ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 53

भक्तप्रवर श्रीराधिकादासजी महाराज

भक्तप्रवर श्रीराधिकादासजी महाराज की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

भक्तप्रवर श्रीराधिकादासजी महाराज
भक्तप्रवर श्रीराधिकादासजी महाराज — ब्रज के भक्त भाग 3

भक्तप्रवर श्रीराधिकादासजी महाराज का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ वृन्दावन ]

महात्मा श्रीराधिकादासजी महाराज (पण्डित श्रीरामप्रसादजी) का जन्म राजस्थान प्रान्तके झुंझुनू जिलेके अन्तर्गत चिड़ावा नगर में सम्वत् १९३३, माघ कृष्णपक्ष अष्टमीको चिडावाके उच्च कुलीन ब्राह्मण पण्डित लक्ष्मीरामजीमिश्रकी दूसरी पत्नीके गर्भसे हुआ। प्रसव-कालमें ही इनकी माताका स्वर्गवास हो गया। पण्डित लक्ष्मीरामजीने तीसरा विवाह कर लिया, जिससे उनके तीन पुत्र हुए। इस कारण राधिकादासजी प्रारम्भिक जीवनसे ही परिवारमें उपेक्षित रहे। पर, अपनी प्रतिभा, पराक्रम और जन्मजात भक्ति-संस्कारोंके कारण वे एक महान पण्डित और आदर्श भक्तके रूपमें विख्यात हुए।

अल्पावस्थामें ही वे न्याय, व्याकरण और ज्योतिष आदिमें व्युत्पन्न हो गये। न्याय और व्याकरणकी शिक्षा उन्होंने पण्डित स्नेहीरामजीसे ज्योतिषकी श्रीरूड़मलजी पुजारीसे और पुराणादिकी प्रसिद्ध पौराणिक विद्वान श्रीरामेश्वर मिश्रजीसे प्राप्त की।

विवाहयोग्य होनेपर उनका विवाह मलसीसरके खेड़वाल जोशी परिवारमें हो गया। वृन्दावनमें रामगढ़के सेठोंकी पाठशालामें पढ़ानेके लिए नियुक्ति भी हो गयी। सदासे अपने परिवारसे उपेक्षित राधिकादासजीको अब स्वतन्त्र रूपसे अपनी नैसर्गिक प्रवृत्तिके अनुसार जीवन-यापन करनेका अवसर मिला। बीजरूपमें भक्तिके संस्कारोंको लेकर तो वे जन्में थी ही। वृन्दावनके अनुकूल वातावरणमें उस बीजको अंकुरित, पुष्पित और पल्लवित होनेमें देर न लगी। उन दिनों बरसानेके श्रीरणछोड़दासजी महाराज निम्बार्क सम्प्रदायके एक सिद्ध सन्त थे। उनसे दीक्षा लेकर वे अध्यापनका कार्य करते हुए भजन-साधनमें जुट गये।

पुत्र न होनेके कारण उनकी पत्नी उदास रहने लगीं। एक दिन श्रीरणछोड़दासजीसे उन्होंने पुत्र-प्राप्तिकी इच्छा प्रकट की। उन्होंने एक प्रसादी पान दिया और मनोरथ-पूर्तिका आशीर्वाद। पान खाकर उसका एक अंश पत्नीने थूक दिया। इसपर राधिकादासजीने झिड़ककर कहा- 'तुमने प्रसादका अपमान किया।

यह ठीक नहीं किया।' कहते हैं कि इसी अपराधके कारण उनके पुत्र श्रीनन्दकिशोरजीकी वाणीमें दोष आ गया।

और अपने शिक्षागुरु श्रीस्नेहीरामजीकी आज्ञाको न टाल सकनेके कारण चिड़ावा कुछ दिन बाद राधिकादासजी स्वर्गीय सेठ श्रीरंगलालजी सेक्सरियाका आग्रह जाकर सेक्सरिया सेठोंके एक मकान श्री शिवनाथरायजीकी हवेलीमें एक संस्कृत पाठशाला चलाने लगे। पर वृन्दावन उनके हृदयमें ऐसा बस गया था कि उससे सम्बन्ध न तोड सके। वे वृन्दावन बराबर जाते रहते। श्रावण और फाल्गुनमें तो उनका वृन्दावन जाना निश्चित ही रहता।

