ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 103

स्वामी श्रीकृष्णनन्ददासजी

स्वामी श्रीकृष्णनन्ददासजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

स्वामी श्रीकृष्णनन्ददासजी
स्वामी श्रीकृष्णनन्ददासजी — ब्रज के भक्त भाग 3

स्वामी श्रीकृष्णनन्ददासजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ हिंडौल ]

स्वामी कृष्णानन्दजीके पूर्वाश्रमका नाम था श्रीकर्मचन्द । उनका जन्म सन् १८८३ में पंजाबके जालंधर जिलेके अन्तर्गत बुण्डाला नामक उपनगरमें उच्च गौड-ब्राह्मण परिवारमें हुआ था। पिताका नाम था श्रीभोलाराम और माँका नाम था श्रीमती रली। दोनों बडे सदाचारी और धर्मात्मा व्यक्ति थे। गीता और रामायणके पाठ और साधु-महात्माओंके संगमें ही उनका अधिकांश समय व्यतीत होता था।

माता-पिताके धार्मिक संस्कारोंका प्रभाव बालक कर्मचन्दपर पड़ना स्वाभाविक था। वह ध्रुव-प्रह्लादादिके चरित्रोंको बड़े चावसे सुनता और उनका मनन करता। हिन्दी और संस्कृत पढ़नेमें उसकी स्वाभाविक रुचि थी, पर पंजाबमें उर्दूका प्रचार अधिक था। माता-पिताने उसे उर्दू मिडिल पास कराकर बड़े भाई श्रीदौलतरामजीके पास अँग्रेजी पढ़नेके लिए कालका भेज दिया।

कर्मचन्दकी उम्र उस समय चौदह वर्ष की थी। उसने अपने जीवनका लक्ष्य पहले ही स्थिर कर लिया था। उसे ध्रुव-प्रह्लादकी तरह साधनामय जीवन व्यतीतकर भगवत-साक्षात्कार लाभ करना था। अँग्रेजीकी शिक्षाका उस लक्ष्यसे कोई सम्बन्ध था नहीं। उसे संस्कृत पढ़कर शास्त्राध्ययन द्वारा अपने भगवत-प्राप्तिके मार्गको प्रशस्त करना था। पर माता-पिता उसके संस्कारोंसे प्रसन्न होते हुए भी उसी एक सुशिक्षित, सुसम्पन्न उच्च पदाधिकारीके रूपमें देखना चाहते थे। इसलिए, उसे अँग्रेजी पढ़ाना आवश्यक समझते थे।

कर्मचन्द इस समय अपने जीवन पथके एक महत्त्वपूर्ण चौराहेपर खड़ा था। निर्णय करना था, वहाँसे उसे किधर जाना है। निर्णय करते उसे देर न लगी। उसने सोचा कि माता-पिता और बड़े भाईके अधीन रहकर अपने लक्ष्यको प्राप्त नेमें उसे बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। इसलिए, उसने संसार त्यागकर एक स्वतन्त्र पथका पथिक बननेका निश्चय कर दिया।

आज कर्मचन्द घरसे भागकर शिवनगरी काशी चला आया है। विश्वनाथके दर्शनकर गंगाके तटपर चिन्तित बैठा है और विश्वनाथ बाबासे मन-ही-मन कुछ पार्थना कर रहा है। उसके गौरवर्ण और तेजपुञ्ज कलेवरपर काशीके एक बड़े मठाधीशकी दृष्टि पड़ी। उन्होंने निकट जाकर पूछा- 'वत्स, तुम कहाँसे आये है? कैसे चिन्तामें बैठे हो ?'

कर्मचन्दने अपना सब वृत्तान्त कह सुनाया। साथ ही विद्याध्ययन और संन्यास ग्रहण करनेका अपना निश्चय प्रकट किया। मठाधिपति ऐसे ही एक नवयुवककी खोजमें थे। उन्होंने उसके अध्ययनादिकी समुचित व्यवस्था कर देनेका उचन दिया और उसे अपने साथ मठमें ले गये।

