ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 24

श्रीगौरांगदास बाबाजी: क्रांतिकारी जीवन से वैराग्य और गुरुभक्ति की अनूठी यात्रा

दार्जिलिंग के साहसी छात्र धीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती से लेकर वृन्दावन के महान संत श्रीगौरांगदास बाबाजी बनने की प्रेरणादायक जीवन गाथा, जिसमें गुरुदेव श्रीरामदास बाबाजी की कृपा और अनन्य भक्ति का वर्णन है।

श्रीगौरांगदास बाबाजी: क्रांतिकारी जीवन से वैराग्य और गुरुभक्ति की अनूठी यात्रा
श्रीगौरांगदास बाबाजी: क्रांतिकारी जीवन से वैराग्य और गुरुभक्ति की अनूठी यात्रा — ब्रज के भक्त भाग 1

दार्जिलिंग में अंगेजी साम्राज्य और गोरा-पलटन के अत्याचारों के विरुद्ध अदम्य साहस दिखाने वाले धीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती का मन किस प्रकार क्रांतिकारी संघर्ष से मुड़कर श्रीगुरुदेव श्रीरामदास बाबाजी की शरण में पहुँचा और वे वृन्दावन के महान संत श्रीगौरांगदास बाबाजी बने, यह कथा त्याग और पराकाष्ठा की भक्ति का जीवंत उदाहरण है।

दार्जिलिंग की क्रांतिकारी घटना और शेरदिल बालक

दार्जिलिंग के शांत वातावरण में एक बार अंगेज गोरा-पलटन के सैनिकों द्वारा भारतीय विद्यार्थियों और नागरिकों पर किए जाने वाले अपमान व अत्याचारों से उबलकर युवा धीरेन्द्रनाथ ने अदम्य साहस का परिचय दिया। जब एक गोरे सिपाही ने उन्हें ठोकर मारी, तो उन्होंने पलटवार कर पत्थर से उसका प्रहार किया और पहाड़ पर चढ़कर ब्रिटिश पलटन को हिला दिया.

उनकी इस देशभक्ति और निर्भीकता के पीछे प्रसिद्ध संत सिद्ध श्रीभोलानाथगिरि महाराज का आशीर्वाद और उनका वात्सल्य था, जिन्होंने बालक धीरेन्द्र में अपनी दिव्य शक्ति का संचार किया था। कमिश्नर और हेडमास्टर के हस्तक्षेप से वह संकट तो टल गया, किंतु धीरेन्द्र के हृदय में माया के विश्वव्यापी साम्राज्य के विरुद्ध एक और बड़ी क्रांति की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी थी।

सच्चे गुरु की खोज और श्रीराधारमण चरणदास देव की कृपा

उच्च शिक्षा के लिए कलकत्ता आए धीरेन्द्रनाथ के पास धन-वैभव, परिवार का स्नेह और तीव्र मेधाशक्ति सब कुछ था, किंतु अंतरत्मा में किसी अलौकिक वस्तु के अभाव में सब कुछ फीका लगता था। पंचवटी-वन की देवी के आशीर्वाद और भगिनी निवेदिता के संपर्क के बाद भी उनके भीतर एक वैष्णव गुरु की प्राप्ति की तीव्र लालसा बनी रही.

एक दिन रेलगाड़ी में यात्रा करते समय एक महात्मा के संकेत पर वे सीधे कोल्हटोला में मोतीलाल शील की लॉज में सिद्ध श्रीरामदास बाबाजी महाराज (बड़े बाबा के शिष्य) के पास पहुँचे। बाबा की एक ही दृष्टि ने उनके प्राणों को तृप्त कर दिया और चरणकमलों में लिपटकर उन्होंने गुरुदेव से दीक्षा प्राप्त की।

दीक्षा और माता को दिया हुआ वचन

दीक्षा के समय मन्त्र कान में पड़ते ही धीरे आठ घंटे तक समाधिस्थ रहे और उन्हें अपने दिव्य स्वरूप के दर्शन हुए। गुरुदेव के सान्निध्य और उनके पाषाण हृदय को भी पिघला देने वाले संकीर्तन ने उनके अनुराग को चरम सीमा पर पहुँचा दिया.

जब वे सब कुछ त्यागकर घर न लौटने का निश्चय कर चुके थे, तब माता शैलबाला की करुण प्रार्थना—'बेटा, मेरे जीते जी घर छोड़कर मत जाना'—को मानकर वे कुछ समय के लिए घर लौटे और माता-पिता की प्रसन्नता का ध्यान रखा, किंतु उनका मन पूरी तरह भगवद्भक्ति में रम चुका था।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

यह कथा हमें सिखाती है कि सांसारिक उपलब्धियाँ और भौतिक सुख-सुविधाएँ मनुष्य की आत्मा को तृप्त नहीं कर सकतीं। जब तक जीवन में सच्चे सद्गुरु की प्राप्ति न हो, तब तक परम शांति नहीं मिलती। गुरु के प्रति अनन्य समर्पण और प्रेम ही जीवन का सबसे बड़ा संबल है।

भक्ति का संदेश

सच्ची भक्ति और ईश्वर प्राप्ति के मार्ग में बाह्य वैभव या पारिवारिक बंधन बाधा नहीं बनते, यदि हृदय में गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा और नाम-जप के प्रति निष्ठा हो। भगवद्प्रेम ही जीवन की सबसे बड़ी और अमूल्य निधि है।

कथा का सार

श्रीगौरांगदास बाबाजी (धीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती) का जीवन क्रांति, वैराग्य और गुरुभक्ति का अनूठा संगम है। ऐसी और प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के अन्य अध्याय अवश्य पढ़ें।