चिड़ावामें रहते हुए भी मानसिक रूपसे वे वृन्दावनमें ही रहते। अध्यापनका कुछ समय छोड़कर उनका सारा समय वृन्दावनके रासबिहारीकी लीलाओंके चिन्तनमें ही व्यतीत होता। उनकी दिनचर्चा उच्चकोटिके विरक्त वैष्णवों जैसी थी। वे रात्रिके लगभग २ बजे उठ जाते। हाथ-पैर धो भजनमें बैठ जाते। प्रातःकाल दस बजे उठकर शौचादिसे निवृत हो फिर भजनमें बैठ जाते। एक विद्यार्थी तीन बजे तक रसोई बना और उनके गोपालजीको भोग लगा प्रसाद तैयारकर रखता। उस समय वे भजनसे उठकर प्रसाद ग्रहण करते। उसी समय अपना मौन तोड़ते। भजनके बीच यदि कोई विशेष कार्य होता तो लिखकर या संस्कृत भाषामें बोलकर उसका सम्पादन करते।

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

गर्मकि दिनोंमें वे पाठशालाके सामने तिवारीमें उत्तराभिमुख हो भजन करने बैठते, तो इतना तन्मय हो जाते कि गर्मीका उन्हें कुछ भी भान न होता। पसीनेसे जमीन तर हो जाती तो थोड़ा आगे सरक जाते। इस तरह सरकते-सरकते तिवारीकी लगभग तीस फुटकी लम्बाई पार कर जाते।

सन्ध्या समय वे अपनी पाठशालमें हरि-संकीर्तन करते, रात्रिमें मेड़ोंके मन्दिरमें सेठ श्रीरामकृष्णजी डालमियाकी रामनामवली हबेलीमें डालमियाजी द्वारा आयोजित कीर्तन हुआ करता। उसमें भी वे सम्लित होते। हरि-कीर्तन जहाँ भी होता उसमें वे भाग अवश्य लेते। रास लीला या राम लीलाके आयोजनोंमें भी अवश्य जाते। पर वहाँ बैठते कभी नहीं। जब तक लीला चलती रहती स्वरूपोंकी टहलमें पीछे खड़े रहते, गर्मीक दिनोंमें खड़े-खड़े उनपर पंखा करते रहते। वे स्वरूपोंको साधारण बालक न समझकर साक्षात् भगवान् ही समझते और तदनुरूप ही उनके प्रति व्यवहार करते।

समय कम दे राधिकादासजीका समय अधिकत्तर भजनमें ही व्यतीत होता। पाठशालाको वे दे पाते। सेक्सरियाजी उनके भक्ति-भावसे प्रसत्र हो जब उन्हें वेतनके अतिरक्त कुछ देना चाहते. तो वे कह देते- 'मैं वेतनके बराबर भी तो परिश्रमसे नहीं पढ़ा पाता, तो अतिरिक्त कैसे ले लूँ ?'

वीतराग श्रीराधिकादासजी संसारसे कितना निलिप्त थे उसका पता एक विशेष घटनासे चलता है। उनकी छोटी बेटी बाल-विधवा हो गयी। शिष्टाचारवश लोग आये शोक प्रकट करने, तो उन्होंने कहा- 'मुझे प्रभुके हर विधानमें उनकी कृपाके दर्शन होते हैं। प्रभुकी कृपाके लिए शोक कैसा ?'

जब राधिकादासजीके पुत्र श्रीनन्दकिशोरजी सुयोग्य हो गये, तो उनके ऊपर पाठशालाका भार छोड वे अधिक समय वृन्दावनमें व्यतीत करने लगे। वृन्दावनमें वे मिरजापुरवालोंकी धर्मशालामें रहते, कभी-कभी नन्दगाँव जाकर वहाँ भी रहा करते। यात्रामें अपने गोपालजीको सदा साथ रखते। एक डिबियामें उन्हें विराजमान कर डिबियाको गलेसे लटका लेते। उन्हें भोग लगाये बिना जल भी ग्रहण न करते। पर प्रसादके नामसे उन्हें जहाँ जो भी मिलता, उसे शुद्ध-अशुद्धका विचार किये बिना प्रेमसे ग्रहण करते।

