ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 51

श्रीस्वामी कोकिलजी

श्रीस्वामी कोकिलजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीस्वामी कोकिलजी
श्रीस्वामी कोकिलजी — ब्रज के भक्त भाग 3

श्रीस्वामी कोकिलजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ वृन्दावन ]

भक्त कोकिलजीका आविर्भाव सम्वत् १९४२ में सिन्ध प्रान्तके जेकमाबाद जिलेके मीरपुर ग्राममें हुआ। उनकी माँका नाम था श्रीसुखदेवी, पिताका स्वामी रोचलदास। छः महीनेकी अवस्थामें माँका और छः वर्षकी अवस्थामें पिताका देहान्त हो गया। उनके जन्मके दिन ही माता-पिताने उन्हें स्वामी आत्माराम साहबकी गोदमें समर्पित कर दिया था। माता-पिताके अन्तर्धानके पश्चात् स्वामी आत्माराम ही उनके जीवनका एकमात्र आधार थे। उन्होंने ही उन्हें हिन्दी और संस्कृतकी शिक्षा दी।

दस वर्षकी अवस्थामें स्वामी आत्मारामजीका भी अन्तर्धान हो गया। उनके अन्तर्धानके पश्चात् कोकिलजीको संसारसे वैराग्य हो गया। वे अपना अधिकांश समय जंगल या श्मशानके एकान्तमें व्यतीत करने लगे। सद्‌गुरुकी प्राप्तिके लिए उनके प्राण तड़पने लगे।

किसी अज्ञात शक्तिकी प्रेरणासे वे भूकम्प पीड़ित कोट-काँगड़ामें जा पहुँचे। वहाँ सेवा-कार्यके लिए आये हुए बहुत-से सत्पुरुषों और स्वयंसेवकोंके शिविर लगे थे। एक शिविरके पास उन्हें एक आश्चर्यमय प्रकाशका अनुभव हुआ। अनुभवके साथ ही हृदयमें स्फूर्ति हुई कि वे जिन सद्‌गुरुकी खोजमें हैं, वे यहीं हैं।

शिविर सन्त शिरोमणि स्वामी श्रीअविनाशचन्द्रजी महाराजका था, जो बँगालसे भूकम्प पीड़ितोंकी सहायताके लिए आये हुए थे। भक्त कोकिल उनके शिविरके द्वारपर बैठकर गीता-पाठ करने लगे। उनकी इनपर दृष्टि पड़ी। उन्होंने इनके मस्तकपर अवध सरकारकी भक्ति झलकती देखी। भीतर बुलाकर अयाचित रूपसे उन्होंने इनपर अपने स्नेहकी वृष्टि की। ये भी अपना तन-मन सदाके लिए उनके चरणोंमें समर्पितकर निश्चिन्त हुए।

कोकिलजी स्वामी अविनाशचन्द्रजीके साथ रहकर उनकी सेवामें तन्मय रहने लगे। वे उनकी चरण-सेवा करते, शरीरमें तेल-मालिश करते, उन्हें स्नान कराते, उनके कपड़े धोते और उनका जो भी कार्य होता, उनके और बहुत-से सेवकोंके होते हुए भी, स्वयं करते। अविनाशजी बीच-बीचमें ध्यानस्थ हो भगवान्‌की मधुर लीलाओंका दर्शन करते। उस समय ये उनके पास खड़े रहकर उन्हें पंखा झलते।

गुरु-सेवाका फल तत्काल मिलता है। एक दिन ऐसे ही अवसरपर एक दिम रूपका अनुभव हुआ। उन्होंने देखा कि वाल्मीकि मुनिके आश्रममें जगज्जनने सीताजी प्रियतमके विरहमें व्याकुल हो रही हैं। उनके रोम-रोमसे 'श्रीराम-श्रीराम' अनाहत ध्वनिके साथ विरह-बोधक साम ऋचाएँ निकल रही हैं। वे हृदयेश्वरका

स्मरणकर बार-बार वाताहत लताके समान मूर्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़ती है। बार-बार कोकिलें तापस-कुमारियोंके सुरमें सुर मिलाते हुए 'श्रीराम-श्रीराम उच्चारण कर उन्हें सचेत करती हैं।