दस वर्ष तक कर्मचन्दने उस मठमें रहकर संस्कृत व्याकरण, न्याय, मीमांसा और शांकर-वेदान्तका अध्ययन किया। इसी बीच संन्यास-दीक्षा भी ग्रहण की। नाम हुआ श्रीकृष्णानन्द। स्वामी कृष्णानन्दजीको मठाधिपतिने मठका सारा भार सौंप देनेका पहले ही निश्चय कर लिया था। उन्हें गद्दीपर बैठा देनेके लिए वे एक शुभतिथिकी प्रतीक्षा करने लगे।

स्वामी कृष्णान्दजी अब अपने जीवनके एक और चौराहपर आ खड़े हुए थे। उन्हें निश्चय करना था कि उन्हें मठाधीशका वैभवपूर्ण जीवन व्यतीत करना है, हाथी घोड़े, नौकर-चाकर, सोने-चाँदीके छत्र-सिंहासन और विलासिताकी अन्य सामग्रीका उपभोग करना है, या विरक्त संन्यासीके कंटकाकीर्ण पथका अवलम्बन करना है। मठाधीशका वैभव उन्हें अपने निर्दिष्ट पथसे विचलित करनेमें असमर्थ था, पर वे एक धर्मसंकटमें पड़ गये थे। जिस मठाधिपतिने उनके लिए इतना कुछ किया था उन्हें अपना भार सौंप देनेके उद्देश्यसे, उसकी सारी आशाओंपर वे सहसा पनी कैसे फेर देते ? एक दिन यही सब सोचते-सोचते उन्हें झपकी लग गयी। अर्धनिद्रित अवस्थामें उन्होंने देखा कि एक सुन्दर गौरवर्ण बालक उनसे कह रहा है- 'यदि तुम अपना कल्याण चाहते हो. तो इस स्थानको छोडकर चले जाओ।'

दूसरे दिन प्रातःकाल वे दण्ड-कमण्डलु और 'खण्डनखाद्य' नामक ग्रन्थ किनारे-किनारे पश्चिमकी ओर चल दिये। ढाई साल तक गंगा-भ्रमण करते रहे। लेकर मठसे निकल पडे। गंगा स्नानकर श्रीविश्वनाथजीके दर्शन किये और गंगाके दिनमें एक बार किसी गाँवसे भिक्षाटन कर लेते। यदि गाँव मार्गमें न पड़ता तो गङ्गाजल पीकर ही रह जाते। अधिकतर मौन धारणकर रहते। आवश्यकतानुसार

किसीसे थोड़ा बहुत आलाप करते।

इस बीच उन्होंने यथासम्भव साधुसंग भी किया और जिसने जो बताया उसके अनुसार ध्यान-प्राणायामादिकर शान्ति लाभ करनेकी चेष्टा की। पर उन्हें वास्तविक शान्ति न मिली। अन्त में चलते-चलते वे अनूपशहर पहुँचे, जहाँ गङ्गा-किनारे नावमें श्रीअच्युत मुनि रहते थे। वे एक विद्वान और अनुभवी महात्मा थे। उनके दर्शन और उपदेशसे उन्हें कुछ शान्ति मिली। उन्होंने उन्हें भावुक और रसिक जान व्रजमें रहकर भजन करनेका उपदेश किया।

कृष्णानन्दजी वृन्दावन पहुँच गये। वहाँ रासबिहारीकी रासलीला देख एकाएक उनका कायापलट हो गया। उनका ब्रह्मज्ञान वैसे ही विलीन हो गया, जैसे सूर्यके प्रकाशमें दीपका प्रकाश विलीन हो जाता है। रासनृत्यमें रास-बिहारीकी थिरकनके साथ उनके प्राणभी थिरकने लगे। उनका हृदय रससे परिपूर्ण हो गया। वे समझ गये कि जिस शान्तिकी वे इतने दिनोंसे खोजमें थे वह उन्हें रासबिहारीके चरणतलमें ही मिल सकती है, अन्यत्र कहीं नहीं।

रासलीला देखकर उनकी इच्छा हुई श्रीमद्भागवत महापुराणका अध्ययन करने की। वे दिनभर रास देखते और श्रीमद्भागवत महापुराणका अध्ययन करते। जहाँ कहीं रास होता वहीं पहुँच जाते। रासमें बराबर खड़े रहकर ठाकुरजीको पंखा झलते या चमर डुलाते। रासलीलाका चिंतन करते-करते रातमें जहाँ स्थान मिलता सो जाते।

