ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 45

श्रीप्रियाशरण बाबाजी: पण्डित रामकृष्ण दास बाबा के प्रिय शिष्य और रसिक निकुंज साधक

बिहार के बक्सर से वृन्दावन आकर पण्डित रामकृष्ण दास बाबा के सान्निध्य में भजन करने वाले श्रीप्रियाशरण बाबाजी के जीवन की प्रेरणादायक गाथा, उनकी महावाणी की निष्ठा और गोवर्धन में नित्यधाम गमन।

श्रीप्रियाशरण बाबाजी: पण्डित रामकृष्ण दास बाबा के प्रिय शिष्य और रसिक निकुंज साधक
श्रीप्रियाशरण बाबाजी: पण्डित रामकृष्ण दास बाबा के प्रिय शिष्य और रसिक निकुंज साधक — ब्रज के भक्त भाग 1

बचपन के संस्कारों और विद्यालय की छुट्टियों में वृन्दावन पहुँचकर महापुरुष पण्डित रामकृष्ण दास बाबाजी के प्रेम-पाश में बंधने वाले श्रीप्रियाशरण बाबाजी का जीवन अनन्य गुरुभक्ति, महावाणी के पाठ और रसिक साधना का एक पावन प्रतीक है।

प्रारंभिक जीवन, वृन्दावन आगमन और पण्डित बाबा की शरण

श्रीप्रियाशरण बाबा का जन्म अगहन शुक्लपक्ष दशमी संवत १९५२ को बिहार के बक्सर प्रांत के सुनहारा ग्राम में एक कान्यकुब्ज चतुर्वेदी परिवार में हुआ था। विद्याध्ययन के लिए वाराणसी जाने और श्यामदासदेवजी महाराज से दीक्षा प्राप्त करने के बाद, विद्यालय की छुट्टियों में वृन्दावन आने पर उनकी भेंट पण्डित रामकृष्ण दास बाबा से हुई।

पण्डित बाबा ने उनमें एक होनहार बालक के दर्शन किए और अपने निःस्वार्थ प्रेम तथा कड़े अनुशासन से उनके चरित्र का गठन किया। प्रियाशरण बाबा ने कभी रुपया-पैसा स्पर्श न करने का संकल्प लिया और पण्डित बाबा के साथ रहकर शास्त्रों का अगाध अध्ययन किया।

दिव्य शक्तियों का विकास और महावाणी की कथा

गोपाल मन्त्र के अनुष्ठान के समय उनमें कुछ ऐसी दिव्य शक्तियों का विकास हुआ जिससे उन्हें अज्ञात घटनाओं का पूर्वाभास होने लगा, किंतु पण्डित बाबा के आदेश पर उन्होंने केवल हरिनाम जप को ही अपना सर्वस्व माना।

वे टटिया स्थान के संतों से वाणी-ग्रंथों का गंभीर अध्ययन करने के बाद विशेष रूप से वाणी-ग्रंथों की ही कथा कहा करते थे। उनकी कथा में श्रोता भाव-मग्न हो जाते थे। वे बहुत स्पष्टवादी थे और समाज या संप्रदाय की त्रुटियों पर खुलकर अपने विचार रखते थे।

नित्यधाम गमन

संवत २०३३ फाल्गुन कृष्णपक्ष प्रतिपदा के दिन, लगभग ६७ वर्ष ब्रजवास करने के पश्चात् ८१ वर्ष की आयु में गोवर्धन की तलहटी में उन्होंने राधा नाम का जप करते हुए नित्य-निकुंज में प्रवेश किया। उनकी इच्छा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार गोवर्धन में ही संपन्न हुआ।

देखरेख और इस कथा से क्या सीख

यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सदगुरु का सान्निध्य और उनका अनुशासन साधक के जीवन के सारे विकारों को दूर कर देता है। भगवान का नाम और व्रजधाम की सेवा ही जीवन की सबसे बड़ी और सच्ची पूंजी है।

भक्ति का संदेश

व्रजधाम में वास करते हुए निरंतर महावाणी का पाठ और राधा-नाम का जप करना ही मनुष्य के भवसागर को पार करने का एकमात्र और सबसे सहज साधन है। सच्ची भक्ति अहंकार और संकीर्णता से मुक्त होती है।

कथा का सार

श्रीप्रियाशरण बाबाजी का पावन चरित्र निष्ठा, स्पष्टवादिता और अनन्य गुरुभक्ति का एक अमर प्रतीक है। ऐसी और प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के अन्य अध्याय अवश्य पढ़ें।