इस झाँकीके दर्शनकर कोकिलजी स्वयं मूच्छित हो गये। गुरुदेवके प्रयाससे वे बाह्य दशाको प्राप्त हुए। उन्होंने उन्हें धैर्य धारण कराया और कहा-'अब तुम इसी भावनाको धारण करो।'

कोकिलजी गुरुदेवके साथ कुछ दिन कोटकांगडामें रहकर उनके साथ लाहौर चले गये। इस प्रकार आठ महीने कोकिलजीको अपने सत्संगसे लाभान्वितकर स्वामी अविनाशचन्द्रजी बँगाल चले गये। कोकिलजी भी मेहड़ ग्राम चले गये। वहाँ रात्रिमें स्वामी आत्माराजीने स्वप्नमें उनसे कहा- 'मीरपुरके दरबारके महन्थ स्वामी ज्ञानदासजीका शरीर पूर्ण हो गया है। तुम जाकर दरबारकी सेवाका भार सँभालो।' मीरपुरके लोगोंने भी आकर उनसे दरबारकी सेवाका भार ग्रहण करनेका आग्रह किया। कोकिलजीने कहा- 'मेरे भजन, एकान्तवास, त्याग, और वैराग्यमें किसी प्रकार व्याघात न पहुँचे। ऐसी कुछ व्यवस्था हो तभी मैं दरबार साहबकी सेवाका भार ले सकता हूँ।' इसे सबने सहर्ष स्वीकार किया। कोकिलजीने मीरपुर जाकर दरबार साहबकी महन्थी सँभाल ली।

महन्थजी दिन-रात भजन, स्मरण, कीर्तनादिमें लवलीन रहकर दरबारके ऊपरके मंजिलमें एकान्तवास करते। नीचे कभी न उतरते। फिर भी दरबारका काम सुचारु रूपसे चलता रहता।

एक दिन स्वप्नमें सद्‌गुरु श्रीअविनाशचन्द्रजीने आज्ञा की- 'जहाँ तुम प्रतिदिन स्नान करते हो, वहाँ बेरके नीचे खोदनेसे तुम्हें अभीष्टकी प्राप्ति होगी। कोकिलजीने बड़े उल्लाससे उस स्थानको खोदा, तो एक सोनेकी डिबिया निकली। उसमें एक विलक्षण भोजपत्रपर श्रीजनकनन्दिनी सीताजीकी सुन्दर मूर्ति अंकित थी। उसके दर्शनकर उनका रोम-रोम पुलकित हो गया। वे एक छोटी-सी कुटियामें छोटे-से पालनेमें उन्हें विराजमान कर हौले-हौले झोंटे दिया करते।

श्रीस्वामिनीजीको इस रूपमें पाकर कोकिलजीकी उत्कण्ठा और बढ़ गयी। वे कभी 'हा स्वामिनी ! हा श्रीजानकी !!' पुकारते-पुकारते हो भूमिपर लोट जाते, स्वामिनी उनकी सेवासे प्रसन्न हो उसके बदले स्वयं उन्हें प्रेमके पालनेमें संयोग और कभी स्फतिमें इनके दर्शनकर नाचते-गाते, हँसते और उनकी ओर दौढ़ पड़ते, जैसे वियोगके झोंटे देकर झुला रहीं हों।

इसी समय अपनी विरह-व्यथा शान्त करनेके लिए कोकिलजीने विदेहपुरीकी यात्रा की। वे जनकपुरी और सीतामढीमें एक मास रहे। सीतामढ़ीमें एक दिन मन्दिर में दर्शन करते समय उन्हें एक दिव्य अनुभव हुआ। उन्होंने देखा कि माता सुनयनाजी अपनी ललित-लडैती पुत्रीको गोदमें लिए जनकजीके साथ यज्ञ-भूमिसे लौट रही हैं। वे सद्योजात भूनन्दिनीको गोदमें इस प्रकार छिपाये हैं कि किसीकी नजर उनपर न पडे । श्रीकोकिलजी सहचरीरूपमें एक ओर चुपचाप खडे हैं। उन्होंन पार्थना की एक झलक अपनी लाडलीको दिखाने की, पर सुनयनाजीने सुनी अनसुनी कर दी। तब कोकिल सहचरी अञ्जलिमें पुष्प लेकर कोकिल स्वरमें प्रार्थना-गीत गाने लगी। संगीतमय प्रार्थनामें उसकी तन्मयता, रोमांच, स्वरभग और वैवण्यादि देख सब मुग्ध हो गये।

