ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 37
श्रीअद्वैतदास बाबाजी: 'मनःशिक्षा' का प्रभाव, गोवर्धन वास और रसिक साधना की गाथा
मेदिनीपुर के अपूर्वचरण से वृन्दावन के संत श्रीअद्वैतदास बाबाजी बनने, श्रीप्रेमानंद कृत 'मनःशिक्षा' के प्रभाव, गुरुदेव विष्णुदास बाबाजी की कृपा और उनकी अनन्य भक्ति की प्रेरणादायक गाथा।

एक छोटी सी पुस्तक 'मनःशिक्षा' के अध्ययन से जीवन में उठी वैराग्य की प्रचंड अग्नि और श्रीचैतन्य महाप्रभु के प्रति अगाध प्रेम के बल पर गोवर्धन और राधाकुण्ड की पावन धरा पर भजन करने वाले श्रीअद्वैतदास बाबाजी का जीवन त्याग, गुरुभक्ति और नाम-जप का जीवंत प्रतीक है।
मनःशिक्षा का अध्ययन और वैराग्य का उदय
मेदिनीपुर जिले के वयदाई ग्राम में जन्मे अपूर्वचरण (श्रीअद्वैतदास बाबाजी) को जब उनके बन्धु मृत्युंजयदास ने श्रीप्रेमानंद कृत 'मनःशिक्षा' पढ़ने को दी, तो उसकी पंक्तियों ने उनके हृदय को झकझोर दिया। उन्हें असत् संसार का ज्ञान हुआ और साथ ही श्रीगौरांग महाप्रभु के शरण में जाने की तीव्र उत्कंठा जागी।
परिजन द्वारा विवाह तय किए जाने पर वे घर से निकल पड़े और मयनाडाल पहुँचकर मित्र ठाकुर महाशय से संकीर्तन की शिक्षा ली। स्वप्न में महाप्रभु के दर्शन और वृन्दावन के प्रसिद्ध संत श्रीविष्णुदास बाबाजी से भेंट होने पर उन्होंने दीक्षा और वेश ग्रहण किया, जिससे उनका नाम 'अद्वैतदास' पड़ा।
गोवर्धन और राधाकुण्ड में भजन, शुष्क वैराग्य का खंडन
गोवर्धन के गोविंदकुंड और नारंगाबाद में रहकर उन्होंने श्रीमद्भागवत और भक्तिशास्त्रों का गहन अध्ययन किया। वे पूर्ण वैराग्य से रहते थे—कच्ची कुटिया बनाकर रहना, मधुकरी करना और पैसे को कभी स्पर्श न करना उनका नियम था।
वे प्रायः कहा करते थे कि केवल 'शुष्क वैराग्य' से अहंकार बढ़ता है और हृदय कठोर होता है, भगवत्प्राप्ति के लिए सरस हृदय और प्रेम आवश्यक है। उनके जीवन में श्रीकृष्णा-बलराम के दर्शन और गुरुदेव विष्णुदास बाबाजी के साथ अनेक अलौकिक घटनाएं जुड़ी थीं।
नित्यधाम गमन
सन् १९६२ में फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष में उन्होंने अपने सभी शिष्यों को गोवर्धन बुलाया और एकादशी के दिन मधुर कीर्तन की ध्वनि के बीच अपने पार्थिव शरीर का त्याग कर नित्यधाम में प्रवेश किया। उनके उपदेश आज भी साधकों के लिए मार्गदर्शक हैं।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सत्संग और सदग्रंथों का अध्ययन मनुष्य की दिशा बदल सकता है। शुष्क त्याग या अहंकार से भगवान नहीं मिलते, बल्कि दीनता, गुरुभक्ति और नाम-जप से ही भगवान की प्राप्ति होती है।
भक्ति का संदेश
भगवन्नाम कल्पतरु है। निरंतर नाम-जप और विरह-भाव के साथ की गई साधना साधक के हृदय को शुद्ध कर देती है और उसे युगल सरकार की निकुंज सेवा का अधिकारी बनाती है।
कथा का सार
श्रीअद्वैतदास बाबाजी का पावन चरित्र वैराग्य, शास्त्र-ज्ञान और रसिक भक्ति का एक अनूठा संगम है। ऐसी और प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के अन्य अध्याय अवश्य पढ़ें।