ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 21

श्रीपादब्रह्मानन्द गोस्वामीप्रभु: वैराग्य, सेवा और भगवद्-रस की पराकाष्ठा

शृंगारवट वृंदावन के प्रख्यात संत श्रीपादब्रह्मानन्द गोस्वामीप्रभु के जीवन की अलौकिक घटनाएं, जो उनके अगाध त्याग, दैन्य भाव और भक्ति की गहराई को दर्शाती हैं।

श्रीपादब्रह्मानन्द गोस्वामीप्रभु: वैराग्य, सेवा और भगवद्-रस की पराकाष्ठा
श्रीपादब्रह्मानन्द गोस्वामीप्रभु: वैराग्य, सेवा और भगवद्-रस की पराकाष्ठा — ब्रज के भक्त भाग 1

संतों का जीवन इस बात का प्रमाण होता है कि भौतिक संसार में रहते हुए भी भगवान के चरणों में पूरी तरह समर्पित होकर कैसे दिव्य आनंद का अनुभव किया जा सकता है।

श्रीशृंगारवट में दिव्य कीर्तन और उदारता

श्रीपादब्रह्मानन्द गोस्वामीप्रभु वृन्दावन में श्रीश्रीनित्यानन्द प्रभु की गद्दी के प्रतिष्ठाता श्रीपरमानन्द व श्रीनन्दकिशोर गोस्वामीप्रभु की चौथी पीढ़ी में थे। उनके व्यक्तित्व में आकर्षक तेज, कीर्तन में परमाविष्टता, उदारता और मिष्टभाषिता कूट-कूट कर भरी थी।

जब वे और श्रीनृसिंहानन्द प्रभु कीर्तन में नृत्य करते, तो ऐसा प्रतीत होता मानो निताई-गौर का प्रत्यक्ष आविर्भाव हो गया हो। उनके कीर्तन में समय का ज्ञान नहीं रहता था और वे श्रोताओं के लिए हमेशा प्रसाद की उत्तम व्यवस्था रखते थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में अपार उपार्जन किया, किंतु एक पैसा भी अपने पास नहीं रखा, सब कुछ संतों और सेवा में समर्पित कर दिया।

अनन्य सेवा-भाव और अक्रोध स्वभाव

प्रभु-संतान होने के बावजूद उनका दैन्य भाव अत्यंत अद्भुत था। एक बार उत्सव के अवसर पर उन्होंने प्रसिद्ध कीर्तनिया श्रीकृष्णदास बाबाजी के थक जाने पर रात में चुपचाप उनका बदन दबाना शुरू कर दिया, जो उनके महान संत होने और अहंकारहीनता का परिचायक है।

वे पूर्णतः अदोषदर्शी और अक्रोध थे। जब उनके ज्येष्ठ पुत्र का मध्याह्न में परलोकवास हो गया, तब भी वे शोकाकुल होने के स्थान पर सीधे ठाकुर-गृह में गए, भोग लगवाने के बाद प्रसाद ग्रहण किया और अपने दैनिक भजन में तल्लीन हो गए।

राधारस-समुद्र में प्रवेश और नित्य धाम गमन

वे सदा श्रीराधारस-समुद्र के मत्स्य की भाँति उसी में डूबे रहते थे। एक बार गोवर्धन के सिद्ध कृष्णदास बाबा के शिष्य के साथ उन्होंने श्रीराधा की स्नान-शृंगार लीला पर ऐसी चर्चा की कि दोनों प्रातःकाल से अगले प्रातःकाल तक चौबीस घंटे लगातार उस रसार्णव में डूबे रहे।

सन् 1898 की ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्दशी के दिन उन्होंने इस भौतिक जगत को छोड़कर उस आनन्दमय अतल तल में सदा के लिए प्रवेश कर लिया।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

यह कथा हमें सिखाती है कि जीवन के हर सुख-दुःख और परिस्थिति में भगवान के प्रति अटूट विश्वास और समर्पण ही सच्ची साधना है। अहंकार का सर्वथा त्याग और दीनता ही भक्त को भगवान के निकट लाती है।

भक्ति का संदेश

भक्ति वह दिव्य मार्ग है जो व्यक्ति को शोक, मोह और भौतिक बंधनों से ऊपर उठा देती है। जो साधक अपना सर्वस्व भगवान की सेवा में न्यौछावर कर देता है, उसका अंतःकरण सदा भगवद्-प्रेम के आनंद में झूमता रहता है।

कथा का सार

यह प्रसंग हमें श्रीपादब्रह्मानन्द गोस्वामीप्रभु के उच्च कोटि के वैराग्य, निस्वार्थ सेवा और भगवद्-प्रेम की याद दिलाता है। ऐसी और आध्यात्मिक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।