महाराज विदेहने उसी समय सुनयना माँको आदेश दिया कि उसे लाडलीके दर्शन करा दें। सुनयना मैयाने प्रसन्नतापूर्वक लालीको कोकिल सहचरीकी गोदमें देते हुए कहा - 'लालीको सम्हाल कर रखना। इसके मृदुल अङ्गयर किसीकी दृष्टि न पड़े।'

विदेहपुरीसे लौटकर कोकिलजी दरबार में दैनिक सत्संगमें भाग लेने लगे। वे जयदेव, श्रीरूप-सनातन और श्रीनरसी मेहता आदि भक्तोंके चरित्रका वर्णन करते-करते स्वयं भाव विभोर हो जाते और श्रोताओंको भी भाव-विभोर कर देते।

पर कथा-कीर्तन, लीला-स्मरण और मानसी सेवामें रत रहते हुए भी कोकिलजी योगवाशिष्ठादि वेदान्त ग्रन्थोंका स्वाध्याय करते। उन्होंने पञ्चदशी आदि कुछ वेदान्त ग्रन्थोंको हिन्दीमें लिखा और लिखवाया। इससे स्पष्ट है कि उनकी भक्ति अभी ज्ञान-मिश्रित भक्ति ही थी। धीरे-धीरे वह शुद्धा-भक्तिका रूप लेने लगी।

वे वृन्दावन जाया करते और राधारानीसे प्रार्थना किया करते- 'हे शशिमुखी स्वामिनी राधे! कृपा करो, कृपा करो। श्रीस्वामिनी जनकनन्दिनी, अवधेश्वरीके चरण-कमलोंमें मेरी अचला, अनन्या भक्ति हो। मैं उनकी सहचरी टहलनीके रूपमें उनकी सेवामें अहर्निश रत रहकर अपने कोटि-कोटि प्राणोंको उनके ऊपर न्यौछावर करती रहूँ।'

राधारानीकी कृपासे और वृन्दावनके साधुजनीके सत्संगसे उनकी जनकनन्दिनीमें प्रीति निरन्तर बढ़ती गयी और ज्ञान-चर्चासे वे दूर होते गये।

एक बार उन्होंने हरिद्वारकी यात्रा की। उनके साथ उनके मित्र थलेके महात्मा श्रीटहेल्यारामजी साहब भी थे। टहेल्यारामजीने कहा- 'स्वामीजी, हरिद्वार तीर्थस्थान है। तीर्थस्थानमें आकर सब लोग कुछ-न-कुछ छोड दिया करते हैं। हम भी यहाँ कुछ छोड़ दें।'

स्वामीजीने कहा - 'पहले तुम छोड़ो। पीछे हम छोड़ेंगे।'

टहेल्यारामजी बोले- 'मैं झूठ छोड़ता हूँ। आजसे झूठ कभी नहीं बोलूंगा

।' स्वामीजीने कहा- 'मैं अद्वैतवाद छोडता हूँ। आज पीछे ज्ञान-चर्चा कभी नहीं करूंगा।'

इसके बाद एक बार गिदबन्दरके सिद्ध ज्ञानी महात्मा श्रीहरिदास रामजीने भक्ति-उपासनाको ज्ञानसे हेय बताते हुए उनसे कहा- 'सगुण उपासक भी तो अन्तमें ब्रह्मानन्दमें ही स्थित होते हैं। उपासनाके बाद ज्ञान है। वेदने भी प्रभुके निराकार रूपका ही वर्णन किया है।'

परीक्षा, धैर्य और वैराग्य का प्रसंग

कोकिलजीने उत्तर दिया- 'वेद तो भगवान्‌के श्वाससे प्रकट हुए हैं। इससे तो ईश्वरके सगुण साकार रूपका ही प्रतिपादन होता है। जो वर्णन किया जायगा, वह निर्गुण-निराकार रूपका कैसा होगा ? बिना नाम, जाति, गुण और क्रियाके वेद भी किसीका निरूपण नहीं कर सकते। वेद जो निराकार-निराकार कहते हैं, वह तो ईश्वरके एक गुण व्यापकताका वर्णन है। वह व्यापकता रूप धर्म-धर्मी ईश्वरके बिना कहाँ टिकेगा ?'

