ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 39

श्रीकृपासिन्धुदास बाबाजी: पण्डित रामकृष्ण दास बाबा के अनन्य सेवक और अष्टकालीन लीला-स्मरण के सिद्ध संत

बंगाल के कार्तिकचन्द्र के पुत्र श्रीकृष्णदास से लेकर वृन्दावन के सिद्ध संत श्रीकृपासिन्धुदास बाबाजी बनने, पण्डित रामकृष्ण दास बाबा की अनन्य सेवा और अष्टकालीन लीला-स्मरण की प्रेरणादायक गाथा।

श्रीकृपासिन्धुदास बाबाजी: पण्डित रामकृष्ण दास बाबा के अनन्य सेवक और अष्टकालीन लीला-स्मरण के सिद्ध संत
श्रीकृपासिन्धुदास बाबाजी: पण्डित रामकृष्ण दास बाबा के अनन्य सेवक और अष्टकालीन लीला-स्मरण के सिद्ध संत — ब्रज के भक्त भाग 1

युवावस्था में घर-बार त्यागकर वृन्दावन पहुँचे और पण्डित रामकृष्ण दास बाबाजी की परछाईं बनकर उनकी अनन्य सेवा करने वाले श्रीकृपासिन्धुदास बाबाजी का जीवन गुरु-सेवा, भगवद्भक्ति और अष्टकालीन लीला-स्मरण का एक अनूठा प्रकाशस्तंभ है।

प्रारंभिक जीवन, पुरी यात्रा और वृन्दावन आगमन

चट्टग्राम (पूर्वी बंगाल) के प्रसिद्ध वैद्य और भक्त श्रीकार्तिकचन्द्र के पुत्र श्रीकृष्णदास बाल्यावस्था से ही भक्ति-परायण और सुबोध थे। पिता के देहावसान के बाद मात्र १९ वर्ष की आयु में उन्होंने संसार त्यागकर पुरी की यात्रा की, जहाँ उनकी भेंट नित्यानंददास बाबाजी से हुई। दोनों ने पैदल यात्रा कर वृन्दावन प्रस्थान किया।

वृन्दावन पहुँचकर उन्होंने पसोली ग्राम के श्रीकृष्णदास बाबा से वेश ग्रहण किया और उनका नाम 'श्रीकृपासिन्धुदास' पड़ा। गोपालदास बाबा के सान्निध्य के बाद वे पण्डित रामकृष्ण दास बाबाजी के पास पहुँचे और उनके जीवन के अभिन्न अंग बन गए।

पण्डित बाबा की सेवा, भावसिद्धि और अष्टकालीन लीला-स्मरण

कृपासिन्धुदास बाबाजी ने तन-मन से पण्डित रामकृष्ण दास बाबा की ऐसी सेवा कि बाबा उन्हें प्यार से 'बच्ची' कहकर पुकारते थे। एक बार पूजा के समय फूल लाने में असमर्थ होने पर एक सुंदर कन्या द्वारा फूल पहुँचाने की घटना से सिद्ध हुआ कि उनकी भावसिद्धि हो चुकी थी।

उन्होंने पण्डित बाबा की आज्ञा से समूचा 'गोविन्दलीलामृत' कंठस्थ कर लिया था और अष्टकालीन लीला-स्मरण में पूरी तरह पारंगत हो गए थे। वे विभिन्न लीला-स्थलों और कुंजों के चित्र बनाकर अन्य साधकों को भी लीला-चिन्तन की शिक्षा देते थे।

नित्यधाम गमन

पण्डित बाबा के तिरोधान के बाद उन्होंने 'भागवत-निवास' में रहकर भजन-साधन किया। जीवन के अंतिम समय में संकेतवट पर श्रीसंकेतबिहारी के निकट मन्दिर का निर्माण करवाकर पौष शुक्ल संवत २०२९ में उन्होंने अपनी भौतिक लीला का संवरण किया और नित्यधाम प्रस्थान किया।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सदगुरु की निष्काम और अनन्य सेवा ही साधक के जीवन का सबसे बड़ा साधन है। सच्ची गुरुभक्ति और सेवा भाव से ही भगवान के प्रेम का वास्तविक द्वार खुलता है।

भक्ति का संदेश

भगवत् प्राप्ति और निकुंज लीलाओं के दर्शन के लिए नाम-जप के साथ-साथ गुरुदेव के प्रति पूर्ण समर्पण और अष्टकालीन लीला-स्मरण ही सबसे श्रेष्ठ मार्ग है। सच्ची सेवा साधक को भगवान के और निकट ले जाती है।

कथा का सार

श्रीकृपासिन्धुदास बाबाजी का पावन चरित्र निष्ठा, अनन्य गुरु-सेवा और रसिक भक्ति का एक पावन प्रतीक है। ऐसी और प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के अन्य अध्याय अवश्य पढ़ें।