ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 55
भक्त श्रीसनेहीरामजी
भक्त श्रीसनेहीरामजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

भक्त श्रीसनेहीरामजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन
[ माँटग्राम ]
व्रजके माँट ग्राममें सनेहीरामजीका नाम कौन नहीं जानता ? सभी उनका नाम श्रद्धासे लेते हैं, उनके रसियाके पद प्रेमसे गाते हैं और उनके संस्मरण सुनाते-सुनाते गद्गद् हो जाते हैं।
उनका जन्म माँटमें एक क्षत्रिय कुलमें सम्वत् १८९९ में हुआ था।
कालसे ही वे बडे रसिक थे। किस सम्प्रदायमें दीक्षित थे, यह कहना कठिन है। पर, बिहारीजीमें उनकी सहज भक्ति थी। नित्य बिहारीजीके दर्शन करने वृन्दावन आया करते थे। रात्रिका भोजन बिहारीजीके दर्शन किये बिना नहीं करते थे। यह उनका नियम था।
संसारसे वे उदासीन रहते थे। राधाकृष्णकी दिव्य लीलाओंके चिन्तनमें सदा खोये रहते थे। उनके बडे भाई कृषक थे। वही खेती कर परिवारका पालन करते थे। छोटे भाईसे वे असन्तुष्ट रहते थे। उसे ढोंगी, आलसी और निकम्मा समझाते थे। डॉट-डपटकर वे उसे खेतपर भेज देते थे। तो भी उन्हें लगता था कि वह काम कुछ नहीं करता, करता भी है तो उलटा-सीधा। कामसे जी चुरानेके कारण ध्यानका ढोंग बनाकर खेतमें चुप-चाप बैठा रहता है।
एक दिन वे उसे अपने साथ खेतपर ले गये। वे हल जोतने लगे, उससे कहा बीज बोनको। बोते-बोते भोजनका समय हो आया। सनेहीरामजी ने देखा भाभीको सिरपर भोजनका कटोरदान रखकर लाते हए। उन्हें इस बातकी चिन्ता हई कि भाई साहब बिना ठाकुरको भोग लागये खाना शुरू कर देंगे और उन्हें भी अमनियाँ (अनिवेदित) खाना पड़ेगा। इसलिए जब भाभी रास्तेमें ही थी, उन्होंने ध्यानमें तुलसी डालकर ठाकुरको भोग अर्पण कर दिया। वे जितनी देर ध्यान कर रहे थे, बोआईका काम अपने-आप बन्द हो गया। भाईको यह देख क्रोध आया। उसने डण्डा खींचकर सनेहीरामके हाथमें मारा और कहा- 'खेत बोने आया है या आँख मींचकर ढोंग करने ?'
सनेहीरामजीने कहा- 'भाई साहब, यह आपने क्या किया ? मैं ठाकुरको भोग लगा रहा था, उसी बीच आपने मेरा ध्यान भंगकर दिया। ठाकुरको पूरा भोग नहीं लग पाया। कढ़ी, रोटी, सब्जी सब फैल गयी।'
उसने कटोरदान खोला ही था कि देखा वह खाली है और कढ़ी, रोटी, सब्जी सब क्यारियोंमें फैली हुई है। पतिका ध्यान भी उस ओर आकर्षित हुआ और वह भी क्यारियोंमें खाद्य-सामग्रीको फैला देख आश्चर्यमें डूब गया। पश्चातापकी अग्नि उसके हृदयमें धधकने लगी। छोटे भाईके चरणोंमें गिरकर उसने क्षमा माँगी और उसी दिनसे उसे घर और खेतीके सभी कार्योंसे मुक्त कर दिया।
एक दिन सनेहीराम देर रात तक ध्यानमें बैठे रहे। ध्यान भंग होनेपर उन्हें लगा कि रात हुए अभी कुछ ही देर हुई है। वे बिहारीजीके दर्शनको चल पड़े। उस समय
रातके २ बजे थे। चाँदनी छिटक रही थी। यमुना तटपर पहुँचे तो देखा कि नौकाएँ सब किनारेसे लगी हैं, नाविक कोई नहीं है। वे चिन्तामें पड़ गये। शायद आज बिहारीजी दर्शन नहीं देंगे। शायद मुझसे कोई अपराध हो गया है, जिसके कारण वे अप्रसन्न हैं।
इतनेमें ही उन्होंने देखा एक नावको उस पारसे इस पार आते। निकट आनेपर उन्होंने नाव और उसके मल्लाह दोनोंको पहचान लिया। यह वही मल्लाह था जो रोज उन्हें पार ले जाया करता था और ले आया करता था। वे नाव बैठकर उसपार चले गये। बिहारीजीके मन्दिर पहुँचे तो दर्शन खुले थे। उन्होंने जीभरके दर्शन किये। दण्डवत कर बाहर आये। यमुना-तटपर पहुँचे तो वही नाविक जैसे नाव लिये उनकी प्रतिक्षा कर रहा था। उसने उन्हें पार उतार दिया। नावसे उतरते समय सनेहीरामने देखा गाँवके कुछ लोगोंका यमुना-स्नानको आते। तब जैसे वे सोतेसे जागे उन्होंने कहा नाववालेसे- 'सबेरा हो गया क्या ?'
दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग
कहा। 'और नहीं क्या ? आप जब वृन्दावन जा रहे थे तभी २ बजे थे।' नाववालेने
'तो तू इतनी रातको कैसे था यहाँ ?'
'यह मत पूछिये ठाकुर साहब। कल मेरा घरवालीसे झगड़ा हो गया। गुस्सेमें मैं घर नहीं गया। रात भर नींद भी नहीं आयी घरवालीकी बात सोचते-सोचते।'
सनेहीराम सोचने लगे लेकिन इतनी रात तक बिहारीजीके दर्शन कैसे खुले रहे ? वे सोचते ही रह गये। उन्हें सब कुछ एक स्वप्न जैसा लगने लगा।
दूसरे दिन जब वे फिर दर्शन करने गये, तो नित्यकी तरह वही नाविक घाटपर मिला। उसने कहा- 'ठाकुर साहब, कल दर्शन करने नहीं गये ?'
'गया तो, भूल गया ?' सनेहीरामने आश्चर्यपूर्वक उसकी ओर देखते हुए कहा।
'कब गये ? मैने तो नहीं देखा। कोई और ले गया होगा आपको। आप कुछ देरसे गये होंगे। मैं भी कल कुछ जल्दी घर चला गया था। देरसे जाता हूँ तो घरवाली नाराज होती है।'
सनेहीराम चुप रहे। वे समझ गये कि बिहारीजी स्वयं आये थे नाविकके रूपमें और उन्हें ले गये थे। बिहारीजीकी कृपाका अनुभवकर उनके प्राण विगलित हो गये। नेत्रोंसे अश्रुधार बह निकली। कम्प और पुलकादि सात्विक भावोंने उन्हें विवश कर दिया। वे बार-बार बिहारीजीकी कृपाकी बात सोचकर कभी आश्चर्यमें डूब स्वामी श्रीबालमुकुन्ददासजी
जाते, कभी सन्देहमें पड़ जाते। उन्हें यह सब कभी सत्य जैसा प्रतीत होता, कभी स्वप्न जैसा।
पर, इसमें आश्चर्यकी कोई बात तो थी नहीं। बिहारीजी तो ऐसे अवसरकी खोजमें रहते ही हैं। उनके निशिंकचन भक्त उनसे कुछ माँगते-जाँचते तो हैं नहीं। किस प्रकार उनके ऋणसे उऋण हों, यह चिन्ता उन्हें लगी रहती है। इसलिए उनकी किसी भी प्रकारकी सेवाका अवसर देख वे चुकते कभी नहीं। स्वामी श्रीबालमुकुन्ददासजी
[ वृन्दावन ]
श्रीस्वामी बालमुकुन्ददासजी शुक-सम्प्रदायके श्रीस्वामी रामस्वरूपजी महाराजके द्वारेकी परम्परामें जिला लुधियानामें संगरूरकी गद्दीके महन्त थे। वे बड़े उदार और साधुसेवी थे। महन्त बनते ही उन्होंने गद्दीकी सम्पत्ति साधुओंकी सेवामें लगाना शुरू कर दिया। जिसने जो माँगा उसे दिया, यहाँ तक कि गद्दीकी जमीन-जायदाद भी दूसरे लोगोंके नाम लिखना उन्होंने शुरू कर दी। गुरु भाईयोंने आपक्ति की तो महन्ताई त्याग दी।
महन्थाई त्यागकर वे वृन्दावन चले आये। यहाँ बिहार घाटपर एक कुटियामें रहकर भजन करने लगे। वे अयाचक वृत्तिसे रहते। भण्डारोंमें न जाते। संग्रह भी न करते। जो कुछ उनके पास आता साधुओंमें बाँट देते। उनके पंजाबी शिष्य बहुत थे। वे उनके लिए आश्रम बनाना चाहते तो कहते- 'वृन्दावनमें प्रपञ्च नहीं फैलाना चाहिए। यहाँ केवल भजन करना चाहिए।'
सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ
वे श्रीरामसखीजीकी वाणी 'भक्ति-रस-मञ्जरी' के अनुसार सहचरी भावसे निकुञ्जकी उपासना करते। सदा भावमें डूबे रहकर प्रेमके झकोरे खाते रहते। बोलते-चालते बहुत कम। श्रीरूपमाधुरीजीने उनके संबंधमें लिखा है-
बालमुकुन्ददास सन्त, संगरूरके महन्त,
बुद्धिवान विद्यावंत, हरि रस मतवारो है।
बहु बात नहिं बोले, मन काहुसे न डोले,
लेत प्रेमके झकोले, राग-द्वेष तल डारो है ।।
उनके सामने कोई दुनियाकी बात करता तो कहते-
जो बोले तो हरि कथा, नहीं मौनहि राखे ।
मिथ्या, कड़बा, दुर्वचन, कबहुँ कछु नाहिं भाखे ।।
(भक्ति-सागर)
हरि-कथा सुखकी निधि, जगत-कथा संताप ।
'नृपी' हरिके नाम बिना शब्द-शब्दमें पाप ।।
(नूपीबाई)
उन्हें श्रीमद्भागवत और श्रीश्यामचरणदासकी वाणी 'भक्ति सागर' कण्ठ थे। कहते हैं कि उन्होंने एक बार शुकदेवजीके स्थान शुकतार जाकर भागवतका और एक बार श्यामचरणदासजीके जन्म स्थान डेहरा जाकर भक्ति सागरका पारायण किया था, तभीसे दोनों आचार्योंकी कपासे उन्हें यह दोनों ग्रन्थ कण्ठ हो गये थे।
वे नित्य वंशीवट जाते, जहाँ श्रीश्यामचरणदासको शुकदेवजीने परिकर सहित राधाकृष्णके दर्शन कराये थे और वहाँ देर तक ध्यानमें बैठे रहते। बरसाने, गिरिराज और प्रेमसरोवरमें भी वे कुछ दिन रहे थे।
एक बार वे दिनभरके हारे-थके कहींसे लौटकर वृन्दावन सन्ध्या समय वापस आये। आते ही श्रीराधावल्लभके मन्दिरमें दर्शन करने गये। वहाँ ठाकुरका विवाहोत्सव था। थोड़ी देर में भोगका परदा आ गया। वे दण्डवत्कर अपनी कुटियाको चले गये। ठाकुरके भोग आरोगनेका ध्यान करते-करते चिन्तनमें ही उनका दिया प्रसाद ग्रहणकर भूखे सो गये। थोड़ी देर बाद उनकी कुटियाके निकट रहनेवाली एक बुढ़ियाकी लड़कीने आकर कहा- 'बाबा खोल। राधावल्लभकौ प्रसाद लै ले।'
बाबा उठ गये। दरवाजा खोलकर लड़कीसे प्रसादका थाल लेते हुए बोले- 'तूने कैसे जाना मैं आ गया ?'
लड़कीने कहा- 'मैं नायँ जानूँ। मइयाने देखी होयगी।'
दूसरे दिन उस बुढ़ियाने बाबाको देखकर दण्डवत् की और पूछा- 'बाबा कब आये ?'
बाबाने कहा- 'तूने कल तो मेरे आते ही लालीके हाथ प्रसाद भेजा। फिर पूछ रही है कब आये।'श्रीसखीचरणदास बाबाजी
मैं प्रसाद कब भेज्यो ? लाली तो हिंया है बी नाँय' बुढ़ियाने आश्चर्य सहित उत्तर दिया।
बाबा समझ गये कि करुणामयी राधारानीने उसकी लालीके रूपमें उनपर कृपा की थी। वे बातको टालते हुए बोले- 'अच्छा तो मुझे भ्रम हो गया। वह कोई और रही होगी।'
उस समयसे बाबा कुटियाके भीतर ही राधारानीके ध्यानमें रहने लगे। कहीं आना-जाना बिल्कुल बंद कर दिया।
प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश
ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।
कथा का सार
भक्त श्रीसनेहीरामजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।