कोकिल स्वामी गुरुदेवके आदेशसे बाल्मीक आश्रममें सहचरी रूपसे जनकनन्दिनीकी मानसी-सेवा करते। जनकनन्दिनीकी विरह-व्यथा देख-देख उनमें एक नये भावका उदय हुआ। उनकी व्यथाको हल्का करनेके लिए उन्होंने उनका सन्देश रामके पास और रामका उनके पास लाने-ले जानेका संकल्प किया। तभी उनका भावमय सहचरी-देह कोकिलके रूपमें परिवर्तित हो गया। कोकिल रूपमें वे कभी अयोध्यामें जाकर श्रीरामजीसे जनकनन्दिनीके प्रेम, विरह-विलाप और उनके प्रति उनकी शुभाकांक्षाका वर्णन करते, कभी बाल्मीकिजीके आश्रममें जनकनन्दिनीको रामजीका सन्देश सुनाते और कभी उनके दुःखमें दुःखी हो रामजीको उपालम्भ भरे इस प्रकारके शब्द सुनाते -

'हे कौशलेश्वर ! आपका हृदय तो अत्यन्त कोमल है। फिर भी उस निरपराध सती शिरोमणिको वनमें अकेली छोडते आपके हृदयमें पीडा क्यों नहीं हुई ? उसने आपके प्रेममें संसारके सुखोंको ठुकराकर आपके साथ वनमें भ्रमण किया। कठोर-से-कठोर दुःख सहन किये। वनमें चलते-चलते वे थक जातीं, उनके कमलसे भी कोमल चरणोंमें कॉटे, चुभ जाते, भूख-प्याससे मुख कुम्हला जाता। फिर भी वे आपकी ओर देखकर मुस्कुरा देतीं। कहीं आपको उनके कष्टका भान न हो जाय। उन्होंने आपको सुखी करनेके लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। पर, आप

उनके लिए अपनी कीर्ति भी न छोड सके। अपनी निन्दा सुनते ही उन्हें त्याग दिया। 'हे महाराज! दण्डकवनमें उनके विरहमें 'हा सीते! हा जानकी कहकर आपने कितना रुदन किया था। क्या वह एक नाटक था ?

राजाधिराज ! आपको याद नहीं उस दिनकी बात, जब आप वनसे लौटक राजसिंहासनपर आसीन हए थे ? उस समय आपने सियाजीसे कहा था- 'प्रिय! मुझे तो राजमहलकी चकाचौंध और राजदरबारके दायित्वपूर्ण कृत्रिम जीवनसे वित्रकूटके वे दिन अच्छे लगते थे, जब हमारा क्षणभरके लिए भी वियोग नहीं होता था और हम नित्य नये-नये राग-रंगके झूलोंपर स्वतन्त्रतापूर्वक झूला करते। स्मरण करो उस दिनकी बात जब हम-तुम चित्रकूटकी पर्णकुटीमें पुष्पशैय्यापर शयन कर रहे थे। तुम एक हाथसे मेरे गलबहियाँ डाले हुए थीं और तुम्हारा दूसरा हाथ तुम्हारे हृदयपर था। पूछनेपर तुमने कहा था- 'मैं एक हाथसे तुम्हें बाहर पकड़े हूँ और दूसरेसे भीतर, जिससे नींद आनेपर तुम निकल न जाओ।

तुम्हारी काव्यमयी युक्ति सुन मैं खिलखिलाकर हँस पड़ा था और मैने कहा था- 'तुम्हें छोड़कर मैं जा ही कहाँ सकता हूँ प्रिये ! क्या त्रिभुवनमें कोई ऐसा स्थान है, जहाँ मुझे तुम न दीखती हो ?

'मेरे स्वामी, क्या यह भी आपका दिखावा ही था ? सियाजीका प्रेम आपके प्रति आज भी वैसा ही है। आज भी वे इस देशसे जानेवाले पक्षीसे आपका कुशल पूछती हैं। इस देशसे जानेवाली वायुके आलिंगनको आपका आलिंगन समझकर रोमाञ्चित होती हैं। इधरसे जानेवाले बादलोंको देख-देख आत्म-विस्मृत होती हैं। आज भी वे वही वस्त्र धारण करती हैं, जिनका आपने कभी स्पर्श किया था। वही शब्द गुनगुनाती रहती है. जिनका प्रणयमें आपने कभी प्रयोग किया था। उन्हीं प्रणय-लीलाओंका चिन्तनकर निरन्तर अश्व बहाती हैं, जो उनके और आपके बीच कभी घटी थीं।

'उनकी वियोग-दशाको देख पशु-पक्षी भी रुदन करते हैं, पाषाण भी द्रवित होते हैं। फिर आप इतने कोमल होते हुए भी उनके प्रति क्यों इतना निष्ठुर हैं?'

