ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 38
श्रीअनन्तदास बाबाजी: करहला की कंदरा, अजस्र नाम-जप और अनन्तदेव की कृपा
करहला ग्राम की सघन और सर्प-बिच्छुओं से भरी कुटिया में रहकर प्रतिदिन चार-पाँच लाख नाम का जप करने वाले श्रीअनन्तदास बाबाजी के जीवन की प्रेरणादायक गाथा।

श्रीअद्वैतदास बाबाजी महाराज से दीक्षा प्राप्त कर ब्रज के करहला ग्राम की अत्यंत विषम और भयानक कुटिया में रहकर निरंतर नाम-जप में लीन रहने वाले श्रीअनन्तदास बाबाजी का जीवन नाम-निष्ठा, अगाध वैराग्य और भगवत्कृपा का एक अद्वितीय उदाहरण है।
करहला की कदमखण्डी और अनन्तदास बाबाजी की कठोर साधना
व्रज के करहला ग्राम में, जहाँ श्रीकृष्ण के पौत्र वज्रनाभ की समाधि है और महात्मा घमण्डीदास को चूड़ा प्राप्त हुआ था, एक विशाल कदमखण्डी स्थित है। इसी कदमखण्डी के कंद के तट पर सघन लताओं और झाड़ियों से घिरी एक ऐसी कुटिया थी जहाँ सूर्य की किरणें भी मुश्किल से पहुँच पाती थीं। ऐसे कठिन और सर्प-बिच्छुओं के वास वाले स्थान में श्रीअद्वैतदास बाबाजी के शिष्य श्रीअनन्तदास बाबा निवास करते थे।
वे अत्यंत सीधे-साधे और सरल प्रकृति के थे, जिनकी हरिनाम में अगाध निष्ठा थी। वे प्रतिदिन चार-पाँच लाख नाम का जप करते थे। उनका रोम-रोम और श्वास-श्वास केवल नाम-जप को समर्पित था, और वे जितनी देर श्वास बिना रह सकते थे उतनी देर भी बिना नाम के नहीं रह सकते थे।
अनन्तदेव का सर्प रूप में दर्शन और समाधि-लीन जीवन
एक दिन जब वे मधुकरी से लौटे, तो कुटिया के द्वार पर एक काले सर्प ने उन्हें रोका। नाम की धुन में मग्न बाबा को उसकी फुफकार सुनाई नहीं दी और जैसे ही उन्होंने पैर आगे बढ़ाया, सर्प ने उन्हें डस लिया। उन्होंने तुरंत समझ लिया कि यह किसी पूर्वजन्म का बदला नहीं, बल्कि स्वयं अनन्तदेव की कृपा से उनके अंत समय की पूर्व-सूचना है।
उन्होंने अनन्तदेव को धन्यवाद दिया, झोला खूँटी पर टाँगा और पद्मासन में बैठकर उच्च स्वर से नाम-संकीर्तन करने लगे। दो दिन और दो रात बीत जाने पर भी उनकी समाधि नहीं टूटी। तीसरे दिन बाह्य ज्ञान होने पर भी उनके शरीर में विष का कोई दुष्परिणाम नहीं था, क्योंकि अनन्तदेव ने उनकी आयु कुछ और बढ़ाकर उन्हें भजन-सुख का अनुभव कराया था।
औषधि और सेवा का त्याग, और शांत भाव से नित्यधाम गमन
जीवन के अंतिम समय में जब उनका मूत्र अवरुद्ध हो गया और असह्य वेदना का समय आया, तब भी उन्होंने जीवन भर की तरह किसी औषधि या बाहरी सेवा का सहारा नहीं लिया। उन्होंने व्रजवासियों के चिकित्सा के अनुरोध को यह कहकर टाल दिया कि जहाँ मंगलमय श्रीहरिनाम विराजमान है, वहाँ किसी चिकित्सक का सहारा लेना भगवान के विधान में बाधा डालना है।
उन्होंने बिना किसी कष्ट के पूर्ण शांत और प्रसन्न मुद्रा में निरंतर नाम जपते हुए अपने शरीर का त्याग किया और नित्यधाम को प्रस्थान किया।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जो साधक अपने प्राणों को भगवान के नाम-जप में पूरी तरह समर्पित कर देता है, उसके लिए मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। भगवान अपने ऐसे अनन्य भक्तों की हर परिस्थिति में रक्षा करते हैं और उन्हें अलौकिक शांति प्रदान करते हैं।
भक्ति का संदेश
हरिनाम ही कलियुग में मनुष्य का सबसे बड़ा और सच्चा साथी है। जब साधक का श्वास-श्वास भगवान के नाम में पिरो जाता है, तब संसार के सारे भौतिक कष्ट और भय स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
कथा का सार
श्रीअनन्तदास बाबाजी का पावन चरित्र अचंचल नाम-निष्ठा, त्याग और भगवत्कृपा का एक जीवंत प्रकाशस्तंभ है। ऐसी और प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के अन्य अध्याय अवश्य पढ़ें।