गुरु-सान्निध्य और आध्यात्मिक शिक्षा

उस समय व्रजमें बहुत-से भजनानन्दी और सिद्ध गौड़ीय महात्मा रहते थे, जिनमें पण्डित रामकृष्णदास बाबाजी महाराज मुख्य थे। कृष्णानन्दजीने उनका संग किया। उनके संगसे उनमें परम करुण, पतित-पावन श्रीगौरांग महाप्रभुकी भक्तिका उन्मेष हुआ। बँगला भाषा सीखकर व श्रीचैतन्य-चरितामृत और श्रीचैतन्य-भागवतादि ग्रन्थोंका पाठ करने लगे। दिन-पर-दिन श्रीगौरांग महाप्रभुमें उनकी निष्ठा-भक्ति बढती गयी। उन्होंने किसी गौडीय महात्मासे दीक्षा लेकर महाप्रभुके चरणोंमें आत्मसमर्पण करनेका निश्चयकर लिया।

समय श्रीमाधवदास बाबाजी भी किवाडिवनमें रहते थे। जैसा हम पहले वर्णन कर कुछ दिनों बाद वे किवाडिवनमें एक कुटियामें रहकर भजन करने लगे। उस आये है श्रीमाधवदास बाबाजी एक सिद्धकोटिके वैष्णव सन्त थे। उन्होंकी कृपासे कृष्णानन्दजीको वैष्णव गुरुकी प्राप्ति हुई। उन्होंने माध्वगौडीय सम्प्रदायमें दीक्षा ग्रहण करनेके लिए उन्हें उत्कण्ठित देखकर कहा- 'तुम्हारे जैसे विद्वान और तेजस्वी पुरुषके लिए योग्य गुरु हैं १०८ श्रीप्राणगोपाल गोस्वामी भुके वंशज और माध्वगौडीय वैष्णव सम्प्रदायके मुख्य स्तम्भ हैं। कुछ दिन उनके वृन्दावन आनेकी प्रतीक्षा करो। मैं उन्हींसे तुम्हें दीक्षा दिलवाऊँगा।' प्रभुपाद। वे नित्यानन्द

कृष्णानन्दजी श्रीपाणगोपाल प्रभुपादके वृन्दावन आगमनकी उत्कण्ठा सहित प्रतीक्षा करने लगे। कुछ ही दिनों बाद प्रभुपादका शुभागमन हुआ। उनके शुभागमनके साथ ही उनकी अमृतमयी कथाका शुभारम्भ हुआ। कथा सुनकर कृष्णानन्दजी इतना प्रभावित हुए कि मन-ही-मन उन्हें गुरु रूपमें वरण किये बिना न रह सके। पीछे एक शुभ दिन, शुभ महूर्तमें उनसे दीक्षा ग्रहण की।

दीक्षा ग्रहणकर वे व्रजके हिंडौल ग्राममें रहकर भजन करने लगे। यह माँट तहसीलमें नन्दघाटसे दो मील दूर एक सुन्दर ग्राम है। इसके उत्तरमें कुछ प्राचीन डण्डहर और जंगल हैं। यही एक ऊँबे स्थानपर, जहाँसे नन्दघाटके दर्शन होते हैं, गाँववालोंने अपने हाथसे एक कुटियाका निर्माण किया। कृष्णानन्द बाबा उसीमें रहने लगे। बीच-बीचमें व्रजके अन्य स्थानोंपर चले जाते या व्रजमें भ्रमण करते, पर घूम-फिरकर वहीं आ जाते।

कुछ दिन भजन करते हो गये, तो उन्हें एक बड़ी समस्याका सामना करना पड़ा। गुरुदेवने उन्हें मधुर-भावकी उपासनाका उपदेश किया था, पर उनका हृदय उसे नहीं स्वीकार करता जान पड़ रहा था। उनकी स्वाभाविक रुचि सख्य-भावकी उपासनों थी। बहुत चेष्टा करनेपर भी वे मधुर-भावको नहीं अपना पा रहे थे। उनका सख्य-भाव दिनपर दिन और दृढ़ होता जा रहा था। चिन्ता यह थी कि गुरुदेवकी आज्ञाके विरुद्ध सख्यरसकी उपासनामें क्या उन्हें सफलता मिल सकेगी। एक दिन जब उन्हें गुरुदेवके वृन्दावन आगमनका सम्वाद मिल चुका था, वे उनसे इस समस्याका समाधान करानेके उद्देश्यसे वृन्दावन चल पड़े। वृन्दावनके निकट मार्गमें उन्हें एक कागज पड़ा दीखा। प्रभुकी प्रेरणासे उन्होंने उसे उठा लिया।

