ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 19

श्रीदुर्गी माँ की अनन्य वात्सल्य भक्ति और गोपाल प्रेम की दिव्य गाथा

कठिन संघर्षों को पार कर भगवान गोपाल की सेवा में अपना सर्वस्व समर्पित करने वाली वात्सल्यमयी श्रीदुर्गी माँ के जीवन की प्रेरणादायक कथा।

श्रीदुर्गी माँ की अनन्य वात्सल्य भक्ति और गोपाल प्रेम की दिव्य गाथा
श्रीदुर्गी माँ की अनन्य वात्सल्य भक्ति और गोपाल प्रेम की दिव्य गाथा — ब्रज के भक्त भाग 1

सच्ची भक्ति और वात्सल्य भाव से परिपूर्ण हृदय भगवान को भी विवश कर देता है, जहाँ भक्त और भगवान का भेद मिटकर केवल प्रेम ही शेष रहता है।

माँ और उनके प्यारे गोपाल का वात्सल्य

दुर्गी माँ और उनका लाड़ला बेटा श्रीविग्रहरूपी गोपाल कुछ दिनोंसे रङ्गजीके मन्दिरके बाहरी परकोटेके एक कक्षमें रहने लगे थे। दोनों उस एकान्त स्थानको प्राप्तकर बहुत प्रसन्न थे। दोनोंकी प्रेम-लीला वहाँ निर्विघ्न चला करती थी। वात्सल्यमयी माँ गोपालको प्राप्तकर विश्वको भूल चुकी थीं। उनका सारा विश्व सिमटकर गोपालके नन्हें चरणोंमें समा गया था। वे गोपाल और उसकी सेवाके सिवा और कुछ जानती ही न थीं। गोपाल भी उनके सिवा और कुछ नहीं जानता था। गोपाल उनका सर्वस्व था और वे गोपालकी।

पर, दुर्गी माँ अब बहुत बूढ़ी हो गयी थीं। उन्होंने एक दिन गोपालसे कहा—‘गोपाल अब मुझसे तेरी सेवा नहीं होती। तू मेरी सेवा किया कर।’

गोपालको और क्या चाहिये था ? वह प्रेमसे माँकी सेवामें जुट गया। माँ उसके प्रेममें बदहोश-सी बैठी-बैठी अश्रु-विसर्जन किया करती और वह उनकी सेवा किया करता। उनकी सेवा तो करता ही, घरको झाड़-बुहारकर ठीक रखा करता।

दुर्गी माँकी अनन्य भक्ता थीं भक्तिमती ऊषाजीकी माँ श्रीमती श्यामादेवी। एक दिन उन्होंने दुर्गी माँसे कहा—‘माँ, तुम्हारा घर पहले जितना गन्दा रहता था, उतना ही अब साफ रहने लगा है। कौन सफाई करता है ?’

था ! भगवान् और भक्तिसे उनका कोई सरोकार था नहीं। दुर्गीबाई सहज और सरल स्वभावकी भक्तिमती बाला थीं। उनके जन्मजात भक्तिके संस्कार अब प्रबल होने लगे थे। उनके लिए यह नया वातावरण अनुकूल न था। फिर भी वे घरके सभी लोगोंको प्रसन्न रखनेकी प्राण-पणसे चेष्टा करतीं। सबकी छोटी-बड़ी सेवाका ध्यान रखतीं। सबके शयनोपरान्त अपनी भजन-साधनामें लग जातीं।

पर, यह उनके पतिको कब सुहाता ? उसकी वे विवाहिता पत्नी थीं। उनके ऊपर उसका एकछत्र अधिकार था। वही उनके हृदयका स्वामी, उनका भगवान् था। उसके लिए किसी दूसरे भगवान्को उस हृदयमें स्थान देना उसके साथ विश्वासघात करना था। वह उनके प्रति कठोर व्यवहार करने लगा।

