ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 23
पण्डित रामकृष्ण दास बाबाजी: वृन्दावन के महान संत और भजन-साधना की अनूठी गाथा
श्रीगोविन्ददेव जी के साथ बचपन की अलौकिक लीला से लेकर प्रकांड विद्वत्ता, वैराग्य और अनन्य भक्ति तक की पण्डित रामकृष्ण दास बाबाजी (रामप्रताप जी) की प्रेरणादायक गाथा।

बचपन में श्रीगोविन्ददेव जी के साथ खेलने वाले और कालान्तर में अगाध पाण्डित्य, निष्किञ्चन वैराग्य और कठोर साधना के बल पर वृन्दावन के महान संत बने पण्डित रामकृष्ण दास बाबाजी (रामप्रताप जी) का जीवन त्याग, दैन्य और भगवद्भक्ति का एक जीवन्त प्रकाशस्तंभ है।
गोविन्ददेव जी के साथ बाल्यावस्था की दिव्य लीला
जयपुर के श्रीलक्ष्मीनारायण और कमलादेवी के घर संवत १९१४ भाद्र मास में जन्मे बालक रामप्रताप की बुद्धि अति मेधावी थी। वृन्दावन आने पर श्रीगोविन्ददेव जी के मन्दिर प्रांगण में खेलते-खेलते उनका संबंध ठाकुर जी से ऐसा जुड़ा कि भगवान स्वयं उनके साथ खेलने उतर आते थे। एक बार गोविन्दजी उनकी सोने की गोली ले भागे, और जब पुजारी ने मन्दिर खोला तो आश्चर्यचकित रह गया क्योंकि थाल में एक अतिरिक्त गोली मौजूद थी।
बाल्यावस्था में ही पतंग और खेल-कूद के प्रति उनका मोह समाप्त हो गया और उन्होंने पाणिनी के सूत्र, सारस्वत व्याकरण, अमरकोष, उर्दू, बंगाला और तमाम भक्ति-ग्रन्थों का अगाध अध्ययन कर लिया। तेरह वर्ष की आयु में वे सब बाधाओं को पार कर वृन्दावन पहुंच गए और विधिवत अध्ययन व साधन में लीन हो गए।
कठोर साधना, राघव की गुफा और भगवद्दर्शन
गुरुदेव सिद्ध श्रीनित्यानन्ददास बाबाजी से दीक्षा ग्रहण करने के पश्चात उनका नाम 'श्रीरामकृष्णदास' हुआ, किन्तु उनके असाधारण पाण्डित्य के कारण लोग उन्हें 'पण्डित बाबा' कहने लगे। गोवर्धन की राघव की गुफा में उन्होंने कठोर पुरश्चरण किया। सत्रहवें दिन उन्हें राधा-कृष्ण के साक्षात् दर्शन हुए। प्रिया-प्रियतम ने उन्हें प्रसन्न होकर वर मांगने को कहा, तो उन्होंने निस्पृह भाव से कहा कि वे केवल गुरु की आज्ञा से भजन कर रहे हैं।
उनका जीवन पूरी तरह निष्किञ्चन, वैराग्यमय और साधु-वैष्णवों की सेवा को समर्पित था। वे किसी भी प्रकार का सांसारिक प्रलोभन या राजा-महाराजाओं द्वारा लाए गए भारी धन-आभूषणों को स्वीकार नहीं करते थे, बल्कि अहंकार और विषयों से दूर रहने की प्रेरणा देते थे।
अनोखा वात्सल्य और शिष्यों के प्रति समर्पण
पण्डित बाबा ने स्वयं किसी को दीक्षा नहीं दी, किंतु उनके संसर्ग से श्रीगौरांगदास बाबाजी, श्रीप्रियाशरणदास बाबा, श्रीकृपासिंधुदास बाबा और ठाकुर कुशलसिंह जी जैसे महान भक्त तैयार हुए। वे अपने शिष्यों और सेवकों से अगाध स्नेह रखते थे। कृपासिंधु बाबा उनकी परछाई बनकर उनकी हर सेवा में तत्पर रहते थे।
उनके जीवन में अनेक चमत्कारिक घटनाएं घटीं—चाहे वह अदृश्य रूप से शंकाओं का समाधान करना हो, अथवा विरोधियों का मार्ग बदलना हो। सन् १९६६ में ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया के दिन और जीवन के अंतिम समय तक वे निरन्तर नाम-जप और लीला-स्मरण में मग्न रहे, अंततः ठाकुर जी की प्रसादी माला के स्पर्श मात्र से उन्होंने नित्यधाम प्राप्त किया।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सांसारिक ऐश्वर्य, धन और पद-प्रतिष्ठा क्षणिक हैं। सच्चा जीवन वही है जो भगवान के चरणों में पूर्ण रूप से समर्पित हो, गुरु की आज्ञा का पालन करे और हर परिस्थिति में वैराग्य तथा विनम्रता को अपनाए।
भक्ति का संदेश
भगवान अपने सच्चे और निष्काम भक्तों के साथ न केवल स्नेह रखते हैं, बल्कि उनकी हर पग पर रक्षा भी करते हैं। नाम-जप और भगवत्-स्मरण ही कलियुग में भवसागर से पार उतरने का एकमात्र और सबसे सरल मार्ग है।
कथा का सार
पण्डित रामकृष्ण दास बाबाजी का पावन चरित्र त्याग, ज्ञान और प्रेम की त्रिवेणी है। ऐसी और प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के अन्य अध्याय अवश्य पढ़ें।