'क्या अब भी प्रजाकी निन्दाका आपको भय है ? हाय! मैं क्या करूँ, जिससे स्वामिनीका दुःख दूर हो ? कौन-सा व्रत करूँ, कौन-सा तप करूँ, जिससे सरस्वती बनकर प्रजाकी जिह्वापर बैठ जाऊँ और परमपावनी सती शिरोमणि स्वामिनीका गुणगान करूँ ?'

यह कहते-कहते कोकिलजी भावावेशमें मुर्छित हो जाते। उनकी यह अवस्था १७ वर्ष तक बनी रही। इस अवस्थामें उन्हें खाने-पीनेकी भी सुध न रहती। भोजनकी थाली सामने रखी रहती। भोजनके पहले ही आँसुओंकी झड़ी आचमन करा देती। कोई सेवक मुखमें ग्रास दे देता, तो वह पूर्वाभ्यासवश गलेके नीचे उतर जाता। उन्हें उसे ग्रहण करनेका पता भी न चलता। उनकी अश्रुधार बहती रहती और 'सिया-अम्बा', सिया-अम्बा' की रट बराबर लगी रहती।

आखिर एक दिन उन्हें महाराज श्रीरामचन्द्रके साथ अवधेश्वरी श्रीसीताजीके दिव्य दर्शन हुए। उन्होंने देखा कि दिव्य कल्पवृक्षके नीचे रत्नमण्डपमें मणिमय वेदिकापर युगल सरकार विराजमान हैं और कह रहे हैं- 'कोकिले, तुम क्यों इतना दुःखी हो रही हो ? हम दोनों सदा ही साथ हैं। वियोगकी बाह्य लीला तो केवल प्रजा रञ्जनका आदर्श दिखानेके लिए है।'

कोकिलजीकी व्यथा कुछ शान्त हुई। वे कभी-कभी अवध जाया करते। एक बार फिर उन्होंने अवधकी यात्रा की। अवधसे लौटकर वे वृन्दावन गये और स्थायी रूपसे वहीं रहने लगे।

राम-जानकीके उपासक होते हुए भी उन्होंने वृन्दावनमें रहना क्यों पसन्द किया ? बात यह थी कि उनके हृदयपर जानकीजीके द्वितीय वनवासकी गहरी छाप थी। अयोध्यामें प्रवेश करते ही उनका वह घाव हरा हो जाता था। वे सोचने लगते थे कि इसी अयोध्याकी प्रजाने श्रीस्वामिनीजीको अपवाद लगाया था, जिसके कारण उन्हें वनवासका दुःख भोगना पड़ा था। वे कनक-भवनमें दर्शन करते जाते, तो उन्हें ऐसा जान पड़ता कि महाराज श्रीरामचन्द्रके पास श्रीजनकनन्दिनीकी स्वर्ण-प्रतिमा विराजमान है। यह जान वे दुःखी हृदयसे एक कोनेमें बैठ जाते। वे बार-बार कराह उठते- 'आह ! इस अयोध्यामें क्या है, जब मेरी क्षमामूर्ति स्नेहमयी परमपावनी श्रीस्वामिनीजी ही यहाँ नहीं हैं ?

भक्त कोकिल भक्तोंके आग्रहसे ही अयोध्या जाया करते और वह ब मर्यादा प्रिय राज-राजेश्वर हैं। उनके तेज प्रतापसे त्रिभुवन भयभीत रहकर मर्यादामें संकोचसे रहते। वे सोचते कि रविकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजी महाराज बड़े न्याय और चल रहा है। कहीं उनकी राजधानीमें कोई भूल न हो जाय।

वे कहा करते- 'श्रीअयोध्या ऐश्वर्य भूमि है, वज माधुर्य-भूमि है। वहाँ धर्म हे मर्यादा है। यहाँ रस है, राग है। वहाँ यशकी प्रधानता है, यहाँ अपयश की। वहाँ भगवान् कर लेते हैं. यहाँ चोरी करते हैं। वहाँ भगवान् दाता हैं, यहाँ ग्रहोता है।'