परिणामस्वरूप दुर्गीबाईकी चित्त-वृत्ति अन्तर्मुखी होने लगी। वे जो स्मरण-चिन्तन एकान्तिक क्षणोंमें किया करतीं वह उनके जीवनके प्रत्येक पलका साथी बन गया। वृत्ति जितनी अन्तर्मुखी होती गयी, उतना ही भाव तीव्र होता गया। कभी-कभी काम करते-करते उनकी चेतना लुप्त हो जाती और वे एक अनिर्वचनीय भाव-समाधिमें डूब जातीं। तब वे क्षण उनके लिए बहुत कठोर बनकर आते। उनके ऊपर गालियों और लात-घूसोंकी बौछार होने लगती।

किसी प्रकार दुर्गी माँने इस नारकीय जीवनमें १७ वर्ष व्यतीत किये। सात बच्चोंको जन्म दिया। तीस वर्षकी अवस्थामें एक दिन अर्धरात्रिमें वे घरसे निकल पड़ीं। मार्गमें बहुत कष्ट उठाते हुए देहरादून पहुँचीं। वहाँ धर्मशालामें जम्मूके एक वृद्ध सज्जनसे भेंट हुई। वे उन्हें अपने साथ जम्मू ले गये। उनके घर दो वर्ष तक रसोई बनानेका काम करती रहीं। किसी प्रकार सरनूभाईको इनका पता चल गया। तब वे सीधी स्टेशन गयीं और जो गाड़ी पहले मिली उसपर बैठकर लाहौर पहुँचीं।

लाहौरमें भी एक सज्जनके यहाँ सालभर तक चौका-बर्तन और रसोईके साथ उनकी क्षयरोग-ग्रस्त पत्नीकी सेवा करती रहीं। जब पत्नीका देहान्त हो गया, तब वे हरिद्वार चली गयीं। वहाँ जम्मूवाली धर्मशालामें रहकर एक स्कूलमें लड़कियोंको घरसे लाने और पहुँचानेकी नौकरी कर ली।

इस नौकरीमें उन्हें भजनके लिए पर्याप्त समय मिलने लगा। उनके भक्ति-भावमें दिनोदिन उन्नति होने लगी। कभी-कभी वे दिन-दिन भर धर्मशालामें अपने कमरेमें बैठी रह जातीं। नौकरीका समय भी निकल जाता और उन्हें बाह्यज्ञान न होता। कमरेका दरवाजा सुबहसे शाम तक बन्द देखकर धर्मशालाके मैनेजरको चिन्ता होने लगती।

इसी बीच उनकी सासका देहान्त हो गया। सरनूभाई हरिद्वार आये माँकी अस्थियाँ विसर्जन करने। हरकी पौढ़ीपर दुर्गीबाईसे साक्षात्कार हुआ, पर दुर्गीबाई मौन धारण किये रहीं। उनसे एक शब्द भी न बोलीं। वे हारे जुआरीकी भाँति उन्हें छोड़कर घर चले गये।

दस वर्ष इस प्रकार हरिद्वारमें व्यतीत कर वे वृन्दावन चली आयीं। वृन्दावनमें वे कुछ दिन केशीघाटपर जम्मूवाली कुञ्जमें और कुछ दिन जगन्नाथ घाटपर जगन्नाथजीके मन्दिरमें रहीं। फिर श्रीरामानुज हयग्रीव मन्दिर, बड़ा खटलाम रहने लगीं और वहीं के तत्कालीन महन्त श्रीमच्छ्री स्वामीजीसे दीक्षा लेकर गोपालजीकी सेवा करने लगीं।

भक्ति में घटित अनोखी घटनाएँ

जीविकाके लिए पहले तो उन्होंने ‘भगवान् भजनाश्रम’ का सहारा लिया। वहाँ आठ घण्टे कीर्तन करतीं और उसके बदले जो कुछ मिलता उसीसे किसी प्रकार अपना और गोपालका काम चलातीं।

