ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 26

श्रीकृष्णप्रेम (रोनाल्ड निक्सन) और माँ यशोदा: पायलट से महान संत बनने की अलौकिक गाथा

प्रथम विश्वयुद्ध के अंग्रेजी पायलट रोनाल्ड निक्सन से वृन्दावन के संत श्रीकृष्णप्रेम बनने और माँ यशोदा के सान्निध्य में भगवद्प्रेम प्राप्त करने की प्रेरणादायक जीवन गाथा।

श्रीकृष्णप्रेम (रोनाल्ड निक्सन) और माँ यशोदा: पायलट से महान संत बनने की अलौकिक गाथा
श्रीकृष्णप्रेम (रोनाल्ड निक्सन) और माँ यशोदा: पायलट से महान संत बनने की अलौकिक गाथा — ब्रज के भक्त भाग 1

प्रथम विश्वयुद्ध के भयंकर युद्धक्षेत्र में दिव्य शक्ति द्वारा बचाए गए अंग्रेजी युवा रोनाल्ड निक्सन का भारत आकर बौद्ध, वैदिक और वैष्णव साधना मेंलीन होना तथा माँ यशोदा के आनुगत्य में 'श्रीकृष्णप्रेम' बनकर भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात् साक्षात्कार करना त्याग और भक्ति का एक अद्वितीय अध्याय है।

प्रथम विश्वयुद्ध का दिव्य अनुभव और भारत आगमन

१० मई १८९८ को इंग्लैंड में जन्मे रोनाल्ड निक्सन ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में ऑनर्स की डिग्री प्राप्त की थी। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान रॉयल एयरफोर्स में बमवर्षक विमान के चालक के रूप में जब वे बेलजियम जा रहे थे, तब आसमान में एक दिव्य प्रकाश ने उनके विमान पर नियंत्रण कर लिया और उन्हें सुरक्षित वापस पहुँचा दिया। अस्पताल में उन्हें भारत जाकर आध्यात्मिक शक्तियों का अनुसंधान करने का आंतरिक संदेश मिला।

सेना से इस्तीफा देने के बाद वे लखनऊ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक बने। वहाँ उनकी भेंट वािसचांसलर डॉ. ज्ञानेन्द्रनाथ चक्रवर्ती और उनकी स्नेहमयी पत्नी मणिकादेवी से हुई। मणिकादेवी ने उन्हें 'गोपाल' कहकर पुकारा और निक्सन उन्हें अपनी 'माँ' मानने लगे।

संन्यास दीक्षा और 'उत्तर-वृन्दावन' की स्थापना

भारतीय धर्मग्रन्थों, विशेषकर श्रीमद्भागवत और वेदों का गहन अध्ययन करने के बाद निक्सन ने मणिकादेवी से संन्यास दीक्षा लेने का संकल्प किया। मणिकादेवी ने वृन्दावन जाकर पहले स्वयं दीक्षा ली और फिर निक्सन को दीक्षा दी, जिसके बाद वे 'माँ यशोदा' और निक्सन 'श्रीकृष्णप्रेम' के नाम से प्रसिद्ध हुए।

चक्रवर्ती महाशय के स्वर्गवास के बाद माँ यशोदा ने अल्मोड़ा के पास मिर्तोला में योगेश्वर-शिवस्थान के निकट 'उत्तर-वृन्दावन' आश्रम की स्थापना की। यहाँ उन्होंने राधिका-कृष्ण की युगल मूर्तियों की स्थापना कर सेवा का दिव्य वातावरण तैयार किया, जहाँ देश-विदेश के कई साधक आकर भजन-कीर्तन में लीन हो गए।

अलौकिक दृष्टियाँ, ठाकुर-सेवा और दिव्य अनुभूतियाँ

उत्तर-वृन्दावन के इस दिव्य परिवेश में माँ यशोदा और श्रीकृष्णप्रेम ने अनन्य भाव से ठाकुर की सेवा की। एक बार ठंड के समय ठाकुर के मन्दिर से 'दादा, ठण्ड लग रही है' की आवाज आने पर श्रीकृष्णप्रेम का हृदय प्रेम से भर गया और उनकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली।

श्रीकृष्णप्रेम ने न केवल वेदों और शास्त्रों का गंभीर अध्ययन किया, बल्कि अपनी साधना और गुरुनिष्ठा के बल पर परात्पर तत्त्व श्रीराधा-कृष्ण के साक्षात दर्शन और उनके प्रेम की उपलब्धि की। उनका पूरा जीवन गुरुभक्ति, नाम-जप और भगवद्प्रेम का जीवंत प्रतीक बन गया।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्ची आध्यात्मिकता किसी देश, जाति या संस्कृति की सीमा में बंधे नहीं होती। यदि हृदय में सच्ची तड़प, गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण और ईश्वर प्राप्ति की तीव्र इच्छा हो, तो भगवान किसी भी रूप में साधक को अपने दर्शन देकरकृतार्थ कर सकते हैं।

भक्ति का संदेश

भगवान अपने भक्तों के प्रेम के भूखे होते हैं। निष्काम भाव से की गई गुरु-सेवा और भगवत्-स्मरण ही मनुष्य के जीवन को सार्थक बनाती है तथा उसे भवसागर से पार उतारकर दिव्य प्रेम का अधिकारी बनाती है।

कथा का सार

श्रीकृष्णप्रेम (रोनाल्ड निक्सन) और माँ यशोदा का जीवन त्याग, गुरुनिष्ठा और प्रेम की पराकाष्ठा है। ऐसी और प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के अन्य अध्याय अवश्य पढ़ें।