ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 33
गोस्वामी श्रीगल्लूजी महाराज: श्रीराधारमण के अनन्य सेवक, कथाकार और रसिक भक्त
वृन्दावन के श्रीराधारमण मंदिर के सेवाइत गोस्वामी श्रीगल्लूजी महाराज के जीवन की प्रेरणादायक कथा, जिसमें उनकी सत्यनिष्ठा, कथा-कीर्तन द्वारा पिता का ऋण चुकाना और श्रीराधारमण जी से अगाध प्रेम का वर्णन है।

ललित किशोरी जी जैसी उच्चकोटि की संतों द्वारा जिनकी रतिमति पाने की अभिलाषा व्यक्त की गई, ऐसे गोस्वामी श्रीगल्लूजी महाराज का जीवन सत्यनिष्ठा, दैन्य, कथा-कीर्तन द्वारा भगवद्भक्ति और श्रीराधारमण लाल के प्रति अनन्य समर्पण का एक पावन प्रतीक है।
प्रारंभिक जीवन, सत्यनिष्ठा और कथा द्वारा ऋण मुक्ति
गोस्वामी श्रीगल्लूजी महाराज का जन्म ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी, संवत १८८४ को वृन्दावन में श्रीराधारमण मंदिर के सेवाइत श्रीरमणदयालु गोस्वामी के यहाँ हुआ था। वे बाल्यावस्था से ही सत्य और दैन्य की मूर्ति थे। उनके पिता पर वृन्दावन में काफ़ी कर्ज हो जाने के कारण उन्हें फर्रुखाबाद रहना पड़ा था।
अपने इष्ट के धाम लौटने और पिता का ऋण चुकाने के लिए उन्होंने मात्र १० वर्ष की आयु से भगवत-कथा कहना आरंभ किया। कथाओं से प्राप्त भेंट से उन्होंने सारा कर्ज चुका दिया और बाद में पिता के साथ वापस वृन्दावन आ गए।
श्रीराधारमण लाल की सेवा और अनन्य प्रेमाभक्ति
वृन्दावन आने के पश्चात् गल्लूजी का श्रीराधारमण जी से प्रेम दिन-प्रतिदिन गहरा होता गया। वे बड़ी निष्ठा से श्रीराधारमण जी की मंगला आरती और प्रसादी रोटी की भिक्षा माँगने का नियम निभाते थे। कभी-कभी सेवा न मिलने पर वे श्रीजी से प्रणय-आक्षेप भी करते थे।
वे अपनी कथाओं में केवल व्रजभाषा का प्रयोग करते थे और मिलने वाला सारा धन साधु-संतों व व्रजवासियों की सेवा में खर्च कर देते थे। संवत १९३२ में उन्होंने षड्भुज महाप्रभु के मंदिर की स्थापना की और संवत १९३७ के बाद वृन्दावन से बाहर न जाने का संकल्प लेकर शेष जीवन युगल सरकार की सेवा में बिता दिया।
नित्यधाम गमन
मार्गशीर्ष कृष्ण १, संवत १९४७ को श्रीराधारमण जी ने उन्हें अपनी नित्य सेवा में स्वीकार किया। उनके दाह-संस्कार के समय भी उनकी गले की कंठी सुरक्षित रही, जिसे लोगों ने प्रसाद के रूप में ग्रहण किया। वे 'गुणमंजरी' नाम से पद-रचना करते थे और उनके 'श्रीराधारमण-पदमंजरी' ग्रंथ के पद आज भी मंदिर में गाए जाते हैं।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि भगवद्भक्ति और सत्यनिष्ठा मनुष्य के जीवन को सर्वोच्च शिखर पर पहुँचा देती है। धन-संपत्ति या भौतिक सुखों का मोह छोड़कर यदि जीवन भगवान की सेवा और परोपकार में लगाया जाए, तो जीवन सार्थक हो जाता है।
भक्ति का संदेश
भगवान अपने अनन्य भक्तों के प्रेम के भूखे होते हैं। जो भक्त सुख-दुःख हर परिस्थिति में अपने इष्ट को ही सर्वस्व मानता है और अपनी हर बात सीधे अपने भगवान से कहता है, उस पर श्रीराधारमण लाल की अहैतुकी कृपा सदैव बनी रहती है।
कथा का सार
गोस्वामी श्रीगल्लूजी महाराज का पावन चरित्र सरलता, त्याग और रसिक भक्ति का एक अनूठा उदाहरण है। ऐसी और प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के अन्य अध्याय अवश्य पढ़ें।