सम्वत् १९८९ के चैत्र मासमें राधिकादासजी रुग्ण हो गये। अपना अन्त समय जान उन्होंने निरन्तर वृन्दावनमें रहना निश्चय कर लिया। वे वृन्दावन चले गये। उनकी धर्म-पत्नी, श्रीनन्दकिशोरजी, सेठ गोरखरामजी और द्वारकादासजी भी वृन्दावन जाकर उनकी सेवामें रहने लगे। उनकी इच्छानुसार अष्ट-प्रहार हरिनाम-संकीर्तनका आयोजन किया गया, जो उनके निकुञ्जवासके समय तक कई महीने लगातार चलता रहा। निकुञ्जवासके पच्चीस दिन पहलेसे उन्होंने अखण्ड मौनव्रत धारण कर लिया। 'राधेश्याम' के सिवा और सभी शब्दोंका उच्चारण त्याग दिया। एक दिन स्लेटपर लिखकर कहा- 'सात दिन रासलीला तथा सात दिन श्रीमद्भागवतकी कथा सुयोग्य पण्डित द्वारा होनी चाहिए।' रासलीला और भागवत-पाठका आयोजन किया गया।

गुरु-सान्निध्य और आध्यात्मिक शिक्षा

सम्वत् १९८९, श्रावण शुक्लपक्ष त्रयोदशीको प्रातः काल उन्हें श्रीवृन्दावन-निकुञ्ज-प्राप्ति हो गयी।

श्रीराधिकादासजीने गृहस्थमें रहते हुए एक आदर्श भक्तका जीवन व्यतीत किया। उन्होंने अपने जीवनका लक्ष्य बहुत पहले स्थिर कर लिया था। जीवन भर वे तन-मनसे उसे प्राप्त करनेकी चेष्टामें लगे रहे और इसमें सन्देह नहीं कि उन्होंने उसे प्राप्त किया। उन्होंने अपनी आध्यात्मिक उपलब्धिका कोई संकेत किसीको नहीं

दिया। पर अपने हाव-भाव और व्यवहारके कारण वे उसे गुप्त भी न रख सके। उनमें वे सभी गुण थे, जो एक उच्चकोटिके भक्ति-सिद्ध सन्तमें देखनेको मिलते हैं। मूर्ति थे। भगवानका नाम लेनेवाला प्रत्येक व्यक्ति उनके लिए भक्त था। ब्राह्मण और राधा-कृष्णका नाम लेते ही उनके नेत्रोंमें प्रेमाश्र छलक आते थे। दैन्यकी वे साक्षात इतने बडे पण्डित होते हुए भी वे उसकी चरणरजकी आकांक्षा करते थे। किसीका

दोष देखनेकी क्षमता उनमें बिलकुल नहीं थी। साम्प्रदायिक द्वेष-भाव तो उन्हें छूकर

भी नहीं गया था। उन्होंने श्रीमदभागवतकी अनेक टीकाओंका गम्भीर अध्ययन किया था। छोटी-बडी कई पुस्तकें भी लिखी थीं, जिनका प्रकाशन सेक्सरिया परिवारने करवाया है। उन पुस्तकोंकी सूची इस प्रकार है-

१. श्रीप्रबोध पद्यावली २. श्रीविज्ञान सुधा बिन्दु ३. श्रीकृष्ण परत्वम् ४ हरिजन महिमोपदेश ५. श्रीसिद्धान्त षट्पदी ६. विनय पद्यावली ७. श्रीभक्ति सुधा बिन्दु ८. श्रीभक्त नामावली ९. श्रीसौन्दर्य-सागर १०. गंगा शतक ११. संस्कृत भजन रत्नावली १२. भाषा भजन रत्नावली १३. वैराग्य सुधा बिन्दु १४. हरिनामोपदेश १५. श्रीमत्सद्‌गुरु जीवन चरित १६. सिद्धान्त सुधा बिन्दु १७. भक्त मन्दाकिनी १८. श्रीमदाचार्य स्तुति।

इनमें से नौ पुस्तकें उपलब्ध हैं। शेष अनुपलब्ध हैं।

श्रीराधिकादासजीने अधिक शिष्य नहीं किये। केवल पाँच शिष्य और एक शिष्याकी जानकारी मिलती है। प्रधान शिष्योंमें श्रीचतुर्भुजदासजी महाराज, श्रीसीतारामजी पलड़िया और श्रीनन्दकिशोरजी मिश्र हैं। श्रीचतुर्भुजदासजी और श्रीसीतारामजीके प्रयाससे वृन्दावनके रमणरेतीमें उनका समाधिस्थल बनाया गया है, जिसमें उनके चरणोंकी नित्य पूजा होती है।

नाम-स्मरण और एकाग्रता — जीवन-संदेश

नाम-स्मरण, भजन और एकाग्रता के प्रसंग साधना की निरंतरता की याद दिलाते हैं। यहाँ वर्णित जीवन-अनुभवों से पाठक अपनी साधना के लिए प्रेरणा ले सकते हैं।

कथा का सार

भक्तप्रवर श्रीराधिकादासजी महाराज की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।