ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 30
श्रीरामदास काठियाबाबा: हठयोग, योग-विभूतियाँ और प्रेम-भक्ति की अलौकिक गाथा
उत्तराखंड के शीतकालीन वनों में कठोर साधना से लेकर वृन्दावन में श्रीरामदास काठियाबाबा के महान संत बनने, उनकी योग-शक्तियों और प्रेम-भक्ति का प्रेरणादायक जीवन प्रसंग।

उत्तराखंड की कड़ाके की ठंड में कठोर तपस्या से लेकर वृन्दावन के प्रसिद्ध काठियाबाबा आश्रम की स्थापना तक, श्रीरामदास काठियाबाबा का जीवन त्याग, अगाध योग-शक्ति, गुरुभक्ति और अंततः प्रेम-ज्वर में डूबी हुई पराकाष्ठा की भक्ति का अनूठा उदाहरण है।
बाल्यावस्था में रामनाम की दीक्षा और उत्तराखण्ड की कठोर साधना
अमृतसर के पास लोनाचामारी ग्राम में जन्मे बालक रामदास ने बचपन में ही परमहंस संन्यासी से रामनाम की महिमा जानी और विवाह करने से इंकार कर दिया। वटवृक्ष के नीचे गायत्री मंत्र का पुरश्चरण करने के बाद उन्हें ज्वालामुखी जाने का संकेत मिला, किंतु मार्ग में जटाजूटधारी दिव्य संन्यासी के दर्शन होने पर उन्होंने उन्हीं से दीक्षा ले ली।
उत्तराखंड के गहन वनांचल में उन्होंने अपने गुरु श्रीदेवदासजी महाराज के सान्निध्य में पंचधूनी, प्रचण्ड शीत और कठोर उपवास जैसी कृच्छ्र साधनाओं के माध्यम से आध्यात्मिक जीवन के उच्चतम शिखरों को स्पर्श किया। गुरुदेव की अगाध योग-शक्ति और उनकी छत्रछाया ने बालक रामदास को एक सिद्ध महात्मा बना दिया।
वृन्दावन आगमन, काठियाबाबा आश्रम और योग-विभूतियाँ
गुरुदेव के आदेशानुसार वे वृन्दावन आए और यहाँ के प्राचीन कुंभ मेले के समय काठियाबाबा आश्रम की स्थापना की। वे टाट का केवल एक टुकड़ा (कन्था) लपेटते थे, इसलिए उन्हें 'काठियाबाबा' कहा जाने लगा। वे रात-दिन ध्यान और समाधि में लीन रहते थे।
उनके जीवन में अनेक योग-विभूतियाँ और चमत्कार देखने को मिले, जैसे राजाओं और बड़े-बड़े विद्वानों का उनके सामने नतमस्तक होना, जल पर चलना या बीमारों को स्पर्श मात्र से रोगमुक्त कर देना। किंतु इन सबसे ऊपर उनकी भगवान के प्रति अनन्य प्रेम-भक्ति थी।
नित्यधाम गमन
अपने जीवन के अंतिम दिनों में वे पूरी तरह प्रेम-ज्वर और युगल सरकार की निकुंज लीलाओं के स्मरण में डूब गए। सन् १९०९ में उन्होंने अपनी भौतिक लीला का संवरण कर नित्यधाम में प्रवेश किया। उनके पट्टू शिष्य श्रीसंतदास काठियाबाबा ने उनकी परंपरा को विश्वभर में प्रसारित किया।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि आध्यात्मिक जीवन में सफलता पाने के लिए अटूट अनुशासन, गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण और कठिन साधना की आवश्यकता होती है। योग और सिद्धियाँ साधन हैं, साध्य तो केवल ईश्वर का प्रेम है।
भक्ति का संदेश
हठयोग और तपस्या भले ही शरीर को साधती हैं, किंतु हृदय को निर्मल केवल भगवन्नाम और प्रेम-भक्ति ही करती है। जब साधक का मन पूरी तरह भगवान में रम जाता है, तब संसार की कोई भी शक्ति उसे विचलित नहीं कर सकती।
कथा का सार
श्रीरामदास काठियाबाबा का पावन चरित्र योग, तपस्या और रसिक भक्ति का एक अमर प्रकाशस्तंभ है। ऐसी और प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के अन्य अध्याय अवश्य पढ़ें।