ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 34

श्रीललितकिशोरीजी एवं श्रीललितमाधुरीजी: शाहजी मंदिर के संस्थापक और राधारानी के अनन्य निकुंज भक्त

1857 के विप्लव के समय अंगेज मजिस्ट्रेट के सामने निर्भीक रहने वाले, लखनऊ के रईस शाह कुन्दनलाल (श्रीललितकिशोरीजी) और शाह फुन्दनलाल (श्रीललितमाधुरीजी) के वृन्दावन आगमन और अनन्य प्रेमाभक्ति की गाथा।

श्रीललितकिशोरीजी एवं श्रीललितमाधुरीजी: शाहजी मंदिर के संस्थापक और राधारानी के अनन्य निकुंज भक्त
श्रीललितकिशोरीजी एवं श्रीललितमाधुरीजी: शाहजी मंदिर के संस्थापक और राधारानी के अनन्य निकुंज भक्त — ब्रज के भक्त भाग 1

वैभव और रियासत के सुखों को त्यागकर, 1857 के विप्लव के समय मृत्यु से न डरने वाले और वृन्दावन की कुंज-गलियों में श्रीराधारानी के दास्य भाव की पराकाष्ठा दिखाने वाले दो महान भाई शाह कुन्दनलाल (श्रीललितकिशोरीजी) और शाह फुन्दनलाल (श्रीललितमाधुरीजी) का जीवन त्याग और प्रेम का अद्वितीय संगम है।

1857 के विप्लव में निर्भीकता और वृन्दावन आगमन

लखनऊ के प्रतिष्ठित रईस शाह बिहारीलालजी के पौत्र शाह कुन्दनलाल (श्रीललितकिशोरीजी) और शाह फुन्दनलाल (श्रीललितमाधुरीजी) बचपन से ही कृष्णलीला में मग्न रहते थे। 1857 के विप्लव के दौरान क्रांतिकारियों की मदद करने के आरोप में जब कुन्दनलालजी को अंग्रेजी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, तो उन्होंने पूरी निर्भीकता से स्वीकार किया कि उन्होंने व्रज की प्रजा की रक्षा के लिए ऐसा किया था। उनकी इस धर्मपरायणता और सच्चाई को देखकर मजिस्ट्रेट ने उन्हें बरी कर दिया।

बाल्यावस्था में वृन्दावन आने पर दोनों भाइयों का मन श्रीराधारमण लाल के चरणों में ऐसा रमा कि वे सदा के लिए वृन्दावनवासी बन गए। उन्होंने निधिवन के निकट एक भव्य संगमरमर के मंदिर का निर्माण कराया, जो 'ललित-निकुंज' या 'शाहजी का मंदिर' के नाम से विश्वविख्यात हुआ।

वृन्दावन वास, व्रजरज के प्रति निष्ठा और निकुंज प्रवेश

वृन्दावन आने के बाद दोनों भाइयों का जीवन पूरी तरह से ठाकुर-सेवा, कीर्तन और पद-रचना में बीत गया। वे अति सरल, दैन्यभावसंपन्न और व्रज तथा व्रजरज के प्रति अगाध निष्ठा रखने वाले थे। वे कभी भी व्रज की सीमा से बाहर नहीं गए और व्रजरज के निरंतर स्पर्श के लिए अत्यधिक सावधान रहते थे।

श्रीललितकिशोरीजी ने राधारानी की अनन्य उपासना करते हुए संवत 1930 में और श्रीललितमाधुरीजी ने संवत 1942 में अपनी इच्छा से रज का चबूतरा तैयार करवाकर कीर्तन करते हुए अपनी भौतिक लीला का संवरण किया और नित्यधाम में प्रवेश किया।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जो भक्त सांसारिक भय, पद और प्रतिष्ठा को त्यागकर पूरी तरह श्रीराधारानी और युगल सरकार के चरणों में समर्पित हो जाता है, उसकी रक्षा स्वयं भगवान करते हैं। सच्ची भक्ति सांसारिक मोह-माया से परे होती है।

भक्ति का संदेश

भगवान और उनके धाम के प्रति अगाध प्रेम ही मनुष्य के जीवन को सफल बनाता है। बाह्य वैभव चाहे कितना भी हो, यदि हृदय में राधारानी के चरणों की दास्य-भक्ति और व्रज-प्रेम है, तो वही सबसे बड़ा धन है।

कथा का सार

श्रीललितकिशोरीजी एवं श्रीललितमाधुरीजी का पावन चरित्र त्याग, वीरता, कला और रसिक भक्ति की एक अमूल्य निधि है। ऐसी और प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के अन्य अध्याय अवश्य पढ़ें।