खोलकर देखा तो उसमें उनकी समस्याके उनके भावानुकूल समाधानका स्पष्ट इंगित था। उसे पढ उनका हृदय भर आया। नेत्रोंसे अश्रूधार बह निकली। उसी भाव-विभोर

अवस्थामें उन्होंने गुरुदेवके निकट अपनी स्थितिका और कागज द्वारा प्राप्त उस देवी सख्य-भावमें उनकी स्वाभाविक रुचि देख सहर्ष उस भावकी उपासनाके लिए आज्ञा इंगितका वर्णन करते हुए उनसे आवश्यक निर्देशकी प्रार्थना की। गुरुदेवने दे दी।

अपने सखा श्रीकृष्णसे मिलनेके लिए उनके प्राण छटपटाने लगे। वे हर समय तबसे दिन-प्रतिदिन उनकी भजनमें तल्लीनता बढ़ती गयी। जन्मजन्मान्तरके उसकी यादमें अश्व बहाते रहते। कब सोते, कब जागते, कोई न जानता; क्योंकि सन्ध्याकालके एक-दो घण्टेका समय छोड और किसी समय उनके पास कोई न जा पाता। कई बार लोग कौतुहलवश जब अर्धरात्रिमें उनकी कुटियापर गये, तो देखा कि वे नहीं हैं और कहीं दूर जङ्गलसे उनके श्रीकृष्ण-विरहमें रोदन करनेकी आवाज अनुसरण करते हुए जंगलमें प्रवेश किया, तो देखा कि वे अपने दोनों हाथोंसे एक आ रही है। एक बार उनके एक अनन्य भक्त श्रीरामचरणदासने उस आवाजका वृक्षकी डाल पकड़कर गद्गद कण्ठसे एक श्लोक गा रहे हैं, जिसकी प्रथम पंक्ति इस प्रकार थी-

'श्यामेन साकं गवां चारणाय मातस्तवाग्रे प्रवदामि दीनः।'

अर्थात्, हे मात यशोदा ! मैं दीन भावसे तुमसे प्रार्थना करता हूँ। मुझे श्यामसुन्दरके साथ गोचारणकी आज्ञा प्रदान करो।

इस प्रकारकी उनकी दिव्योन्मादकी अवस्था कई वर्ष रही। अन्तमें एक दिन नन्दग्राममें जब वे श्रीकृष्णचन्द्रके मन्दिरमें उनके दर्शन करते हुए उन्हें खरी-खोटी सुना रहे थे, उन्होंने देखा कि श्रीकृष्णचन्द्र अपनी दिव्य श्यामकान्ति बिखेरते हुए मन्दिरसे निकलकर बाहर आये और थोड़ी देर में वापस जाकर पुजारीसे बोले- 'जा बाबाजी मोते छेड़खानी करे है। जाकी खायबेको रोटी दै दे।

बस अब भक्त और भगवान् परस्पर छेड़छाड़ आरम्भ हो गयी। इसी समय कृष्णानन्दजीकी ग्वारिया बाबासे मैत्री हो गयी। ग्वारिया बाबा भी सख्य-भावके एक सिद्ध महात्मा थे। उस समय वे रंगजीके मन्दिरके पूर्वी फाटकके ऊपरवाले कमरेमें रहते थे। कृष्णानन्दजी भी वहाँ जाकर उनके साथ रहने लगे। दोनों सखाओंकी खूब घुटती। दोनों प्रौढावस्थाको प्राप्त होते हुए भी बालकृष्णके बाल-सखा होनेका अभिमान करते। दोनों एक अनिर्वचनीय भाव-जगत्में विचरते हुए श्रीकृष्णचन्द्रके साथ तरह-तरहके लीला रंगमें खोये रहते। एक दिन ग्वारिया बाबाने श्रीकृष्णानन्दजीसे कहा- 'नन्दबाबाने आज्ञा की है पाठशालामें पढने जानेकी

