ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 52

श्रीयशोदा माईजी

श्रीयशोदा माईजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीयशोदा माईजी
श्रीयशोदा माईजी — ब्रज के भक्त भाग 3

श्रीयशोदा माईजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

तृतीयाके दिन वे सदाकी भाँति प्रातः ३ बजे शैय्यासे उठे। दोपष्ट प्रिया-प्रियतमके ध्यान-संकीर्तनमें संलग्न रहे। उसके पश्चात् शौचादिसे निवृत्त हो सेवकोंसे बोले- 'आज हमारी तैयारी है' और राधारानीके सम्मुख बैठकर गम्भीर स्वरमें 'श्रीराधा अम्मा ! श्रीराधा अम्मा!' नामका उच्चारण करने लगे। सेवकोंने घबराकर वैद्यको बुलाया। वैद्य यह देखकर चकित रह गया कि उनकी नाही नहीं है. पर नामोच्चारण हो रहा है ! मुखपर एक अपूर्व आनन्दकी छटा छायी है। नामोच्चारण करते-करते उन्होंने प्रिया-प्रियतमकी नित्य-लीलामें प्रवेश किया।

[ गिरिराज ]

श्रीरूप गोस्वामीने अपने ठाकुर श्रीगोविन्दजीके दर्शनके सम्बन्धमें सर्वसाधारणको कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है-

'स्मेरां भङ्गीत्रयपरिचितां साचिविस्तीर्णदृष्टिम्, वंशीन्यस्ताधरकिशलयामुज्ज्वलां चन्द्रकेण । गोविन्दाख्यां हरितनुमितः केशितीर्थोपकण्ठे, मा प्रेक्षिष्ठास्तव यदि सखे ! बन्धु संगेहस्ति रंगः !!?

(भक्तिरसामृतसिंधु १-२-२३९)

- हे सखे ! यदि तुम्हारी स्त्री-पुत्र, बन्धु-बान्धवोंके साथ आमोद-प्रमोदमें जीवन-यापन करनेकी इच्छा हो, तो केशी-तीर्थके समीप श्रीगोविंद नामक उस हरितनुकी ओर मत ताक लेना, जो मयूर-पुच्छसे अलंकृत, मन्द-मन्द मुस्काते त्रिभंग मुद्रामें वहाँ खड़ा है, जिसके बंकिम विशाल नेत्र हैं और जिसके अधरोंपर मधुर मुरली शोभायमान है (क्योंकि उसे एक बार देख लोगे, तो स्त्री-पुत्र और बन्धु-बान्धवोंकी सुध-बुध भूल जाओगे।)'

भक्तों के साथ मिलन और सत्संग

श्रीरूप गोस्वामीकी चेतावनी उतनी कडी नहीं, जितनी होनी चाहिए थी। क्या उस 'हरितन' के दर्शनकर मनुष्य केवल अपने स्त्री-पुत्र और बन्धुबान्धवों को ही भूल जाता है ? वह संसारको भूल जाता है. स्वर्ग-अपवर्ग को भूल जाता है. और जो भी याद रखनेकी वस्तुएँ हैं उन सबको भूल जाता है. यहाँ तक कि अपने

आपको भूल जाता है। उसे न तनकी सुध रहती है, न मनकी, न खानेकी, न पीनेकी, न लोक-मर्यादाकी और न मान-अपमानकी, यश-अपयश की। वह कभी चाल-ढाल सब दुनियाके लोगोंसे भिन्न हो जाती है। जो छबि उसने एक बार देख हँसता है. कभी रोता है. कभी नाचता है. कभी कूदता है। उसकी रहन-सहन, ली होती है उसे बार-बार देखनेको वह आतुर रहता है। वह नहीं दीखती तो उसके नामी रट लगाता रहता है, क्योंकि उसका नाम और रूप अभिन्न होनेके कारण उसका नाम उच्चारण करनेमें उसे वही सुख मिलता है, जो उसका रूप देखनेमें मिलता है।

सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ

बल्लभकुलकी उस बाईके साथ भी यही हुआ, जो पूंछरी और जतीपुराके बीच बल्लभकुलके धौला मन्दिरमें गोपालजीकी सेवा किया करती थी। उसे एक दिन गोपालजीके दिव्य स्वरूपकी झाँकी दीख गयी। तभीसे वह खाना-पीना और सेवा-पूजा सब भूल गयी। वह मन्दिरसे बाहर एक पेड़के ऊपर जा बैठती और हर समय 'गोकुलेश-गोकुलेश' की रट लगाती रहती। वह दिनमें पेड़के ऊपर रहती, रातको उसके नीचे भूमिपर। वहाँसे कहीं न जाती। किसीसे न कुछ बोलती, न माँगती। यदि उससे कोई कुछ दे जाता तो खा लेती, नहीं तो भूखी रह जाती। उसे 'गोकुलेश' के उच्चारणमें जो रस मिलता, उससे उसकी आत्मा, मन और इन्द्रियाँ सब तृप्त रहते।

पण्डित श्रीरामकृष्णदास बाबा उसकी प्रशंसा किया करते और लोगोंसे उसका ध्यान रखनेको कहा करते। उसके सम्बन्धमें इसके सिवा और कुछ भी ज्ञात नहीं है कि लोग उसे 'यशोदा मैया' कहकर पुकारा करते। श्रीरूपमाधुरीजीने अपनी वाणीमें 'यशोदा मैया' पर जो कवित्त लिखा है वह उसीपर लिखा जान पड़ता है। * उससे भी उनके सम्बन्धमें बस इतना ही जाना जाता है कि बालकृष्णकी उसपर कृपा हुई थी और उसका यश सारे व्रजमें छा गया था।

सेवा और समर्पण — जीवन-संदेश

सेवा का मूल्य केवल बाहरी कार्य में नहीं, बल्कि उसके पीछे के निष्कपट भाव में भी होता है। इस चरित्र के प्रसंगों को पढ़ते समय सेवा के इसी भाव पर विचार किया जा सकता है।

कथा का सार

श्रीयशोदा माईजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।