ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 28

श्रीस्वामी बलदेवदासजी: कृपा-सिद्धि, रणछोरजी के दर्शन और ब्रज-साधना की अलौकिक गाथा

बाल्यावस्था में द्वारका में रणछोरजी के साक्षात् दर्शन, गुरु ठाकुरदासजी की कृपा, विलासगढ़ में श्रीजी द्वारा प्रसाद भेजना और श्रीस्वामी बलदेवदासजी के सिद्ध जीवन की प्रेरणादायक कथा।

श्रीस्वामी बलदेवदासजी: कृपा-सिद्धि, रणछोरजी के दर्शन और ब्रज-साधना की अलौकिक गाथा
श्रीस्वामी बलदेवदासजी: कृपा-सिद्धि, रणछोरजी के दर्शन और ब्रज-साधना की अलौकिक गाथा — ब्रज के भक्त भाग 1

परमार्थ जगत में कभी-कभी साधना से पहले सिद्धि प्राप्त होती है, और नित्य-सिद्ध या कृपा-सिद्ध भक्तों के जीवन में भगवान की कृपा स्वतः प्रवाहित होती है। ऐसे ही सिद्ध महात्मा श्रीस्वामी बलदेवदासजी का जीवन त्याग, वैराग्य और भगवत्कृपा का एक जीवंत प्रकाशस्तंभ है।

द्वारका में रणछोरजी के साक्षात् दर्शन और दीक्षा

व्रज के एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे बलदेवदासजी आठ वर्ष की अल्पायु में बड़े भाई की मृत्यु के बाद वीतराग होकर घर से निकल पड़े और द्वारका पहुँचे। रणछोरजी के मन्दिर में जब भोग लग रहा था, तब एक अलौकिक आवेश में वे परदा हटाकर भीतर घुस गए और देखा कि भगवान मूर्ति रूप में सिंहासन पर और प्रत्यक्ष रूप में नीचे बैठकर भोग आरोग रहे हैं।

उसी रात रणछोरजी की आज्ञा से वे दिल्ली के पास लुकसर ग्राम में उनके परम भक्त ठाकुरदासजी के पास पहुँचे। ठाकुरदासजी ने उन्हें प्रेम से अपना लिया, मन्त्र-दीक्षा दी और भजन की रीति सिखाई। गुरुदेव की सेवा करते हुए बलदेवदासजी का भक्तिभाव दिन-प्रतिदिन चरम सीमा पर पहुँच गया।

भरे रास्ते में प्रेतात्माओं का उद्धार और विलासगढ़ का प्रसंग

गुरुदेव के धाम पधारने के बाद बलदेवदासजी ने चार धाम की यात्रा की और फिर वृन्दावन में रहकर नित्य भजन-कीर्तन में लीन हो गए। एक बार परिक्रमा के दौरान उन्हें कुछ प्रेतात्माएं मिलीं जिन्होंने बताया कि उन्होंने ठाकुर-सेवा की सामग्री का स्वयं उपभोग किया था, इसलिए वे इस योनि को प्राप्त हुए हैं।

एक बार बरसाने के पास विलासगढ़ में लता के नीचे भजन करते हुए तीन दिन बीत गए और वे अन्न-जल से रहित थे। तब स्वयं श्रीराधारानी ने पुजारी को स्वप्न में आदेश देकर अपना प्रसाद उनके पास भिजवाया। श्रीजी के इस अगाध प्रेम को देख उनकी स्वरूप-सिद्धि हो गई और वे मंजरी रूप में राधा-कृष्ण की सेवा में तल्लीन हो गए।

पादुका और विग्रह समर्पण तथा दिव्य लीला संवरण

जीवन के अंतिम पड़ाव पर उन्होंने अपने सेवित श्रीविग्रह और गुरुदेव की पादुका अलवर के पास बहादुरपुर के श्रीशिवदयालजी (जो आगे चलकर 'सरसमाधुरी शरणजी' के नाम से प्रसिद्ध हुए) को सौंप दी।

सब कुछ समर्पित कर अपने पास केवल शरीर रखने के पश्चात् संवत २०१५ (सन् १९५८), आषाढ सुदी नवमी को उन्होंने अपनी लौकिक लीला का संवरण कर दिव्य लीला में प्रवेश किया।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

यह प्रसंग हमें सिखाता है कि भगवान अपने अनन्य और निष्काम भक्तों के योगक्षेम का स्वयं वहन करते हैं। यदि हृदय में ईश्वर प्राप्ति की सच्ची तड़प और समर्पण हो, तो भगवान हर परिस्थिति में अपने भक्त की सुधि लेते हैं।

भक्ति का संदेश

सच्ची भक्ति बाह्य आडंबरों से परे है। भगवान केवल और केवल शुद्ध प्रेम, अनन्य निष्ठा और दीनता के भूखे हैं। भगवद्स्मरण और संत-सेवा ही जीवन को परमार्थ की ओर ले जाने वाला एकमात्र मार्ग है।

कथा का सार

श्रीस्वामी बलदेवदासजी का पावन जीवन कृपा-सिद्धि, वैराग्य और अनन्य भगवद्प्रेम का प्रतीक है। ऐसी और प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के अन्य अध्याय अवश्य पढ़ें।