कुछ दिन बाद उन्होंने यह सोचकर कि भजनाश्रममें कीर्तनकर उसके बदले जीविका करनेके लिए कुछ लेना ठीक नहीं, उन्होंने भजनाश्रम जाना छोड़ दिया। श्रीरसिक बिहारीके मन्दिरमें एक सेठानीके यहाँ पाँच रुपये प्रति महीनेपर नौकरी कर ली। उतनेमें ही वे ठाकुरके भोग-रागकी किसी प्रकार व्यवस्था कर संतुष्ट रहने लगीं।

पर, उनका भजनमें अभिनिवेश अब इतना प्रबल हो गया कि नौकरी करना सम्भव न रहा। आश्रममें रहना भी मुश्किल हो गया। तभी वे रङ्गजीके मन्दिरके इस एकान्त कक्षमें चली आयीं। तबसे हर समय गोपालकी सेवामें रहने लगीं।

वे अपनी जीविकाके लिए किसीसे याचना न करतीं। अपनी साधनाके सम्बन्धमें भी किसीसे कुछ न कहतीं। यथासम्भव अपनेको छिपाकर रखनेकी चेष्टा करतीं ! सबसे प्रभुके दर्शन और अक्षय वृन्दावनवासकी भीख माँगती, परन्तु कुछ लोग उन्हें जान गये थे। वे उनकी सेवा करते रहते। उसीसे उनका काम चलता।

फिर भी कभी-कभी ऐसा होता कि उनके पास ठाकुरके भोगके लिए कुछ न रहता। जो रहता उसे कुछ लोग चुरा ले जाते। तब उन्हें विवश हो गोपालसे अपनी व्यवस्था आप करनेके लिए कहना पड़ता। कभी ऐसा भी होता कि कुछ अधिक पैसे पासमें हो जाते। तब वे गोपालको दिखानेके लिए रासका आयोजन कर देतीं या सन्तोंकी सेवामें उन्हें खर्च कर देतीं। संचय करनेका तो कोई प्रश्न ही नहीं था।

गोपालको भी माँकी बराबर चिन्ता रहती। उन्हें जब जिस वस्तुकी आवश्यकता होती, वह किसी-न-किसीको प्रेरणा देकर किसी-न-किसी प्रकार उसे जुटा देता। एक बार माँको चमेलीके तेलकी आवश्यकता थी। उनके सिरमें न जाने कबसे तेल नहीं पड़ा था। खुशकी बहुत हो गयी थी, जिसके कारण सिरमें दर्द रहने लगा था। उनके एक भक्त श्रीगिरधारीलालजी अमृतसर रहते थे। उस बार जब वे वृन्दावन आ रहे थे, उन्होंने नौकरसे मालिशके लिए एक शीशी सरसोंका तेल लानेको कहा। नौकर भूलसे चमेलीका तेल ले आया। चमेलीका तेल उनके काम का था नहीं, क्योंकि वे सिरमें तेल नहीं डालते थे। तो क्या करते ?

गाड़ीका समय हो गया था। वे तेलकी शीशी झोलेमें डालकर चल दिये। सोचने लगे यदि यह तेल दुर्गी माँकी सेवामें लग जाय तो अच्छा हो।

वृन्दावन पहुँचकर वे सीधे दुर्गी माँके पास गये। दण्डवत् कर बैठे ही थे कि वे बोलीं—‘गिरधर, तू चमेलीका तेल लाया है न। मेरे सिरमें डाल दे।’

गिरधारीलालने अपने हाथसे उनके सिरमें तेल डाला। उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उनके सिरने तेलकी पूरी शीशी सोखली।

दुर्गी माँकी शेष अवस्था रङ्गजीके मन्दिरके इस कक्षमें बड़ी भावभीनी अवस्थामें बीती। मन और प्राण गोपालकी सेवामें तन्मय रहते। नेत्र निरन्तर सजल रहते। थोड़े-से भी उद्दीपनसे वे बाह्यज्ञान खोकर किसी अनिर्वचनीय आनन्द-समुद्रमें डूब जातीं। श्रीगौरांगदास बाबाजी महाराजकी अमृतवर्षिणी कथामें उन्हें कई बार मूर्च्छित होते देखा गया। एक बार सेवाकुञ्जके निकट वे किसीकी वंशी-ध्वनि सुनकर आठ घण्टे बेसुध हो पृथ्वी-पर पड़ी रहीं।

