ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 27
श्रीकृष्णप्रेम और भिखारिन भक्त: अभेद दृष्टि, व्रजरज का महत्व और प्रेम की पराकाष्ठा
श्रीकृष्णप्रेम के जीवन का वह प्रसंग जिसमें उनकी ब्रज-भावना, यमुना-जल और व्रजरज के प्रति अगाध श्रद्धा तथा भिखारिन भक्त के लाए चने-बादाम के प्रसाद को प्रेम से स्वीकार करने की सुंदर गाथा है।

यद्यपि श्रीकृष्णप्रेम पश्चिमी परिवेश से आए थे, किंतु उनके प्राणों में ब्रज, व्रजरज, यमुना-जल और भगवान की मूर्तियों के प्रति जो अगाध आदर भाव था, वह किसी भी साधारण भारतीय से कहीं अधिक पवित्र और सजीव था। भिखारिन भक्त के हाथ का सादा प्रसाद ग्रहण करने और कीर्तन में नृत्य करने की उनकी यह कथा प्रेम और समता का पाठ पढ़ाती है।
व्रज, यमुना और व्रजरज के प्रति अनन्य निष्ठा
साधारण लोग मन्दिर की मूर्ति को जड़ पत्थर या वर्षाऋतु के यमुना-जल को केवल गंदा मान लेते थे, किंतु श्रीकृष्णप्रेम के लिए ये सब साक्षात् चिन्मय और आराध्य थे। जब कोई व्रजरज को साधारण धूल समझकर उसकी उपेक्षा करता, तो वे बड़े आदर से समझाते कि जिस रज को स्वयं भगवान ने अपने शरीर में लपेटा है और भक्षण किया है, वह साधारण धूल कैसे हो सकती है?
उनका रोम-रोम ब्रज के कण-कण के प्रति समर्पित था। उनकी दृष्टि में भगवान के विग्रह और उनके धाम की हर वस्तु अप्राकृत एवं दिव्य थी, जिसमें भौतिकता का कोई लेश नहीं था।
भिखारिन भक्त का प्रेम और श्रीकृष्णप्रेम की सहजता
एक बार वृन्दावन में जगन्नाथ घाट पर ठहरे श्रीकृष्णप्रेम से एक भिखारिन-भक्त ने पूछा कि उनके ठाकुर को क्या पसंद है। उन्होंने सहर्ष कहा कि ठाकुर को चना-चबेना बहुत पसंद है। वह भिखारिन चना की जगह बादाम ले आई और घाट पर ईंट से पीसकर, अपनी मैली धोती के पल्ले से छानकर पेय ले आई।
श्रीकृष्णप्रेम ने बिना किसी संकोच या बाहरी औपचारिकता के उस पेय को ठाकुर को अर्पित किया और स्वयं प्रेम से उसका पान किया। यदि कोई पश्चिमी व्यक्ति इस दृश्य को देखता, तो वह हैरान रह जाता, किंतु श्रीकृष्णप्रेम के लिए वह भिखारिन का अगाध कृष्णप्रेम और व्रजरज की पवित्रता का मिलन था।
कीर्तन में भाव-विभोर होकर नृत्य
श्रीकृष्णप्रेम ने केवल उस भिखारिन के प्रेम को ही स्वीकार नहीं किया, बल्कि उसकी कुटिया में जाकर उससे कृष्ण-कीर्तन भी सुना और स्वयं दोनों भुजाएँ उठाकर भावपूर्ण मुद्रामें नृत्य किया। उनका यह आचरण यह सिद्ध करता है कि सच्ची भक्ति किसी जाति, वर्ग या बाहरी स्थिति की मोहताज नहीं होती, वह केवल प्रेम की भूखी होती है।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति में ऊँच-नीच या जात-पाँत का कोई स्थान नहीं होता। भगवान और उनके संत केवल भक्त के भाव और सच्चे प्रेम को देखते हैं। हमें भी भगवद्धाम, संतों और ब्रज की हर वस्तु के प्रति आदर भाव रखना चाहिए।
भक्ति का संदेश
भगवान श्रीकृष्ण बाह्य दिखावे या वैभव के भूखे नहीं हैं, बल्कि वे शुद्ध प्रेम और समर्पण के भूखे हैं। जहाँ भक्त का हृदय प्रेम से ओतप्रोत होता है, वहीं भगवान स्वयं खिंचे चले आते हैं।
कथा का सार
श्रीकृष्णप्रेम का जीवन यह सिखाता है कि भगवद्भक्ति जब पराकाष्ठा पर पहुँच जाती है, तब सारे भेद-भाव मिट जाते हैं और केवल प्रेम ही शेष रहता है। ऐसी और प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के अन्य अध्याय अवश्य पढ़ें।