वृन्दावनमें कोकिलजीने श्रीसीतारामके विश्राम और विहारके लिए अहीर पाड़ाके 'शुकभवन' से लगे हुए स्थानमें 'श्रीसुखनिवास' नामकी एक कुटिया और छोटी-सी फूलवारी बना ली। 'श्रीसुखनिवास' नामसे कोकिलजीको भावना थी कि सुख-स्वरूप श्रीयुगलकिशोर यहाँ सुखसे निवास करते हैं। यहाँ सोनेकी डिबियामें निकली भोजपत्रपर अङ्कित्त जानकीजीकी वह मूर्ति भी विद्यमान है, जो स्वप्नादेशके उपरान्त भूमि खोदनेपर उन्हें मीरपुरमें प्राप्त हुई थी। श्रीस्वामी कोकिलजीका एक विलक्षण चरण-चिह्न भी यहाँ सुरक्षित है। यह चिह्न सीमेण्टके फर्शक मोमकी तरह पिघल जानेपर उस समय पड़ा था, जब गुरुदेवकी चौपाइ‌योंका गान करते-करते उनकी विरहाग्नि धधक उठी थी। सुखनिवासको स्थापना हुई, तभीसे यह सिन्धी भक्तोंके कथा-कीर्तन और सत्संगका केन्द्र बन गया।

कोकिलजीकी रहनी-सहनी वृन्दावनके साधु-महात्माओंसे पृथक् थी। वे एक गृहस्थ सेठके वेशमें रहते, जिससे उन्हें कोई महात्मा जानकर दण्डवत् न करे। वे चरण किसीको भी स्पर्श न करने देते। कभी उनकी कोई पारमार्थिक हानि होती, या वे अस्वस्थ हो जाते, तो कहते- किसीने जरूर मेरे साथ दगा की है', अर्थात् मेरी चरण-धूलि ली है।

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

वे बड़े दयालु और अदोषदर्शी था। दूसरोंका दोष भी अपने ऊपर लेकर उसका निराकरण करनेकी चिन्ता करते थे। एक बार जब वे अवधसे बरसाने जा रहे थे, उन्हें कानपुर में रुकना था। एक महन्तजीने कहा-'कानपुर में आपके रुकनेका कोई स्थान नहीं है। मैं अपने एक मित्रको लिखे देता हूँ। आप उनके यहाँ ठहर जाइयेगा।' उनका पत्र लेकर वे कानपुर गये। एक सेवकको पत्र देकर उन सज्जनके घर भेज दिया। स्वयं कुछ दूरीपर सामान लेकर बैठे रहे। उन्होंने पत्र देखकर कहा- 'मैं कुछ नहीं कर सकता। स्वामीजीसे मिलने भी न आये। सेवकको बहुत बुरा लगा। स्वामीजीने उसे समझाते हुए कहा- 'शहरोंमें वैसे ही

जगहकी कमी होती है। आज उनके घर कोई और विवशता भी हो सकती है। दोष उनका नहीं, हमारा ही है। हमारे कारण उन्हें इतना उद्वेग हुआ। अब तुम उनके घर जाकर एक लोटा जल माँग लाओ। उसे पीकर चलें, जिससे अतिथि सत्कार न करनेका दोष उन्हें न लगे।

वे सत्संगके बडे प्रेमी थे। वृन्दावनके प्रायः सभी महात्माओंके दर्शन करते और उनसे अपनी स्वामिनी जनकनन्दिनीके लिए आशीर्वाद माँगते । स्वयं भी उन्हें सदा आशीर्वाद देते रहते। उनसे कुछ माँगनेका तो उनके लिए कोई प्रश्न ही नहीं था। वे कहा करते - 'प्रियतमसे उनकी कृपा-प्रसादी भी माँगना उचित नहीं था। वे तो सहज स्वरूप हैं। वे अपने सुख-प्रवाहमें, लीलारसास्वादनमें डूबे रहें यही ठीक है। मेरी ओर नजर उठाकर देखनेका भी कष्ट क्यों करें ?'

