ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 22
श्रीप्रमानन्द गोस्वामीप्रभुपाद: वैराग्य, दैन्य और सेवा की अलौकिक मूर्ति
श्रीगुरुवट, वृन्दावन के श्रीप्रमानन्द गोस्वामीप्रभुपाद के जीवन का प्रसंग, जिसमें उनके भोग से वैराग्य, तीन गोल मिर्चों के माध्यम से प्रभु संपत्ति की ममता और वैष्णव सेवा का सुंदर चित्रण है।

अल्पवयस्कता में विशाल धन-सम्पत्ति मिलने पर उच्छृंखल हुए श्रीप्रमानन्द गोस्वामीप्रभुपाद का एक महात्मा की प्रेरणा से जीवन कैसे बदला और कैसे उन्होंने निताईचाँद की संपत्ति को अपनी मानकर उसकी रक्षा और साधु-सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया, यह कथा हमें सच्ची विनम्रता और वैराग्य का पाठ पढ़ाती है।
महात्मा की एक पुकार और जीवन में वैराग्य का उदय
श्रीगुरुदेव के श्रीसिद्धानन्द गोस्वामीप्रभुपाद के वृन्दावन प्राप्ति के पश्चात् उनके संसार के संचालन का भार उनके छोटे भाई श्रीप्रमानन्द गोस्वामीप्रभु पर पड़ा। अल्पवयस्कता में विशाल धन-सम्पत्ति और सम्मान प्राप्त करने के कारण वे कुछ समय के लिए उच्छृंखल हो गए। जब उन्होंने लगभग सारा धन खर्च कर डाला, तब एक दिन पुराने मदनमोहन मन्दिर के एक महात्मा ने एकांत में उनसे कहा—‘प्रभु, भला ऐसे कब तक चलेगा? आप तो श्रीमद्भागवत के अभिन्न विग्रह श्रीनिताईचाँद के वंशधर हैं। उन्होंने जिस कार्य के लिए आपको जगत में भेजा है, उसे करेंगे कब?’
प्रभुपाद बहुत लज्जित हुए और उसी समय से उनका जीवन पूरी तरह वैराग्यमय हो गया। वे एक धोती के दो टुकड़े कर बहिर्वास की तरह धारण करते, शीतकाल में एक साधारण कम्बल और ग्रीष्म में एक मोटी चादर का उपयोग करते थे। घर के बाहर बैठकर नाम-स्मरण करते और यदि कोई उनका परिचय पूछता, तो स्वयं को श्रीगुरुदेव का शिष्य और परिचारक बताते। सबको प्रणाम करना और दीनतापूर्वक जीवन बिताना ही उनका स्वभाव बन गया।
तीन गोल मिर्च का प्रसंग: प्रभु संपत्ति के प्रति अत्यधिक सावधानी
सिद्ध श्रीमाधवदास बाबाजी उनके शिष्य थे जो उनकी सेवा का कुछ भार संभालते थे। एक दिन प्रभुपाद ने उनसे उणडाई बना लाने को कहा। दूसरे दिन प्रातः जब माधवदास बाबा उन्हें प्रणाम करने गए, तो प्रभुपाद बोले—‘हाँ बाबा, बस प्रमाण पर्याप्त ही ठीक है। सेवा करने को कहूँगा, तो कुछ-न-कुछ निताईचाँद की सम्पत्ति की बर्बादी ही करोगे। जानते नहीं, कल उणडाई बनाते समय तीन गोल मिर्च फेंक गए थे?’
इसके एक दिन पूर्व अपनी पहली शास्त्रवाणी पर पश्चात्ताप करते हुए उन्होंने कहा था—‘मैंने निताईचाँद का न जाने कितना धन व्यर्थ लुटा दिया। यदि वे पहले ही मुझे सद्बुद्धि दे देते, तो उस धन से प्रभु का कितना कार्य होता।’ एक लखपति व्यक्ति के लिए तीन गोल मिर्चों का क्या मूल्य, पर वे अब भली-भांति समझ चुके थे कि संसार में कोई भी वस्तु उनकी अपनी नहीं है, सब कुछ प्रभु का है।
मर्यादा की रक्षा और वैष्णव सेवा का अनुपम उदाहरण
निताईचाँद की संपत्ति के प्रति अत्यधिक सतर्क रहने के बावजूद, प्रभुपाद वैष्णवों की सेवा में उसका जी खोलकर उपयोग करते थे। किसी वैष्णव की पीड़ा या विपत्ति की बात सुनते ही वे तुरंत चिकित्सा, अर्थ या सेवा की व्यवस्था करते थे। दूर-दूर से आने वाले साधु-वैष्णवों की जमातों के लिए पक्के भोजन की सामग्री चुपचाप भिजवा देते और कभी अपना परिचय नहीं देते थे। उनके इस अगाध त्याग और लोक-कल्याणकारी स्वभाव के कारण बंगाल, बिहार, पंजाब और काबुल तक के लोगों ने उनके चरणों का आश्रय लिया।
वे दैन्य-भक्ति की मूर्ति होने के साथ-साथ मर्यादा की रक्षा में भी सदैव तत्पर रहते थे। शिष्यों को शिक्षा देते हुए वे हमेशा मर्यादा का पालन करने पर बल देते थे—जैसे किसी को प्रसाद देना हो तो ऊंचे स्थान पर खड़े होकर नहीं, बल्कि निम्न स्थान पर या सामने खड़े होकर देना चाहिए, अन्यथा अपराध से भक्ति क्षीण होती है। सन १९६६ में ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया के दिन उन्होंने नित्य वृन्दावन लाभ किया।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
यह प्रसंग सिखाता है कि जीवन में भोग-विलासिता क्षणिक है और सच्चा सुख वैराग्य तथा विनम्रता में ही निहित है। अपनी संपत्ति या अधिकारों को अपना अहंकार न मानकर उन्हें ईश्वर की धरोहर समझना चाहिए और प्रत्येक वस्तु का सदुपयोग सेवा भाव से करना चाहिए।
भक्ति का संदेश
प्रभुपाद का जीवन इस बात का प्रमाण है कि भगवान के चरणों में पूर्ण समर्पण और साधु-वैष्णवों की निष्काम सेवा ही मनुष्य के जीवन को सार्थक बनाती है। सच्ची भक्ति वही है जो अहंकार को गलाकर दीनता और प्रेम का संचार करे।
कथा का सार
श्रीप्रमानन्द गोस्वामीप्रभुपाद का जीवन त्याग, सेवा और मर्यादा का एक पावन प्रतीक है। ऐसी और प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के अन्य अध्याय अवश्य पढ़ें।