यमुनामें स्नान करते समय उन्हें अक्सर कृष्णकी गोपियोंके साथ जलकेलिको उद्दीपन हो जाता। वे घण्टों जलमें ध्यानमग्न अवस्थामें खड़ी रह जातीं। कछुवे काट जाते तो भी उन्हें पता न चलता। बाह्यज्ञान होनेपर यमुनाजीसे निकलकर यमुना-मट्टी घावोंपर लगा लेतीं। बेसुध अवस्थामें रास्ता चलते समय कई बार पागल कुत्तोंने उन्हें काट लिया। तो भी उन्होंने यही उपचार किया और कुत्तेके विषका उनपर कोई असर न हुआ।

दुर्गी माँपर जो भगवत्-कृपा थी उसका एकमात्र कारण था उनका अति सरल, निरभिमानी, निष्कपट व्यक्तित्व और भगवन्नाम-कीर्तनमें उनकी अनन्य निष्ठा। वे अपने कक्षका दरवाजा बन्दकर कीर्तन किया करतीं। कभी-कभी लोग दरवाजेके पास कान लगाकर कीर्तन सुनते, तो दो ध्वनियाँ स्पष्ट सुनायी पड़तीं। एक तो होती स्वयं दुर्गी माँकी परिचित ध्वनि। दूसरी किसी किशोर कण्ठकी बड़ी मधुर और आकर्षक ध्वनि। दूसरी ध्वनि उनके गोपालके सिवा और किसकी हो सकती थी ? आहा, कैसा मधुर होता होगा भक्त और भगवान्का दिव्य संकीर्तन !!

मातृभाव और भगवान की प्रेममयी सेवा

दुर्गी माँ एकान्तमें गोपालसे जो बातें किया करतीं, वह भी लोग कभी-कभी कक्षके बाहरसे सुन लेते। एक बार एक महिला भक्तने सुना उन्हें गोपालसे कहते—‘गोपाल, सुन तो मुझे नामकी ध्वनि आ रही है। मेरे रोम-रोमसे नामकी ध्वनि निकल रही है !’

दुर्गी माँ साधारणतया अपने अनुभवोंके सम्बन्धमें कुछ नहीं कहतीं, पर कभी-कभी अपने प्रेमीजनोंसे दो-एक बातें कह दिया करतीं। डिप्टी-कलेक्टर श्रीनिर्जनदास धीर उनके बड़े भक्त थे। एक बार उनसे उन्होंने कहा था—‘मुझे चमचमाते दिव्य वृन्दावनके तीन बार दर्शन हुए हैं।’

पर, उनके जीवनके शेष दिनोंमें तो लगता था कि जैसे वे ही हर समय दिव्य वृन्दावन थीं। उनका कक्ष ईंट-पत्थरका बना हुआ साधारण कक्ष नहीं था। वह तो चिन्मय वृन्दावनका मणिमय कुञ्ज था, जिसमें चारों ओर कमल खिल रहे थे, भ्रमर गुञ्जार रहे थे, मोर नृत्य कर रहे थे और कोकिलें पञ्चम स्वरसे गान कर रही थीं। एक दिन जैसे ही श्यामादेवीने उनके कक्षमें प्रवेश किया, वे उन्हें सावधान करके बोलीं—‘धीरे ! धीरे ! इधरसे !’

