ब्रज के भक्त भाग 1 · अध्याय 40

भक्त दादर रहमान: मथुरा के मुसलमान बालक से वृन्दावन के सिद्ध परमहंस बनने की अलौकिक गाथा

मथुरा के एक शर्मीले मुसलमान बालक दादर रहमान की प्रेरणादायक गाथा, जिसे मकतब जाते समय राधा-कृष्ण की मूर्ति के दर्शन हुए और जो सब कुछ त्यागकर वृन्दावन में साक्षात् चंपा सखी व राधारानी की कृपा का पात्र बना।

भक्त दादर रहमान: मथुरा के मुसलमान बालक से वृन्दावन के सिद्ध परमहंस बनने की अलौकिक गाथा
भक्त दादर रहमान: मथुरा के मुसलमान बालक से वृन्दावन के सिद्ध परमहंस बनने की अलौकिक गाथा — ब्रज के भक्त भाग 1

भक्ति भगवान की स्वरूप शक्ति है जो किसी भी कुल, जाति या मजहब की सीमा में बंधे बिना साधक के हृदय को प्लावित कर देती है। मथुरा के एक साधारण मुसलमान बालक दादर रहमान का राधारानी के चरणों में अनन्य अनुराग और उसका परमहंस रूप में वृन्दावन में विलीन हो जाना प्रेम की पराकाष्ठा का जीवंत उदाहरण है।

प्रारंभिक जीवन, मकतब की शिक्षा और मन्दिर के प्रति आकर्षण

आज से लगभग पचास वर्ष पूर्व मथुरा में विश्राम घाट के निकट दादर रहमान नाम का एक पन्द्रह-सोलह वर्ष का मुसलमान बालक रहता था। वह मकतब में पढ़ता था और बहुत शर्मीले व शांत स्वभाव का था। एक दिन जब उसने अपनी माँ से पूछा कि 'हमलोग हिन्दुओं को काफिर क्यों कहते हैं', तो घर में खलबली मच गई। पिता ने उसे कुरान की आयतों का हवाला देकर बहुत डाँटा-पीटा, क्योंकि उन्हें डर था कि वह मार्ग से भटक रहा है।

वास्तव में दादर को किसी ने बहकाया नहीं था, बल्कि स्कूल आते-जाते रास्ते में पड़ने वाले एक मन्दिर के बाहर से राधा-कृष्ण की मन-मोहक मूर्तियों ने उसके कोमल हृदय को अपनी ओर खींच लिया था। वह मन्दिर के दरवाजे पर खड़े होकर एकटक उन्हें देखता रहता था और उनकी याद में उसकी आँखें हमेशा नम रहती थीं।

घर का त्याग, विरहोन्माद और वृन्दावन की यमुना-तट की साधना

जब उसके चचेरे भाई कासिम ने उसकी इस 'काफिराना हरकत' की शिकायत उसके घर में कर दी, तो उसके पिता ने उसे बेरहमी से पीटा। अंततः एक दिन वह घर से सदा के लिए लापता हो गया और अपनी माँ से कह गया कि उसकी उम्मीद छोड़ दे क्योंकि वह 'काफिर' हो चुका है और 'लाड़ली' उसे बुला रही है।

बंगाल से आए यात्री प्रमोदकुमार चट्टोपाध्याय ने अपनी आँखों से वृन्दावन में यमुना तट पर उसका जो रूप देखा, वह अद्भुत था। कौपीनधारी दादर को एक व्रजांगना (जिसे वह 'चंपा सखी' कहकर संबोधित करती थी) नित्य आकर प्रेम से दूध और खाद्य पदार्थ खिलाती थी। दादर की आँखें हमेशा यमुना की ओर निबद्ध रहती थीं और उसका रोम-रोम भगवत्प्रेम में डूबा हुआ था।

चम्पा सखी के साथ अन्तर्धान

प्रमोदकुमार चट्टोपाध्याय के सामने ही चम्पा सखी पुनः प्रकट हुई और स्नेह से उसका हाथ पकड़कर उसे अपने साथ ले चली। चम्पा सखी के पीछे-पीछे जाते हुए दादर उनकी आँखों के सामने ही अचानक अन्तर्धान हो गया, जिससे यह सिद्ध हुआ कि राधारानी ने अपने इस अनन्य प्रेमी को अपने निजधाम की सेवा में स्वीकार कर लिया है।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति किसी मजहब, जाति या बाहरी परिवेश की मोहताज नहीं होती। भगवान और राधारानी केवल और केवल सरल, पवित्र और प्रेम से भरे हुए हृदय के भूखे हैं।

भक्ति का संदेश

जब किसी साधक के हृदय में भगवान के प्रति अगाध और सच्चा प्रेम जागृत हो जाता है, तब संसार के सारे बंधन और भय स्वतः समाप्त हो जाते हैं। करुणामयी राधारानी अपने हर सच्चे प्रेमी को अपनी गोद में स्थान देती हैं।

कथा का सार

भक्त दादर रहमान का पावन चरित्र यह सिद्ध करता है कि भगवत्प्रेम समस्त सीमाओं को लाँघकर केवल शरणागति और शुद्ध भाव को देखता है। ऐसी और प्रेरणादायक कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के अन्य अध्याय अवश्य पढ़ें।