जनकनन्दिनीमें उनका मधुर भाव अद्वितीय था। वे कहा करते थे- 'ऐश्वर्य माधुर्यके आधीन है। कृष्णने वात्सल्यमयी मैयाको अपना ऐश्वर्य दिखाया कि मैं विश्व रूप हूँ, तेरी रस्सीसे नहीं बँध सकता, तो बाँध गये। माँने ईश्वरताको ऊखलसे बाँध दिया। श्रीकृष्णने भी मैयाके पूर्णभावके सामने अपनी अपूर्णता दिखानेको उनका बन्धन स्वीकार किया।'

'जनकनन्दिनीमें उनकी एकनिष्ठता भी अनुकरणीय थी। राधारानीके धाममें रहते हुए भी वे उनसे यही प्रार्थना किया करते कि वे ऐसी कृपा करें, जिससे जनकनन्दिनीमें उनकी रति-मति बनी रहे और जनकनन्दिनी सदा सुखी रहें। इष्टमें एकनिष्टताका उन्होंने एक बार बड़ा सुन्दर और मनोरंजक दृष्टान्त दिया था-

एक बुढ़ियाको सद्‌गुरुने बाल-गोपालकी मूर्ति देखकर कहा- 'इसे अपना बच्चा समझ प्यारसे इसका लालन-पालन करती रहना।' बुढ़िया ऐसा ही करने लगी। एक दिन गाँवके बालकोंने उससे हँसी की। कहा- 'मैया, यहाँ एक भेड़िया आ गया है, जो बच्चोंको उठा ले जाता है।' उसने बाल-गोपालको कुटियामें विराजमान किया और स्वयं लठिया लेकर दरवाजेपर बैठ गयी। पाँच दिन, पाँच रात पहरा देती रही। उस भोली-भाली मैयाका यह भाव देख प्रभुको उसका प्रत्यक्ष रूपसे आस्वादन करनेका लोभ हो आया। वे सुन्दर रूप धारण कर, वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित हो उसके पास आये। पाँवकी आहट पाकर मैया डरी कि कहीं भेड़िया तो नहीं आ गया। उसने लाठी उठायी। श्यामसुन्दरने कहा- 'मैया! मैं वही बालक हूँ, जिसकी तुम रक्षा करती हो।

माई ने कहा- 'क्या ? तेरे जैसे सैकडों चमकने उसपर न्यौछावर कर दूँ। अब ऐसे मत कहियो।'

प्रभु प्रसन्न हो बोले- 'अरी मैया, मैं त्रिलोकीनाथ भगवान् हूँ। मुझसे जो चाहे कर माँग ले।'

तब बुढ़ियाने कहा- 'अच्छा! तो मैं आपको सौ-सौ प्रणाम् करती हैं। कृपाकर मुझे यह वर दीजिये कि मेरे प्राण प्यारे लालको भेडिया न ले जाय।'

प्रभु और भी प्रसन्न हुए और बोले- 'तो चल मैं तेरे लालको और तुझे अपने धामको लिए चलता हूँ। वहाँ भेडियेका कोई भय नहीं है।'

स्वामी कोकिलजीके सत्संगमें लोगोंको बहुत सुख मिलता। साध्य और साधनके सम्बन्धमें वे हँसते और हँसाते हए कभी-कभी अपनी सहज भाषामें बड़ी मार्मिक बातें कह जाते, जो साधकोंके लिए बड़ी उपयोगी होती।'

किसीने पूछा- 'जीवकी पुकार ईश्वर तक कैसे पहुँचे ?'

उन्होंने उत्तर दिया - 'ईश्वरके टेलीफोनका नम्बर निरहंकारता है। उनका उलीफोन उनकी ओरसे सदा जुड़ा रहता है। इंगेज्ड कभी नहीं रहता। इधरसे ही जोडनेकी जरूरत होती है। अहंकार छोड़कर ऊँचे स्वरसे उनके नाम-गुण लीलाका कीर्तन करते हुए उन्हें पुकारे, तो पुकार उन तक पहुँच जाती है।'

किसीने पूछा- 'साधनामें उत्साह कैसे हो ?'

उन्होंने कहा- 'साधनाको छोटी वस्तु मत समझो। साधन ही मंजिल है। इसे रास्ता समझोगे तो मंजिल दूर जानकर मन आलसी हो जायेगा। मंजिल समझोगे तो मनको उत्साह होगा। और भैया, मंजिलपर पहुँचकर करोगे भी क्या ? वहाँ भी तो यहीं करना है।'

एक भक्तने पूछा- 'भक्तिमें सूक्ष्म विघ्न क्या है ?'