‘क्या बात है माँ ?’ श्यामादेवीने चौंककर कहा।

‘देखो न, उधर कमल खिल रहे हैं।’

श्यामादेवीको तो कमल दीख नहीं रहे थे। और कोई होता तो कहता कि दुर्गी माँको मतिभ्रम हो गया है या उनकी दृष्टि दूषित है, पर वे जानती थीं कि दृष्टि दुर्गी माँकी ही ठीक है, उनकी अपनी दृष्टि दूषित है जड़ है।

दुर्गी माँकी दृष्टि अब ऐसी हो गयी थी कि उन्हें हर वस्तुमें उनके ठाकुर और हर जगह उनके धामके सिवा और कुछ दीखता ही नहीं था। एक बार वे श्यामादेवीके घर गयीं, जब उनके घर केरल स्वामी नामके एक सन्त विराजते थे। उन्होंने दण्डवत् प्रणाम किया और कातर स्वरसे उनकी कृपाकी याचना की। स्वामीजीने कहा—‘मेरे पास देनेको क्या है माँ। मेरी झोली बिल्कुल खाली है।’

पर, दुर्गी माँ उन्हें सहजमें छोड़नेवाली तो थी नहीं। उन्होंने कहा—‘प्रवञ्चना न करें प्रभु। इस दासीको कृपाके रूपमें कुछ दें अवश्य।’

स्वामीजीने जब उन्हें बार-बार आग्रह करते देखा, तो उनके हाथमें जो सुँघनीकी शीशी थी, उसे उनकी गोदीमें डालते हुए कहा—‘अच्छा, तो लो।’

दुर्गी माँने उस शीशीको अपने सम्प्रदायके आचार्य रामानन्द द्वारा दिये गये ठाकुर समझ बार-बार अपने हृदयसे लगाया और भाव-विभोर हो गयीं।

किसीने कहा—‘माँ, यह ठाकुर नहीं हैं। यह तो स्वामीजीने विनोदमें अपनी सुँघनीकी शीशी आपको दी है।’

पर दुर्गी माँ कब माननेवाली थीं। जो दुनियाँके लिए सुँघनीकी शीशी थी, वह उनके लिए उनके ठाकुरकी श्रीमूर्त्ति थी। वे लोगोंकी कही अब किसकी हिम्मत थी जो उनसे शीशी वापस ले लेता। शीशीकी तो बात कुछ नहीं, पर दुर्गी माँ ठाकुर समझकर उसका पूजन करें, यह लोगोंको अच्छा नहीं लगा। सबने पंजाबसे आये सुदामा बाबा नामके एक सन्तसे प्रार्थना की कि किसी प्रकार शीशी उनसे ले लें। सुदामा बाबासे दुर्गी माँका स्नेह था। एक दिन वे उनकी कुटियापर गये और शीशी यह कहकर उठा लाये कि ‘सब ठाकुरोंकी सेवा तुम्हीं करोगी ? हमें नहीं करने दोगी।’

एक दिन श्यामा माँसे दुर्गी माँने कहा—‘‘बहिन अब मेरा शरीर नहीं चलता। गोपालसे कहा—मुझे ले चल, तो जानती हो क्या बोला—‘तुझे रेशमी साड़ी पहननी होगी, माँगमें सिंदूर भरना होगा, मेरे साथ ब्याह करना होगा, तब ले चलूँगा।’

श्यामादेवीने हँसकर कहा—‘तो रेशमी साड़ी आ जायेगी। उसमें दिक्कत क्या है ?’

‘अरे तो माँके साथ कोई ब्याह करता है ? उसे ऐसी बात कहनी चाहिये ?’ दुर्गी माँने झुंझलाते हुए उत्तर दिया।

दुर्गी माँके शेष जीवनमें उनकी भाव-मुद्रासे लगता था कि उनका दिव्य वृन्दावनसे सम्बन्ध घनिष्ठ होता जा रहा है और प्राकृत वृन्दावन उनसे छूटता जा रहा है। अन्तमें ५ अगस्त सन् १९७७ को ११९ वर्षकी अवस्थामें वे अपने प्राकृत शरीरको प्राकृत वृन्दावनमें छोड़कर अप्राकृत, सिद्ध गोपीदेहसे सदाके लिए दिव्य वृन्दावनमें प्रवेश कर गयीं।

कथा का सार

श्रीदुर्गी माँ की कथा के ये प्रसंग भक्ति और साधना पर मनन करने का अवसर देते हैं। इसी संग्रह की अन्य कथाएँ भी पढ़ें।