ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 36

मुसलमान भक्त गुलाब सखीजी: बरसाने के सारंगी वादक की अलौकिक प्रेम-साधना

बरसाने के गरीब मुसलमान सारंगी वादक गुलाब (गुलाब सखीजी) की प्रेरणादायक गाथा, जो अपनी पुत्री के विरह में श्रीजी के द्वार पर रोए और साक्षात् राधारानी की कृपा के पात्र बने।

मुसलमान भक्त गुलाब सखीजी: बरसाने के सारंगी वादक की अलौकिक प्रेम-साधना
मुसलमान भक्त गुलाब सखीजी: बरसाने के सारंगी वादक की अलौकिक प्रेम-साधना — ब्रज के भक्त भाग 1

बरसाने की पावन रज में पले-बढ़े, श्रीजी के मन्दिर में सारंगी बजाने वाले गरीब मुसलमान गुलाब का जीवन इस बात का प्रमाण है कि राधारानी की कृपा पाने के लिए किसी बड़े जप-तप की नहीं, बल्कि एक निष्कपट और सरल हृदय की आवश्यकता होती है।

प्रारंभिक जीवन, सारंगी वादन और पुत्री 'राधा' से प्रेम

गुलाब बरसाने का एक अत्यंत दीन, भावुक और सरल मुसलमान था, जो पढ़ा-लिखा नहीं था किंतु सारंगी बहुत अच्छी बजाता था। बरसाने की लीला-स्थलियों की रज माथे पर लगाना और श्रीजी (राधारानी) के मन्दिर के प्रांगण में होने वाले समाज में सारंगी बजाना ही उसकी जीविका और जीवन का एकमात्र आनंद था।

वह अपनी छोटी पुत्री से बहुत प्रेम करता था जिसे वह प्यार से 'राधा' कहा करता था। जब वह समाज में सारंगी बजाता, तो उसकी लड़की नृत्य किया करती थी। गोस्वामियों और बरसाने के लोगों के सहयोग से जब उसकी पुत्री का विवाह हो गया और वह ससुराल चली गई, तो गुलाब का संसार उजड़ गया।

विरहोन्माद, सिंहद्वार पर रोदन और साक्षात राधारानी के दर्शन

पुत्री के विरह में गुलाब तीन दिन और तीन रात भूखा-प्यासा श्रीजी के मन्दिर के सिंहद्वार पर गुमसुम बैठा रहा। तीसरे दिन रात के बारह बजे उसे अपनी बेटी की आवाज सुनाई दी, जो नृत्य करने के लिए कह रही थी। जब उसने आँखें खोलकर देखा, तो वह उसकी पुत्री नहीं बल्कि स्वयं राधारानी थीं, जो उसी की तरह नृत्य कर रही थीं।

राधारानी मन्दिर की ओर भागीं और गुलाब उनके पीछे-पीछे भागा, जिसके पश्चात् बरसाने से गुलाब अचानक अदृश्य हो गया। बाद में एक गोस्वामी को उसने श्रीजी के प्रसादी पान की बीड़ी देकर यह सिद्ध कर दिया कि श्रीजी ने उसे अपने परिकरों में स्थान दे दिया है।

नित्यधाम गमन और गुलाब सखी का चबूतरा

बरसाने के पीलीपोखर से प्रेमसरोवर जाने वाले मार्ग के निकट आज भी वह पुराना चबूतरा 'गुलाब सखी का चबूतरा' के नाम से सुशोभित है, जहाँ आते-जाते लोग माथा टेकते हैं। यह घटना यह सिखाती है कि राधारानी की कृपा पाने के लिए बाह्य साधन नहीं, बल्कि एक निष्कपट और सरल हृदय की आवश्यकता होती है।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

यह प्रसंग हमें सिखाता है कि भगवान या राधारानी किसी जाति, पंथ या बाह्य दिखावे के भूखे नहीं हैं। वे केवल भक्त के सरल, निष्कपट और प्रेम से भरे हुए हृदय को देखते हैं। सच्ची तड़प और दीनता ही भगवान को खींचकर ले आती है।

भक्ति का संदेश

जो व्यक्ति अपने जीवन में पूरी तरह सरल और कपट-रहित होकर भगवद्दरबार से जुड़ा रहता है, उस पर करुणामयी राधारानी की अहैतुकी कृपा स्वतः बरसने लगती है। सच्ची भक्ति हृदय की पवित्रता से प्रगट होती है।

कथा का सार

मुसलमान भक्त गुलाब सखीजी का पावन चरित्र दीनता, सरलता और राधारानी की अहैतुकी कृपा का एक अनूठा प्रतीक है। ऐसी और प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के अन्य अध्याय अवश्य पढ़ें।