उन्होंने कहा- 'अपनी भक्तिको जाहिर करनेकी सूक्ष्म इच्छा। वह साधनको सिद्ध नहीं होने देती। जैसे अन्धी आटा पीसती जाय, कुतिया खाती जाय, वैसे ही इच्छा कूकरी साधनका आटा खा जाती है।'

एक बार किसीने वृन्दावनकी महिमा प्रकट करते हुए कहा- 'रसिक सन्त कहते हैं कि दूसरे देशमें भजन करना और वृन्दावनमें सोना समान है।'

इसपर स्वामीजीने कहा- 'रसिकोंके यह वचन धामकी महिमाके द्योतक अवश्य हैं पर इनका सहारा लेकर आलसी नहीं होना चाहिये। इनका आशय यह

ग्रहण करना चाहिये कि जहाँ सोना भी भजनके समान है वहाँका भजन कितना महत्त्वपूर्ण होगा।'

नाम-जपके सम्बन्धमें एक बार उन्होंने कहा- 'नाम जपके समय धाम-रूप-लीला और सेवाका चिन्तन होनेसे सच्चे भगवद्-रसका उदय होता है। नाम-जपमे लीलारसका अनुभव न हो तो बीच-बीचमें लीलाके पद गा-गाकर लीलाका भाव जाग्रत करना चाहिये।

एक बार पराभक्तिके सम्बन्धमें पूछे जानेपर उन्होंने कहा- 'यह स्थितिको प्राप्तकर लेता है. वह सदा एक अनिर्वचनीय आनंदमें डूबा रहता है। जो अनुभव-स्वरूप है। इसके सम्बन्धमें कुछ कहते-सुनते नहीं बनता। जो इस लोग उसके पास होते हैं. उन्हें भी आनन्दका अनुभव होता है। इस स्थितिमें सुख-दुःख, सोना-जागना, मरना जीना एक समान होता है। प्रियतमकी मधुर स्मृतिसे मन, प्राण और अन्तःकरण इतने भरे रहते हैं कि सुख-दुःखादिकी जानकारी रखनेका उसे अवकाश ही नहीं होता।'

हम पहले कह चुके हैं कि भक्त कोकिलजी अपने इष्टसे कभी कोई प्रार्थना न करते। उनके आगे मस्तक भी न झुकाते। केवल उन्हें आशीर्वाद देते। वे कहते कि उनके आगे सिर झुकानेसे उनपर अपना भार पड़ता है। उन्हें जो प्रार्थना या चीख-पुकार करनी होती, वे राधारानीके दरबारमें करते।

वे पद रचना भी किया करते। उनके प्रार्थना-पद राधारानीके प्रति प्रार्थनाके हुआ करते। जबसे वे वृन्दावनमें रहने लगे, उनके प्रार्थना-पदोंका भाव इस प्रकारका हुआ करता -

'राधे, करुणामयी, कोकिलापर अपनी करुणा-दृष्टि बनाये रखना। तुम्हारे चरणोंका सहारा ले यह तुम्हारे घामेमें पड़ी है। यदि कभी अपनी प्राणेश्वरी श्रीजनकनन्दिनीके प्रेमोन्मादमें अचेत हो भूमिपर गिर पड़े, तो उनकी जन्म-भूमिकी मंजुल वृक्षावलीमें इसे पहुँचा देना। उनका स्पर्श पाते ही यह सचेत हो जायेगी। उनके झुरमुटमें बैठकर प्राणेश्वरीकी रूप माधुरीका पान किया करेगी और पञ्चम स्वरसे उनका गुणगान कर उनका मनोरंजन किया करेगी।'

संवत् २००४ का श्रावण पुरुषोत्तम मास था और शुक्ल पक्षकी द्वितीया तिथि। सदाकी भाँति सन्ध्या समय सुख-निवासमें सत्संग चल रहा था। श्रीराम-जानकीके बनवासका करुण-प्रसंग था। गंगा पार होनेके लिए वे नौकापर सवार हुए और कोकिलजीने कथा समाप्त की।

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

श्रीस्वामी कोकिलजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।