्द गोस्वामी की पावन कथा

श्रीपाद नवकिशोर गोस्वामी और श्रीपाद लोचनानन्द गोस्वामी के जीवन की अलौकिक घटनाएं, जो त्याग, अनन्य भक्ति और भगवान की कृपा का अद्भुत दर्शन कराती हैं।

श्रीपाद नवकिशोर गोस्वामी एवं श्रीपाद लोचनानन्द गोस्वामी की पावन कथा
श्रीपाद नवकिशोर गोस्वामी एवं श्रीपाद लोचनानन्द गोस्वामी की पावन कथा — ब्रज के भक्त भाग 1

सच्चे संत और महापुरुष संसार के सभी बंधनों को त्यागकर केवल भगवान के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पित कर देते हैं, जिनका जीवन लोक-कल्याण और अनन्य भक्ति का प्रतीक होता है।

गोस्वामी बंधुओं का त्याग और गोवर्धन में आगमन

श्रीपाद नवकिशोर गोस्वामी और श्रीपाद लोचनानन्द गोस्वामी ढाका के श्रीश्रीनित्यानन्द परिवार के श्रीपाद लक्ष्मीकान्त गोस्वामी प्रभु के पुत्र थे। श्रीनवकिशोर गोस्वामी अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीकृष्णकिशोर गोस्वामी से दीक्षित थे और श्रीलोचनानन्द गोस्वामी श्रीनवकिशोर गोस्वामी से। परस्पर गुरु-शिष्य होते हुए भी दोनों प्रभु जैसे दो देह एक प्राण थे। दोनों षड्दर्शनाचार्य, वैराग्यवान् और भजनानुरागी थे।

दोनों कुमार अवस्था में संसार त्यागकर वृन्दावन चले गए और गोवर्धन के सिद्ध कृष्णदास बाबा के शरणागत होना चाहा। अपना यथार्थ परिचय देने पर वे शिष्टाचारवश इन्हें पूज्य मानकर कृपा न करते, इसलिए उन्होंने अपने को अति नीच कुल का बतलाते हुए उनकी कृपा की प्रार्थना की। सिद्ध बाबा ने इनके तेज, रूप, गुण और अनुराग से मुग्ध होकर इन्हें अपने आश्रम में रखकर भजनमुद्रा की शिक्षा देनी आरंभ की।

सिद्ध बाबा की सेवा और परिचय का रहस्योद्घाटन

सिद्ध बाबा तब बहुत वृद्ध हो चुके थे और उन्हें ऐसे श्रद्धालु सेवकों की बड़ी आवश्यकता थी। ये दोनों भाई निःसंकोच भाव से उनकी हर प्रकार की सेवा करने लगे, यहाँ तक कि उनके मल-मूत्रादि का परिष्कार भी बड़े अनुराग से करते थे।

कुछ दिन बाद उनके कनिष्ठ भ्राता उनका पता लगाते-लगाते गोवर्धन में सिद्ध बाबा के पास आ पहुँचे। तब सिद्ध बाबा को उनका वास्तविक परिचय मिला तो वे क्रोध से लाल हो उठे। लौटने पर जब दोनों भाइयों ने बाबा को क्रोधित पाया, तो वे तुरंत उनके चरणों में गिरकर क्षमा-प्रार्थना करने लगे। सिद्ध बाबा के पूछने पर उन्होंने अपनी विनीत वाणी से अपने अपराध और दैन्य-भाव को स्पष्ट किया, जिससे बाबा का भीतर का प्रेम उमड़ पड़ा।

पशुप-बन का वास और ढाका की ठाकुर-सेवा

तीनों भाई सिद्ध बाबा से विदा लेकर काम्यवन के पश्चिम पशुप नामक निर्जन ग्राम में रहकर भजन करने लगे। कुछ समय पश्चात पशुप-बन में कनिष्ठ भ्राता का शरीर छूट गया और ढाका में ठाकुर-सेवा सुचारू रूप से न चल पाने के कारण दोनों भाइयों को बाध्य होकर ढाका लौटना पड़ा।

ढाका में ठाकुरजी के स्वप्नादेश के अनुसार वे चट्टग्राम गए, जहाँ प्रसिद्ध कविराज भक्त-प्रवर कार्तिक अधिकारी के घर ठहरे। जमींदार ने प्रसन्न होकर अपनी सारी भू-सम्पत्ति ठाकुर के नाम लिख दी और ठाकुर-सेवा की सुव्यवस्था कर दी।

लोचनानन्द प्रभु का अलौकिक भाव और कूड़े के गड्ढे की घटना

एक दिन कार्तिक अधिकारी के घर संकीर्तन के समय नृत्य करते-करते श्रीपाद लोचनानन्दप्रभु को ऐसा गाढ़ आवेश हुआ कि वे द्रुतगति से भागकर कहीं अंतर्धान हो गए। तीन दिन बाद जब खोज की गई, तो वे एक कूड़े के गड्ढे में सिर के बल गिरे मिले, जहाँ गायें उच्छिष्ट और कदलीपत्र खाने आई थीं।

अधिकारी महाशय ने परीक्षा कर बताया कि प्रभु के प्राण निकले नहीं हैं, बल्कि उनकी प्राणवायु का शरीर में निरोध हो गया है। कीर्तन आरंभ होते ही प्रभु झट उठकर नृत्य करने लगे।

कालभैरव और विसूचिका देवी का उद्धार

एक बार सीताकुण्ड चन्द्रनाथ की यात्रा के दौरान अर्धरात्रि में श्रीपाद लोचनानन्द प्रभु को कालभैरव के दर्शन हुए, जो अपने पापों से मुक्त होने के लिए व्याकुल थे। प्रभु ने उन्हें कृष्ण-मन्त्र का उपदेश देकर उनका उद्धार किया।

इसी प्रकार एक बार गाँव में भयानक विसूचिका (हैजा) रोग फैलने पर, प्रभु ने विसूचिका देवी को कृष्ण-नाम का उपदेश दिया और उन्हें उस ग्राम से सदा के लिए चले जाने का निर्देश दिया। उनके प्रभाव से पूरा ग्राम तुरंत निरोग हो गया और आज भी उस गाँव में वह रोग नहीं फैलता।

दिव्य धाम गमन

कुछ समय पश्चात दोनों प्रभु जगन्नाथपुरी रथयात्रा दर्शन करने गए। श्रीश्रीजगन्नाथजी की पाण्डु विजय के समय उनके दर्शन करते-करते बड़े प्रभु अप्रकट हो गए। छोटे प्रभु भी उनके चरण-तले बैठकर बोले—'प्रभो! मातृगर्भ से लेकर आज तक सेवक को छाया की तरह साथ रखा, अब क्या उसे अकेले छोड़ जायेंगे?' इतना कहकर वे भी उनके अनुगामी हो गए और नित्यधाम को पधारे।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चा साधक लोक-सम्मान की परवाह किए बिना केवल भगवद्-भक्ति और गुरु-सेवा में लीन रहता है। दीनता, विनम्रता और अनन्य निष्ठा ही भक्त को भगवान के अति निकट पहुँचाती है।

भक्ति का संदेश

भक्ति वह पावन मार्ग है जो जीव को उसके वास्तविक स्वरूप से परिचित कराती है। नाम-जप, संतों का संग और भगवान के चरणों में पूर्ण समर्पण ही भवसागर से पार उतरने का एकमात्र साधन है।

कथा का सार

यह प्रसंग हमें संतों के त्याग, नाम-महिमा और भगवद्-प्रेम की पराकाष्ठा की याद दिलाता है। ऐसी और आध्यात्मिक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।