ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 18

श्रीलालाबाबू की अद्भुत जीवन यात्रा: ऐश्वर्य से वैराग्य और भक्ति का शिखर

महाविलासी और करोड़पति लालाबाबू के जीवन की प्रेरणादायक कथा, जिन्होंने एक छोटी सी प्रेरणा से सब कुछ त्यागकर वृंदावन में अनन्य भक्ति और साधना का मार्ग अपनाया।

श्रीलालाबाबू की अद्भुत जीवन यात्रा: ऐश्वर्य से वैराग्य और भक्ति का शिखर
श्रीलालाबाबू की अद्भुत जीवन यात्रा: ऐश्वर्य से वैराग्य और भक्ति का शिखर — ब्रज के भक्त भाग 1

संसार के समस्त सुख-वैश्वर्य को ठोकर मारकर केवल भगवान के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पित कर देने वाले विरक्त संतों का जीवन हमें सच्ची भक्ति और वैराग्य का मार्ग दिखाता है।

वैभव के बीच राधारानी का दिव्य आह्वान और मोह-निद्रा भंग

कलकत्ता शहर की शीतकाल की संध्या बेला थी। महाऐश्वर्यशाली और महाविलासी लालाबाबू पालकी पर सैर करने निकले थे। गंगा-तट के एक सुरम्य स्थान पर पालकी उतारी गई, हुक्के की गुड़-गुड़ के बीच उनका मन एक अनिर्वचनीय आनंद के झूले में झूल रहा था। ठीक उसी समय पास की एक झोपड़ी से धीमर-कन्या की आवाज गूँजी—‘बाबा, उठो! दिन शेष हय गलो’—अर्थात् बाबा उठो, दिन डूब चला है।

यह वाक्य लालाबाबू के मर्मस्थल को भेद गया। उनके जीवन की मोह-निद्रा भंग हो गई और वे समझ गए कि उनके जीवन की संध्या भी आ चुकी है। परिजनों के कातर क्रंदन की उपेक्षा कर वे सब कुछ त्यागकर कंगाल वेश में वृंदावन की ओर चल पड़े। लालाबाबू का वास्तविक नाम श्रीकृष्णचन्द्र सिंह था और वे बंगाल के अत्यंत प्रतिष्ठित और धनी परिवार से ताल्लुक रखते थे।

वृंदावन में सेवा, मन्दिर निर्माण और अलौकिक परीक्षा

वृंदावन पहुँचकर उन्होंने कठोर व्रत और भजनमय जीवन अपनाया। भग्न मंदिरों और विग्रहों की दुर्दशा देखकर उन्होंने अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा ब्रज की सेवा में लगाने का संकल्प लिया। उन्होंने चौहत्तर परगने क्रय कर भव्य मंदिरों, धर्मशालाओं और देव-सेवा की विराट योजना बनाई।

एक बार कड़ेके की शीत में उन्होंने भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के विग्रह की परीक्षा लेने के लिए भोग के थाल से मक्खन की एक टिकिया मूर्ति की चाँद पर रखने को कहा। यह देखने के लिए कि विग्रह जीवित हैं या नहीं। आश्चर्यजनक रूप से वह मक्खन भगवान के अंग पर पिघलने लगा, जिससे यह सिद्ध हो गया कि श्रीविग्रह पूर्णतः जाग्रत और चैतन्य हैं।

गोवर्धन की गुफा में साधना और गुरु कृपा

भगवान के आदेशानुसार लालाबाबू ने ब्रज के तीर्थों का दर्शन करने के पश्चात् गोवर्धन में एक कच्चੀ गुफा के भीतर रहकर निरंतर भजन करना आरंभ किया। नित्यप्रति गोवर्धन की परिक्रमा और मधुकरी उनका दैनिक नियम बन गया। एक दिन गोवर्धन परिक्रमा के दौरान जब वे अपने अहंकार और पुराने द्वेष को त्यागकर रंगजी के मंदिर में भिक्षा माँगने पहुँचे, तो उनकी भेंट प्रसिद्ध महात्मा कृष्णदास बाबाजी से हुई।

उनकी निष्ठा और आंतरिक परिवर्तन को देखकर गुरुदेव ने उन्हें दीक्षा प्रदान की और गोवर्धन की गुफा में रहकर अनन्य भाव से भजन करने का निर्देश दिया।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

यह कथा हमें सिखाती है कि संसार के तमाम भौतिक सुख-सुविधाएँ और ऐश्वर्य नश्वर हैं। सच्ची शांति केवल भगवान के चरणों में शरणागत होने और आंतरिक अहंकार के पूर्ण त्याग से ही प्राप्त होती है।

भक्ति का संदेश

भक्ति किसी बाहरी दिखावे का नाम नहीं है, बल्कि यह अंतःकरण की पवित्रता, गुरु के प्रति अगाध विश्वास और भगवान के नाम में निरंतर डूब जाने की पराकाष्ठा है। जो साधक अपना अहंकार मिटाकर प्रभु की शरण में जाता है, उसे साक्षात् भगवान की कृपा और दर्शन का लाभ मिलता है।

कथा का सार

यह प्रसंग हमें महान त्याग, अनन्य हरि-भक्ति और गुरु-कृपा के महत्व की याद दिलाता है। ऐसी और आध्यात्मिक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।