ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 25

श्रीगौरांगदास बाबाजी: क्रांतिकारी जीवन से अलौकिक भगवद्प्रेम और वैराग्य की गाथा

श्रीगौरांगदास बाबाजी (धीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती) के कलकत्ता कॉलेज जीवन, पुरी यात्रा, नवद्वीप प्रसंग, कठोर वैराग्य और महाप्रभु तथा गुरुदेव के चरणों में अनन्य समर्पण की प्रेरणादायक गाथा।

श्रीगौरांगदास बाबाजी: क्रांतिकारी जीवन से अलौकिक भगवद्प्रेम और वैराग्य की गाथा
श्रीगौरांगदास बाबाजी: क्रांतिकारी जीवन से अलौकिक भगवद्प्रेम और वैराग्य की गाथा — ब्रज के भक्त भाग 1

भौतिक सुख-सुविधाओं, उच्च शिक्षा और उज्ज्वल भविष्य के अवसरों को तिलांजलि देकर त्याग और वैराग्य के पथ पर अग्रसर हुए श्रीगौरांगदास बाबाजी का जीवन अगाध गुरुभक्ति, नाम-जप की महिमा और भगवद्प्रेम का एक अद्वितीय प्रकाशस्तंभ है।

वैभव और विवाह प्रस्तावों का त्याग कर पुरी यात्रा

स्कॉटिश चर्च कॉलेज में अध्ययन के दौरान जब एक धनी व्यक्ति धीरेन्द्रनाथ के विवाह का प्रस्ताव लेकर उनके घर आया, तो उन्होंने बड़ी चातुरी से उसे टाल दिया। उन्हें यह आभास हो गया कि यह संसार उन्हें अपनी माया में बाँधना चाहता है। उन्होंने उसी रात अपने परिवार के वैभव और उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं को छोड़कर त्याग और वैराग्य का कष्टसाध्य मार्ग अपना लिया।

आषाढ़ मास में श्रीरामदास बाबाजी महाराज के साथ वे श्रीधाम पुरी पहुँचे। पुरी में कुष्ठ रोगियों की सेवा करना, महाप्रभु की अलौकिक लीलाओं के दर्शन करना और रथयात्रा के समय शर्बत के घड़े के फूटने पर महाप्रसाद ग्रहण करना उनके जीवन के ऐसे प्रसंग थे जिन्होंने उनके अंतर को पूरी तरह से पावन कर दिया।

नवद्वीप में ललितादासी का सान्निध्य और गुरुदेव के दिव्य दर्शन

गुरुदेव की आज्ञा से धीरेन्द्रनाथ नवद्वीप में परमसिद्धा श्रीललितादासी की सेवा में रहकर चैतन्य-चरितामृत का अध्ययन करने लगे। जब उनके माता-पिता पुलिस के दारोगा को लेकर उन्हें वापस ले जाने पहुँचे, तो ललितादासी और साक्षात् श्रीराधारमण चरणदास देव के दर्शन ने उनके पिता भूपेन्द्रनाथ का मोह भंग कर दिया।

इसके पश्चात वे वृन्दावन आ गए और सिद्ध श्रीजगदीशदास बाबा की सेवा में रहकर अष्टकालीन लीला-स्मरण की पद्धति से भजन करने लगे। पण्डित रामकृष्ण दास बाबाजी से शास्त्राध्ययन और हरिराम व्यास व वल्लभरसिक जी की वाणियों को कंठस्थ कर वे ब्रज-साहित्य के अद्वितीय विद्वान बन गए।

कठोर वैराग्य, तरु-लताओं से प्रेम और चमत्कारी अनुभूतियाँ

गुरुदेव से वैराग्य-दीक्षा प्राप्त कर वे 'श्रीगौरांगदास बाबाजी' बन गए। उनकी कुल संपत्ति केवल एक लंगोटी और टाट का बहिर्वास थी। वे वृन्दावन और गोवर्धन के जंगलों में रहकर वृक्षों और तरु-लताओं को ही अपना सखा मानते थे। एक बार शीतकाल में नग्नावस्था में काँपते समय कल्पतरु वृक्षों और मयूरों के बीच उन्हें साक्षात श्रीकृष्ण के दर्शन हुए।

उनके जीवन में अनेक चमत्कारिक घटनाएं घटीं—चाहे वह अजगर का रोज कथा सुनने आना हो, भक्तों के संकट और रोग अपने ऊपर ले लेना हो, या मृत पक्षी को अपनी प्राण-शक्ति से पुनर्जीवित करना हो। उनका हर श्वास भगवान के नाम और लीला-स्मरण को समर्पित था।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्ची शांति और आत्मीय सुख भौतिक वस्तुओं या सांसारिक बंधनों में नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति अनन्य समर्पण और सच्चे गुरु के सान्निध्य में है। वैराग्य ही साधक के जीवन का सबसे बड़ा आभूषण है।

भक्ति का संदेश

भगवन्नाम और गुरु की कृपा मनुष्य को हर प्रकार के भौतिक संतापों और काल के भय से मुक्त कर देती है। निष्काम भाव से की गई संत-सेवा और नाम-जप ही भवसागर से पार लगाने वाली एकमात्र नौका है।

कथा का सार

श्रीगौरांगदास बाबाजी का पावन चरित्र क्रांति, वैराग्य और गुरुभक्ति का अनूठा संगम है। ऐसी और प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के अन्य अध्याय अवश्य पढ़ें।