ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 11

नन्दग्राम के एक महात्मा और पुजारिका भूत की कथा

नन्दग्राम के यशोदाकुण्ड के निकट रहने वाले एक विरक्त महात्मा, पूर्व जन्म के पुजारी बने भूत के संकेत और साक्षात श्रीकृष्णावतार के दर्शन की मार्मिक कथा।

नन्दग्राम के एक महात्मा और पुजारिका भूत की कथा
नन्दग्राम के एक महात्मा और पुजारिका भूत की कथा — ब्रज के भक्त भाग 1

सच्ची लगन और तीव्र व्याकुलता जब हृदय में जाग उठती है, तब अदृश्य संकेत भी साधक को उसके आराध्य तक पहुँचा देते हैं। नन्दग्राम के एक अज्ञात महात्मा और पुजारिका भूत की यह कथा इसी अलौकिक प्रेम का प्रमाण है।

यशोदाकुण्ड में महात्मा की साधना

बहुत दिनों पहले नन्दीश्वर के निकट यशोदाकुण्ड के पास एक गुफा में एक महात्मा रहा करते थे। वे पहले गुफ़ाओं में एकांत में रहकर भजन करते थे और दिन में भिक्षा लेने के लिए गाँवों में जाते थे। कभी-कभी उन्हें कुछ दिनों तक भिक्षा के लिए गाँवों में जाना पड़ता था। वे किसी से अधिक बातचीत नहीं करते थे। किसी को यह भी पता नहीं था कि वे कौन हैं, कहाँ से आए हैं और उनका नाम क्या है।

एक बार बाबा नन्दग्राम छोड़कर कहीं चले गए। कुछ दिनों बाद वे वापस लौट आए। एक दिन वे नन्दग्राम में मधुकरी लेने गए। उस समय शाम हो चुकी थी। तभी उन्हें किसी की आवाज सुनाई दी, “ओ बाबा! मैं दो दिनों से भूखा हूँ।” आवाज सुनकर बाबा ने आश्चर्य से पूछा, “तुम कौन हो?” तब उस अदृश्य व्यक्ति ने कहा, “मैं एक दुर्गम जीव हूँ। पूर्व जन्म में इसी नन्दग्राम के मंदिर का पुजारी था। एक दिन भोग के लिए एक बड़ा लड्डू मिला था। मैंने उसे बिना किसी को दिए स्वयं खा लिया। उसी अपराध के कारण मुझे यह गति प्राप्त हुई है।

आप कुछ दिनों से मेरे पास आते हैं, इसलिए आज मैं आपसे अपनी बात कह रहा हूँ।”

बाबा उसकी बात सुनकर आश्चर्यचकित हो गए। उस अदृश्य जीव ने उनसे कहा कि वह अपने पूर्व जन्म के कर्मों के कारण इस अवस्था में है। बाबा ने उसकी बात सुनी और उससे भगवान के दर्शन के विषय में पूछा। तब उस जीव ने बताया कि वह भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन करना चाहता है, लेकिन उसे लगता है कि वह इसके योग्य नहीं है। बाबा ने उससे पूछा, “क्या तुम मुझे भगवान के दर्शन करा सकते हो?” उस जीव ने पहले कहा कि बाबा में वह योग्यता नहीं है, लेकिन बाबा के बार-बार पूछने पर उसने भगवान के दर्शन कराने का उपाय बताया।

अदृश्य जीव से हुई अनोखी बातचीत

उसने कहा, “बाबा! आप कल गोधूलि के समय यशोदाकुण्ड के पास बैठिए। जब श्रीकृष्ण गायें चराकर लौटते हैं, तब उनके पीछे जो ग्वाल-बाल आते हैं, उनमें सबसे पीछे आने वाले बालक को ध्यान से देखिए। वही गोपाल हैं।” इतना कहकर वह शवानरूपी भूत अन्तर्धान हो गया।

बाबा अब चैन से नहीं बैठ सके। रात जैसे-तैसे कटी। कभी वे गाते, कभी नाचते और कभी रो-रोकर अधीर हो जाते। सुबह होते ही वे यशोदाकुण्ड के निकट एक झाड़ी में जाकर बैठ गए। उनके मन में तरह-तरह के विचार उठ रहे थे। वे सोचने लगे कि क्या सचमुच श्रीकृष्ण उन्हें दर्शन देकर कृतार्थ करेंगे? क्या वे उनके दर्शन के योग्य हैं? फिर वे सोचते कि यदि भगवान उन पर कृपा कर दें, तो उनका बिगड़ा हुआ जीवन भी सुधर सकता है। इसी आशा में वे दोपहर और फिर तीसरे पहर तक वहीं बैठे रहे।

धीरे-धीरे सूर्य अस्त होने लगा और गोधूलि की बेला आ पहुँची। वृक्षों के झुरमुट के बीच गोधूलि से रंगा आकाश दिखाई देने लगा। बाबा धैर्य धारण करके झाड़ी में बैठे रहे। गायों और बछड़ों के रंभाने की आवाजें आकाश में गूँजने लगीं। कुछ देर बाद उन्हें सामने से गायों के झुंड आते दिखाई दिए। उनके पीछे एक-दो ग्वाल-बाल अपनी-अपनी गायों को अलग करते हुए चल रहे थे। सबसे पीछे एक साँवले रंग का बालक दिखाई दिया, जिसके हाथ में लकुटिया थी। वह अपनी गायों और बछड़ों को अलग करके खर्ज-गति से नन्दग्राम की ओर जा रहा था।

गोधूलि में श्रीकृष्ण के दर्शन

उसे देखते ही बाबा कूदते-फाँदते उसके पास पहुँचे और साष्टांग दण्डवत् करने लगे। उन्होंने उसके दोनों चरणों को अपनी भुजाओं में जकड़ते हुए अपना माथा उन पर टेक दिया। भक्त और भगवान दोनों एक-दूसरे के स्पर्श से पुलकित हो उठे। भगवान स्वाभाविक चंचलता धारण करते हुए बोले, “बाबा! ऐसा क्यों कर रहे हो? बाबा, घर के ग्वालों को प्रणाम करो। छोड़ो, जान दे माँ!”

बाबा रोते हुए बोले, “दयामय! दया करो, दया करो!” वे फूट-फूटकर रोने लगे। उनके आँसुओं से भगवान के चरण भीग गए। बाबा हँसते हुए, काँपते हुए और अस्पष्ट शब्दों में कुछ कहने लगे। वे क्या कह रहे थे, यह उन्हें स्वयं भी ठीक से समझ नहीं आ रहा था। भगवान उनकी भक्ति को समझ रहे थे। बाबा की दशा देखकर ऐसा लग रहा था, मानो वे कह रहे हों, “बाबा, बावरी है रही है। देख जान दे, देर हो रही है। मथुरा मारेगी।”

इस प्रकार बाबा को भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन प्राप्त हुए। उनकी भक्ति और प्रेम ने उन्हें उस दर्शन का आनंद दिया, जिसकी आशा में वे बेचैन होकर पूरे दिन प्रतीक्षा करते रहे थे।

कथा का सार

नन्दग्राम के महात्मा और पुजारिका भूत की कथा के ये प्रसंग भक्ति और साधना पर मनन करने का अवसर देते हैं। इसी संग्रह की अन्य कथाएँ भी पढ़ें।