ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 42

पण्डित रामकृष्ण दास बाबाजी: बाल्यावस्था की दिव्य मैत्री से लेकर नित्यधाम गमन की अलौकिक लीला

श्रीगोविन्ददेव जी के साथ बचपन के खेल, कठोर साधना, गोवर्धन की राघव गुफा, शिष्यों के प्रति वात्सल्य और ठाकुर जी की प्रसादी माला के स्पर्श मात्र से नित्यधाम गमन की प्रेरणादायक गाथा।

पण्डित रामकृष्ण दास बाबाजी: बाल्यावस्था की दिव्य मैत्री से लेकर नित्यधाम गमन की अलौकिक लीला
पण्डित रामकृष्ण दास बाबाजी: बाल्यावस्था की दिव्य मैत्री से लेकर नित्यधाम गमन की अलौकिक लीला — ब्रज के भक्त भाग 1

जयपुर के श्रीगोविन्ददेव जी के साथ बाल्यावस्था में लुकाछिपी और खेल खेलने वाले, अगाध पाण्डित्य, कठोर वैराग्य और अनन्य भजन के बल पर वृन्दावन के महान संत बने पण्डित रामकृष्ण दास बाबाजी (रामप्रताप जी) का जीवन और उनका नित्यधाम गमन भागवत प्रेम का परमोत्कृष्ट उदाहरण है।

गोविन्ददेव जी के साथ बाल्यकाल की अद्भूत लीला और अध्ययन

जयपुर के राजकुमार जैसे संस्कारों और दैवी सम्पत्ति को लेकर जन्मे बालक रामप्रताप जब वृन्दावन आए, तो श्रीगोविन्ददेव जी के मन्दिर प्रांगण में भगवान स्वयं उनके साथ खेलने उतर आते थे। गोविन्द जी का उनकी सोने की गोली लेकर भाग जाना और मन्दिर के थाल में अतिरिक्त गोली प्रकट होना उनकी अलौकिक भक्ति का प्रमाण था।

खेल-कूद से मोह त्यागकर उन्होंने मात्र दस-ग्यारह वर्ष की आयु में पाणिनी के सूत्र, सारस्वत व्याकरण, अमरकोष और अनेक भक्ति-ग्रंथों को कंठस्थ कर लिया तथा तेरह वर्ष की आयु में वृन्दावन पहुँचकर वे पूर्णतः भजन-साधन में लीन हो गए।

राघव की गुफा का कठोर पुरश्चरण और शिष्यों के प्रति वात्सल्य

गुरुदेव सिद्ध श्रीनित्यानन्ददास बाबाजी से दीक्षा पाकर वे 'पण्डित बाबा' के रूप में प्रसिद्ध हुए। गोवर्धन की राघव की गुफा में सत्रह दिनों तक बिना अन्न-जल के कठोर पुरश्चरण करने पर उन्हें राधा-कृष्ण के साक्षात् दर्शन हुए। प्रिया-प्रियतम ने जब उनसे वर माँगने को कहा, तो उन्होंने केवल गुरु की आज्ञा से भजन करने की बात कही।

वे अपने शिष्यों जैसे श्रीगौरांगदास बाबा, श्रीप्रियाशरण दास और कृपासिंधु दास बाबा से अत्यंत वात्सल्य रखते थे। कृपासिंधु बाबा उनकी परछाई बनकर हर पल उनकी सेवा में तत्पर रहते थे, जिन्हें वे प्यार से 'बच्ची' कहकर पुकारते थे।

निस्पृह वैराग्य और ठाकुर जी की प्रसादी माला से नित्यधाम गमन

पण्डित बाबा ने जीवन भर निष्किञ्चन वैराग्य का पालन किया। राजा-महाराजाओं द्वारा लाए गए धन, आभूषण या भारी उपहारों को उन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया और व्रजवासियों की मधुकरी पर ही संतोष किया।

जीवन के अंतिम समय में जब वे अत्यंत दुर्बल हो गए थे, तब जयपुर से पधारे ठाकुर कुशलसिंह जी ने श्रीगोविन्ददेव जी की प्रसादी माला उनके गले में डाली। उस माला के स्पर्श मात्र से पण्डित बाबा ने अपनी भौतिक लीला का संवरण कर लिया और गोविन्द जी अपने बाल-सखा रामप्रताप को अपने निजधाम ले गए।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

यह प्रसंग हमें सिखाता है कि भगवान अपने अनन्य और निष्काम भक्तों के साथ बालक जैसा सख्य भाव रखते हैं। सच्चा वैराग्य और गुरु के चरणों में पूर्ण समर्पण ही मनुष्य को संसार के बंधनों से मुक्त कर परम धाम का अधिकारी बनाता है।

भक्ति का संदेश

भगवान बाह्य ऐश्वर्य या दिखावे के भूखे नहीं हैं, बल्कि वे केवल शुद्ध प्रेम और भाव के भूखे हैं। नाम-जप और निरंतर भगवत्-स्मरण ही कलियुग में जीवन को सार्थक करने का एकमात्र और सबसे सरल मार्ग है।

कथा का सार

पण्डित रामकृष्ण दास बाबाजी का पावन चरित्र ज्ञान, वैराग्य, सेवा और अनन्य प्रेम की त्रिवेणी है। ऐसी और प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के अन्य अध्याय अवश्य पढ़ें।