ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 32
भक्त श्रीभोलानाथजी (भोरीसखी): विरह, प्रणय-रोष और अनन्य प्रेम की पराकाष्ठा
छतरपुर के राजा के धार्मिक सलाहकार से लेकर वृन्दावन में 'भोरीसखी' बनकर श्रीराधारानी के विरह में अश्रु बहाने वाले श्रीभोलानाथजी की प्रेरणादायक जीवन गाथा और उनके पद।

छतरपुर नरेश के राजगुरु और प्रतिष्ठित सलाहकार का पद छोड़कर वृन्दावन की कुंज-गलियों में स्त्री वेश धारण कर 'भोरीसखी' के रूप में राधारानी की अनन्य सेवा करने वाले श्रीभोलानाथजी का जीवन प्रणय-रोष, विरह और रसिक भक्ति की पराकाष्ठा है।
राजकीय वैभव का त्याग और वृन्दावन आगमन
मध्य प्रदेश के छतरपुर रियासत में राजा के धार्मिक सलाहकार और सम्मानित पण्डित के रूप में जीवन बिताने वाले भोलानाथजी का मन राजसी वैभव में नहीं रमता था। उनके हृदय में हमेशा ब्रज और श्रीराधारानी के चरणों के प्रति अगाध प्रेम उबलता रहता था।
सब कुछ त्यागकर वे वृन्दावन आ गए और यहाँ आकर उन्होंने पूरी तरह से गोपी-भाव (सखी-भाव) को अपना लिया। वे स्वयं को राधारानी की दासी या सखी मानते थे और उनका नाम 'भोरीसखी' पड़ गया।
भोरीसखी का विरह, प्रणय-रोष और रसिक पद रचना
भोरीसखी का जीवन राधारानी के विरह और उनके साथ प्रणय-रोष (प्रेम का झगड़ा) में बीतता था। जब कभी उन्हें मानसिक रूप से ऐसा अनुभव होता कि स्वामिनी (राधारानी) उन पर ध्यान नहीं दे रही हैं, तो वे बच्चों की तरह रूठ जाती थीं और प्रेम से भरे हुए उलाहने के पद गाती थीं।
उनकी रचनाओं और पदों में राधारानी के प्रति जो अनन्य समर्पण और तड़प दिखाई देती है, वह बड़े-बड़े विद्वानों और संतों को भी विस्मय में डाल देती थी। वे हर समय युगल सरकार की निकुंज लीलाओं के ध्यान में डूबे रहते थे।
नित्यधाम गमन
अपने इष्ट के चरणों में संपूर्ण जीवन समर्पित करने वाले भक्त श्रीभोलानाथजी (भोरीसखी) ने अपनी अंतिम सांस तक ब्रज की रज में रहकर विरह-भक्ति का उच्च आदर्श प्रस्तुत किया और अंततः नित्यधाम को प्राप्त हुए।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि ईश्वर के साथ भक्त का संबंध केवल मालिक और नौकर का नहीं, बल्कि प्रेम, अधिकार और अपनेपन का भी हो सकता है। सच्ची भक्ति अहंकार को मिटाकर प्रेम का सहज रिश्ता जोड़ती है।
भक्ति का संदेश
राधारानी और कृष्ण की प्राप्ति के लिए किसी बाहरी दिखावे की नहीं, बल्कि हृदय की सच्ची तड़प और आर्तभाव की आवश्यकता होती है। जब भक्त पूरी तरह सखी-भाव में डूब जाता है, तब भगवान स्वयं उसके प्रेम के अधीन हो जाते हैं।
कथा का सार
भक्त श्रीभोलानाथजी (भोरीसखी) का पावन चरित्र विरह, समर्पण और रसिक भक्ति का एक अनूठा प्रतीक है। ऐसी और प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के अन्य अध्याय अवश्य पढ़ें।