ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 35
भक्त श्रीनवलकिशोर दासजी: नन्दग्राम के लाला के प्रति वात्सल्य और संगमरमर फर्श की अनोखी कथा
राजस्थान के अलवर से आकर नन्दगाँव में बसे भक्त श्रीनवलकिशोर दासजी की जीवन गाथा, जिन्हें बालगोपाल श्रीकृष्ण-बलराम के दर्शन हुए और उन्होंने नन्दबाबा के मंदिर में संगमरमर का फर्श लगवाया।

नैष्ठिक ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाले और विष्णु उपासना से जुड़े श्रीनवलकिशोर दासजी का मन किस प्रकार नन्दग्राम के लाला के बाल-स्वरूप पर मुग्ध हुआ और उन्होंने अपनी अनन्य प्रेम-सेवा से नन्दबाबा के मंदिर का कायापलट कर दिया, यह कथा भक्ति की पराकाष्ठा को दर्शाती है।
वृन्दावन आगमन और नन्दगाँव में वैराग्यमय जीवन
राजस्थान के अलवर जिले के चौधरी का नगला ग्राम में जन्मे श्रीनवलकिशोरजी के माता-पिता भगवान विष्णु के उपासक थे। माता हीरादेवी की नन्दलाल में अगाध श्रद्धा थी, जिनके कृपा-आशीर्वाद से उनका परिवार वृन्दावन आ बसा। माता के परलोक गमन के पश्चात् नवलकिशोरजी का वैराग्य और भी तीव्र हो गया। उन्होंने अपनी सारी संपत्ति ठाकुर-वैष्णवों की सेवा में लगा दी और स्वयं पत्नी सहित नन्दगाँव आकर आशेश्वर पर भजन करने लगे।
कुछ समय बाद पत्नी को मैके भेजकर वे पूरी तरह वैराग्यवेश में आ गए। आरंभ में वे अत्यंत संकोच और शुद्धता से विष्णु उपासना करते थे और मधुकरी माँगकर स्वयं रसोई बनाते थे।
श्रीकृष्ण-बलराम के दर्शन और नन्दलाल की सेवा
एक दिन मधुकरी माँगते समय एक व्रजमाई के बालकों के साथ श्रीकृष्ण और बलराम को जूठी महेरी खाते देख नवलकिशोरजी की दृष्टि पूरी तरह बदल गई। उन्हें अनुभव हुआ कि व्रज का ठाकुर शुद्धता नहीं, बल्कि प्रेम देखता है। इसके बाद उन्होंने नन्दलाल को अपना सर्वस्व मान लिया।
एक बार जब उन्हें स्वप्न में नन्दलाल के चरणों में कंकड़ गड़ने का कष्ट दिखा, तो वे तुरंत मकराना (जोधपुर) गए और वहाँ के व्यापारियों की सहायता से नन्दबाबा के मन्दिर तथा जगमोहन में चिकना संगमरमर का फर्श और सुंदर छतरी बनवाई। वे प्रतिदिन अपने हाथ से दस लड्डू बनाकर नन्दलाल को अर्पित करते थे।
नित्यधाम गमन
जीवन के अंतिम चरणों में वे कांताभाव के उपासक बनकर युगल सरकार की सेवा में लीन हो गए। संवत १९३७ में नन्दगाँव के आशेश्वर पर उन्होंने अपनी भौतिक लीला का संवरण कर नित्यधाम में प्रवेश किया, जहाँ आज भी उनकी समाधि विद्यमान है।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि भगवान बाह्य शुद्धि या कर्मकांडों से नहीं, बल्कि केवल और केवल निष्काम प्रेम और अंतरंग समर्पण से रीझते हैं। भक्त का सच्चा संबंध भगवान से प्रेम का होता है।
भक्ति का संदेश
भगवान अपने अनन्य भक्तों के हर छोटे-बड़े संकल्प को स्वयं पूरा करते हैं। जब मनुष्य का हृदय सांसारिक अभिमान छोड़कर भगवान के चरणों में पूरी तरह समर्पित हो जाता है, तब भगवान उसके माध्यम से अपनी अद्भुत लीलाओं को संपन्न कराते हैं।
कथा का सार
भक्त श्रीनवलकिशोर दासजी का पावन चरित्र प्रेम, सरलता और नन्दलाल के प्रति अनन्य वात्सल्य का अनूठा उदाहरण है। ऐसी और प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के अन्य अध्याय अवश्य पढ़ें।