भक्तों के साथ मिलन और सत्संग

इसलिए पाठशाला जाया करो। तो चलो पाठशाला चला करें, नहीं तो बाबा मारेंगे।' उन्होंने कहा है- तुम लोग श्रीकृष्णके साथ मिलकर बहुत ऊधम करते हो। ऐनो वृन्दावनके 'प्रेम महाविद्यालय' की प्रथम कक्षामें जाकर बैठने लगे। उस समय वेदान्त-सम्बन्धी शाओंका समाधान करते थे, वे ग्वारिया बाबाके साथ अ, आ, इ, कृष्णानन्दजीका पाण्डित्य न जाने कहाँ लुप्त हो गया। जो बड़े-बड़े पण्डितोंकी वेद-पढनेमें लग गये। यह क्रम तब तक चलता रहा जब तक दोनोंकी इस भावमें स्थिति रही। विद्यालयके अध्यापक दोनों महात्माओंसे भलीभांति परिचित थे। इसलिए वे उनके इस लीलारंगमें सहयोग देते रहे।

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भाव-जगत्की लीलाएँ साधारण लोगोंके समझनेकी नहीं होतीं। वे भले ही इन्हें नाटक समझे, पर भावुक भक्तोंके लिए इसमें नाटककी गन्ध भी नहीं होती। श्रीरामकृष्ण परमहंस गोपालेर माँको देख अपने व्यक्तित्वको भूल जाते थे। वे बालसुलभ भावसे उनकी गोदीमें जा बैठते थे और उनसे खानेकी तरह-तरहकी चीजोंकी फरमाइश करने लगते थे।

प्राणगोपाल गोस्वामीने आशा की थी कि स्वामी कृष्णानन्दजी जैसे सुयोग्य शिष्य द्वारा जगत्‌में भक्तिका प्रचार होगा और अनेकों नास्तिक और अधर्मी लोगोंका उद्धार होगा। उन्हें यह देखकर चिन्ता हो गयी कि वे ग्वारिया बाबाके साथ भाव-समुद्रमें निरन्तर डूबे रहकर इस लक्ष्यसे दूर होते जा रहे हैं। उन्होंने एक दिन उन्हें अपने निकट बुलाकर आज्ञा की- 'तुम्हें प्रभुकी कृपासे जो मिला है, उसका दूसरे लोगोंमें बाँटकर उपभोग करो। जगत्में श्रीकृष्ण-भक्ति और कीर्तनका प्रचार करो।'

उन्होंने गुरुदेवकी आज्ञा का पालन करनेका निश्चय किया, पर स्वतन्त्र रूपसे प्रचार करनेमें उनके सामने एक बहुत बड़ी बाधा थी। उन्होंने सङ्कल्प कर रखा था यथासम्भव किसी स्त्रीका मुख न देखनेका। वर्षोंसे वे इस सङ्कल्पको निभाते आ रहे है। उनकी कुटियापर स्त्रियोंको आना मना था। वे जब मधुकरीको जाते, तो सिरपर कपड़ा डालकर निगाह नीची किये जाते।

एक दैवी घटनाके कारण उन्हें अपना सङ्कल्प तोडना पड़ा। घटना इस प्रकार है। हिंडौल ग्रामके निकट नगला लक्ष्मणपुरमें श्रीलालारामजीकी पुत्री श्रीमती देवा ग्यारह वर्षकी अवस्थामें विधवा हो गयी थी। वह मन-ही-मन स्वामी कृष्णानन्दजीको गुरु मानकर तन-मनसे ठाकुर सेवामें लगी रहती थी। पर गुरुजीके दर्शन न कर सकनेके कारण वह बहुत दुःखी थी। लोगोंके बहुत आग्रह करनेपर स्वामीजीने एक

कागजपर महामन्त्र लिखकर उसका जप करने और सख्य-भावसे श्रीकृष्णका चिन्तन करनेको उसे कहला भेजा। वह तद्नुसार जप और चिन्तन करने लगी। पर उसने यह प्रण कर लिया कि जब तक गुरुजीके दर्शन न होंगे, सूर्यके दर्शन नहीं करूंगी। वह प्रातः ४ बजेसे अपनी भजन कुटीमें बैठ जाती और सूर्यास्त तक भजन करती रहती। तीन वर्ष इस प्रकार बीत गये। पर गुरुदेवके दर्शन न हुए। अन्तमें उसने अन्न-जल त्याग दिया। नौ दिन हो गये बिना अन्न-जल ग्रहण किये। तब कृष्णानन्दजीको दाऊजीका दिव्य सन्देश प्राप्त हुआ, जिसके फलस्वरूप उन्हें स्त्रीका मुख न देखनेका सङ्कल्प त्यागकर उसे दर्शन देने पड़े।

