ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 44
श्रीशचीनन्दनदास बाबा: बरसाने के श्मशान की छतरी में 'राई-राई' जपते हुए 110 वर्ष की सिद्ध साधना
बरसाने के भानुसरोवर तट पर श्मशान भूमि की जीर्ण-शीर्ण छतरी में निवास करने वाले 110 वर्ष से अधिक आयु के सिद्ध महात्मा श्रीशचीनन्दनदास बाबा के जीवन की प्रेरणादायक गाथा।

बरसाने के भानुखर (भानुसरोवर) के तट पर स्थित श्मशान भूमि की एक प्राचीन छतरी में रहकर निरंतर 'राई-राई' (राधे-राधे) का जप करने वाले, 110 वर्ष से अधिक आयु के सिद्ध महात्मा श्रीशचीनन्दनदास बाबा का जीवन अनन्य राधा-निष्ठा और पराकाष्ठा के वैराग्य का जीवंत प्रतीक है।
भानुसरोवर की श्मशान छतरी और बाबा की सिद्ध साधना
सन् १९७२ के माघ मास में जब लेखक बरसाने के श्रीरामजीवनदास बाबा के साथ श्रीशचीनन्दनदास बाबा के दर्शन करने पहुँचे, तब उनकी आयु ११० वर्ष से अधिक थी। वे ब्रज के सबसे प्राचीन सिद्ध महात्माओं में गिने जाते थे। वे बरसाने के भानुसरोवर के तट पर श्मशान भूमि की एक जीर्ण-शीर्ण छतरी में निवास करते थे।
दृष्टि-शक्ति खो जाने के बावजूद उनके ओष्ठ निरंतर हिलते रहते थे और उनके कंठ से 'राई, राई' (राधे, राधे) शब्द का अजस्र उच्चारण होता रहता था। उनके पास कोई बहुमूल्य वस्तु नहीं थी, सिवाय एक टाट के आसन और गुदड़ी के। वे बाहरी संसार से पूरी तरह विरक्त होकर सदा प्रभु के चरणों की छाया में उनके मधुर चिंतन में डूबे रहते थे।
राधारानी के प्रति अनन्य निष्ठा और फूलों की सेवा
शचीनन्दनदास बाबा की राधारानी में अटूट निष्ठा थी। वे होली के दिनों में सुबह से शाम तक भानुखर छतरी से लेकर श्रीजी के मन्दिर तक के मार्ग में झाड़ लगाया करते थे और श्रीजी के श्रृंगार के लिए फूल-चयन करते थे। एक बार कोसी के बगीचे में फूल तोड़ने की इच्छा होने पर जब मालिक ने मना किया, तो चोरों के साथ संवाद और उनकी सहायता से उन्होंने श्रीजी के लिए फूल प्राप्त किए, जिसके प्रभाव से वे चोर भी भक्त बन गए।
वे दिनभर छतरी में भजन करते और संध्या समय एक बार मधुकरी करते थे। वृद्धावस्था में जब दाँत नहीं रहे, तब वे सूखी रोटियों का चूरा कर पानी के साथ निगल लेते थे और जिह्वा की स्वाद-इच्छा को मिटाने के लिए 'राई-राई' नाम का रटन करने लगते थे।
नित्यधाम गमन
संन १९७४, वैशाख मास के कृष्णपक्ष की दशमी के दिन श्रीशचीनन्दनदास बाबा ने अपनी भौतिक लीला का संवरण किया और नित्य-लीला में प्रवेश किया। उनका पूरा जीवन यह सिद्ध करता है कि भगवान के नाम-जप और राधारानी की कृपा के आगे संसार की कोई भी माया टिक नहीं सकती।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि साधक को संसार के प्रपंचों और धन-दौलत की परवाह किए बिना केवल भगवन्नाम (राधे-राधे) के आश्रित रहना चाहिए। सच्ची साधना और निरंतर नाम-जप मनुष्य को भौतिक शरीर में रहते हुए भी दिव्य शांति का अनुभव कराते हैं।
भक्ति का संदेश
राधारानी और श्रीकृष्ण का नाम ही मनुष्य की समस्त भूख, प्यास और सांसारिक दुखों को हरने वाला कल्पतरु है। जब हृदय पूरी तरह राधामय हो जाता है, तब भगवान स्वयं उस भक्त के योग-क्षेम का भार वहन करते हैं।
कथा का सार
श्रीशचीनन्दनदास बाबा का पावन चरित्र अचंचल वैराग्य, नाम-निष्ठा और राधारानी के प्रति अगाध प्रेम का एक अनूठा प्रकाशस्तंभ है। ऐसी और प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के अन्य अध्याय अवश्य पढ़ें।