ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 16
श्रीवृन्दावनदास बाबाजी की अनन्य निष्ठा और हरिनाम महिमा
श्रीवृन्दावनदास बाबाजी के जीवन की एक प्रेरणादायक घटना, जो हमें शुद्ध भक्ति, नाम-जप और अनन्य निष्ठा का पाठ पढ़ाती है।

सच्ची भक्ति और हरिनाम का आश्रय लेने वाले संतों का जीवन हमें अनुशासन, पवित्रता और भगवान के प्रति अगाध प्रेम का मार्ग दिखाता है।
श्रीवृन्दावनदास बाबाजी की नित्यचर्या और बरसाना से वृन्दावन की यात्रा
श्रीवृन्दावनदासजी बरसाना में निवास करते थे। उनकी दिनचर्या अत्यंत संयमी और भक्तिमय थी। वे नित्यप्रति शेषरात्रि में उठकर स्नानाहिकादि से निवृत्त होते और श्रीहरिनाम की माला-झोली हाथ में लेकर बरसाना से वृन्दावन के लिए निकल पड़ते थे।
वृन्दावन पहुँचकर वे प्रसिद्ध सातों देवालयों में ठाकुरजी के दर्शन करते, श्रीचरणतुलसी, श्रीरज और श्रीचरणामृत ग्रहण करते और पुनः बरसाना लौट आते थे। उनका जीवन पूर्णतः भगवान के चरणों में समर्पित था। वे संध्या समय केवल मधुकरी के लिए जाते थे और कभी भी किसी के आमंत्रण में कहीं नहीं जाते थे।
गोविन्द-मन्दिर का विराट उत्सव और विवशता का प्रसाद
एक बार वृन्दावन के गोविन्द-मन्दिर में एक विराट उत्सव का आयोजन हुआ। उस दिन जब बाबाजी गोविन्दजी के दर्शन करने पहुँचे, तो वहाँ के वैष्णवों ने उन्हें गोविन्दजी का प्रसाद पाने के लिए विशेष आग्रह किया।
बाबाजी के बार-बार मना करने और हाथ-जोड़ने पर भी वैष्णवों ने उनकी एक न मानी। अंततः वैष्णव-अपराध के भय से उन्हें विवश होकर वह प्रसाद ग्रहण करना ही पड़ा। लेकिन इस घटना के पीछे एक गहरा आध्यात्मिक नियम छिपा था, जिसका परिणाम उन्हें अगले ही दिन देखने को मिला।
अँगूठे की जड़ता और रहस्य का समाधान
दूसरे दिन जब बाबाजी शेषरात्रि में नित्य-कृत्य समाप्त कर हाथ में माला-झोली लेकर वृन्दावन जाने को उद्यत हुए, तो उनकी चिंता और आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। उनके दाहिने हाथ का अँगूठा पूरी तरह जड़ और निश्चल हो गया था।
न तो कोई व्यथा थी, न वेदना और न ही कोई ज्वाला-यन्त्रणा, परंतु विडंबना यह थी कि वे माला फेरने में असमर्थ हो गए थे। यह सब क्यों हुआ, यह उनकी समझ से बाहर था। व्याकुल होकर वे भागे-भागे गोविन्दकुण्ड के श्रीमनोहरदास बाबाजी के पास पहुँचे और उनके चरणों में गिरकर रोदन करने लगे।
मनोहरदास बाबा के पूछने पर उन्होंने अपनी सारी व्यथा कह सुनाई। जब मनोहरदास बाबा ने कल के प्रसाद के बारे में पूछा और वृन्दावनदास जी ने बताया कि उन्होंने गोविन्दजी के मंदिर में प्रसाद पाया था, तब उन्होंने पुजारी से इसका सत्य पता लगाने को कहा।
सत्य का अनुसंधान और प्रायश्चित्त
जब वृन्दावनदास बाबा ने वृन्दावन जाकर गोविन्दजी के पुजारी से पूछा, तो उन्होंने सत्य उजागर करते हुए बताया कि वह भोग किसी वेश्या के द्रव्य से लगाया गया था।
यह बात जब वृन्दावनदास जी ने मनोहरदास बाबा को बताई, तो वे बोले—'तेरे पेट को इस प्रकार का अन्न कब सह्य हो सकता है! जा, तीन दिन तक नित्य श्रीकुण्ड में स्नान कर भीजे कपड़े से गिरिराज की परिक्रमा लगा। मार्ग में जो मिले, उसके अतिरिक्त और कुछ न खाना।'
बाबाजी ने गुरुवचन का पूर्ण निष्ठा से पालन किया। चौथे दिन उनके अँगूठे की जड़ता पूरी तरह समाप्त हो गई और वह पुनः पूर्ववत कार्य करने लगा।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
यह कथा हमें सिखाती है कि हमारे आहार और अन्न की शुद्धता का हमारे मानसिक तथा आध्यात्मिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। अपवित्र या अनैतिक स्रोतों से प्राप्त अन्न साधना में बाधा उत्पन्न करता है।
साथ ही, यह प्रसंग अनन्य हरिनाम जप, संतों के प्रति आदर और भगवद्-भक्ति में अनुशासन के महत्व को रेखांकित करता है।
भक्ति का संदेश
भक्ति केवल बाह्य दिखावा नहीं, बल्कि आचार-विचार की निर्मलता और अंतःकरण की पवित्रता का नाम है। भगवान के नाम का निरंतर स्मरण और गुरुजनों के मार्गदर्शन पर अटूट विश्वास ही साधक को हर संकट से उबारता है और उसकी आध्यात्मिक यात्रा को सुगम बनाता है।
कथा का सार
यह प्रसंग हमें आहार की शुद्धि, हरिनाम की महिमा और सच्ची साधना की याद दिलाता है। ऐसी और अध्यात्मिक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।