थोडे ही दिनोंमें उस लडकीका सख्य-भाव सिद्ध हो गया। उसकी बोलचाल रहन-सहन सब कुछ श्रीकृष्णके सखाके समान हो गया। लोग उसे 'भैया' कहकर पुकारने लगे। श्रीकृष्ण भैयाके साथ बातें करते खेलते-कूदते और भाँतिकी लीलाएँ करते।

भैयाका पार्थिव शरीर श्रीकृष्णके दिव्य सान्निध्यको कबतक झेल सकता था। उसकी शारीरिक अवस्था दिन पर दिन शोचनीय होती गयी। अन्तमें एक दिन जब वह मूच्छित अवस्थामें गुरुदेवकी गोदमें सिर रखे लेटा हुआ था, उसने एकदम आँखें खोलकर गुरुजीकी ओर देखा और कहा- 'भैया! चलो चलें। देखो राम-कृष्णादि सखा बुलाने आये हैं। गुरुदेवने अश्रुगद्गद कण्ठसे कहा- 'भैया, तुम चलो। मैं पीछे आऊँगा।' गुरुदेवकी आज्ञा प्राप्त करते हो वह राम-कृष्णके साथ उनके दिव्य धाममें प्रवेश कर गया।

स्वामीजीने भैयासे उसका अनुगमन करनेको कहा था, पर ऐसा करनेको अभी उन्हें गुरुदेवकी आज्ञा नहीं थी। उन्हें उनकी आज्ञानुसार जगत्के कल्याणके लिए कुछ करना था। वे इस कार्यमें जुट गये। गाँव-गाँवमें जाकर कीर्तनका प्रचार किया।। अद्वैतवाद, आर्यसमाज और नास्तिक मतोंका खण्डनकर वहाँ वैष्णव-धर्मोकी जड़ सुदृढ़ की। उनके गौरकान्तियुक्त प्रभावशाली वपु, विद्या, वैराग्य और भक्ति-भावसे आकर्षित हो अनेकों लोगोंने उनका आनुगत्य स्वीकार किया। आज भी महामण्डलेश्वर श्रीरामदास शास्त्री तथा महाकवि श्रीवनमालीदास शास्त्री जैसे बहुत-से विद्वान और गणमान्य व्यक्ति उनके शिष्य हैं ।

प्रचारके उद्देश्यसे उन्होंने बहुत-से ग्रंथोंकी रचना भी की, जिनमें से कुछके नाम इस प्रकार हैं

स्वामी श्रीकृष्णनन्ददा सजी

१ वैदिक प्रमाण-पत्रिका.

२. भक्ति रत्नावली,

३. श्रीमद्भागवत-तत्त्व-

विमर्श, ४. श्रीरामकृष्ण लीलामृत, ५. अद्वैत-भेदक प्रश्नावली, ६. आर्यसमाज-मत-समीक्षा, ७. भक्ति-सिद्धान्त-विवेचन, ८. श्रीमद्भगवतगीता (

विस्तृत हिन्दी टीका

सहित)

इतना सब कर चुकनेपर उन्होंने भी अपनी पूर्वघोषणाके अनुसार सन् १९४१ की फाल्गुन कृष्ण सप्तमीके दिन रात्रिके ठीक १२ बजे 'हरेकृष्ण' उच्चारण करते हुए प्रसन्न मुद्रामें राम-कृष्णके धाममें प्रवेश किया।

गुरु और साधना — जीवन-संदेश

गुरु के प्रति श्रद्धा और साधना में निरंतरता भक्ति-परंपरा के प्रमुख विषय हैं। इस चरित्र को पढ़ते समय यह देखना उपयोगी है कि सीख और आचरण किस तरह एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

कथा का सार

स्वामी श्रीकृष्णनन्ददासजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।