ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 80

स्वामी श्रीबालमुकुन्ददासजी

स्वामी श्रीबालमुकुन्ददासजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

स्वामी श्रीबालमुकुन्ददासजी
स्वामी श्रीबालमुकुन्ददासजी — ब्रज के भक्त भाग 3

स्वामी श्रीबालमुकुन्ददासजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ

[ वृन्दावन ]

श्रीस्वामी बालमुकुन्ददासजी शुक-सम्प्रदायके श्रीस्वामी रामस्वरूपजी महाराजके द्वारेकी परम्परामें जिला लुधियानामें संगरूरकी गद्दीके महन्त थे। वे बड़े उदार और साधुसेवी थे। महन्त बनते ही उन्होंने गद्दीकी सम्पत्ति साधुओंकी सेवामें लगाना शुरू कर दिया। जिसने जो माँगा उसे दिया, यहाँ तक कि गद्दीकी जमीन-जायदाद भी दूसरे लोगोंके नाम लिखना उन्होंने शुरू कर दी। गुरु भाईयोंने आपक्ति की तो महन्ताई त्याग दी।

महन्थाई त्यागकर वे वृन्दावन चले आये। यहाँ बिहार घाटपर एक कुटियामें रहकर भजन करने लगे। वे अयाचक वृत्तिसे रहते। भण्डारोंमें न जाते। संग्रह भी न करते। जो कुछ उनके पास आता साधुओंमें बाँट देते। उनके पंजाबी शिष्य बहुत थे। वे उनके लिए आश्रम बनाना चाहते तो कहते- 'वृन्दावनमें प्रपञ्च नहीं फैलाना चाहिए। यहाँ केवल भजन करना चाहिए।'

वे श्रीरामसखीजीकी वाणी 'भक्ति-रस-मञ्जरी' के अनुसार सहचरी भावसे निकुञ्जकी उपासना करते। सदा भावमें डूबे रहकर प्रेमके झकोरे खाते रहते। बोलते-चालते बहुत कम। श्रीरूपमाधुरीजीने उनके संबंधमें लिखा है-

बालमुकुन्ददास सन्त, संगरूरके महन्त,

सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ

बुद्धिवान विद्यावंत, हरि रस मतवारो है।

बहु बात नहिं बोले, मन काहुसे न डोले,

लेत प्रेमके झकोले, राग-द्वेष तल डारो है ।।

उनके सामने कोई दुनियाकी बात करता तो कहते-

जो बोले तो हरि कथा, नहीं मौनहि राखे ।

मिथ्या, कड़बा, दुर्वचन, कबहुँ कछु नाहिं भाखे ।।

(भक्ति-सागर)

हरि-कथा सुखकी निधि, जगत-कथा संताप ।

'नृपी' हरिके नाम बिना शब्द-शब्दमें पाप ।।

(नूपीबाई)

उन्हें श्रीमद्भागवत और श्रीश्यामचरणदासकी वाणी 'भक्ति सागर' कण्ठ थे। कहते हैं कि उन्होंने एक बार शुकदेवजीके स्थान शुकतार जाकर भागवतका और एक बार श्यामचरणदासजीके जन्म स्थान डेहरा जाकर भक्ति सागरका पारायण किया था, तभीसे दोनों आचार्योंकी कपासे उन्हें यह दोनों ग्रन्थ कण्ठ हो गये थे।

वे नित्य वंशीवट जाते, जहाँ श्रीश्यामचरणदासको शुकदेवजीने परिकर सहित राधाकृष्णके दर्शन कराये थे और वहाँ देर तक ध्यानमें बैठे रहते। बरसाने, गिरिराज और प्रेमसरोवरमें भी वे कुछ दिन रहे थे।

एक बार वे दिनभरके हारे-थके कहींसे लौटकर वृन्दावन सन्ध्या समय वापस आये। आते ही श्रीराधावल्लभके मन्दिरमें दर्शन करने गये। वहाँ ठाकुरका विवाहोत्सव था। थोड़ी देर में भोगका परदा आ गया। वे दण्डवत्कर अपनी कुटियाको चले गये। ठाकुरके भोग आरोगनेका ध्यान करते-करते चिन्तनमें ही उनका दिया प्रसाद ग्रहणकर भूखे सो गये। थोड़ी देर बाद उनकी कुटियाके निकट रहनेवाली एक बुढ़ियाकी लड़कीने आकर कहा- 'बाबा खोल। राधावल्लभकौ प्रसाद लै ले।'

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

बाबा उठ गये। दरवाजा खोलकर लड़कीसे प्रसादका थाल लेते हुए बोले- 'तूने कैसे जाना मैं आ गया ?'

लड़कीने कहा- 'मैं नायँ जानूँ। मइयाने देखी होयगी।'

दूसरे दिन उस बुढ़ियाने बाबाको देखकर दण्डवत् की और पूछा- 'बाबा कब आये ?'

बाबाने कहा- 'तूने कल तो मेरे आते ही लालीके हाथ प्रसाद भेजा। फिर पूछ रही है कब आये।'श्रीसखीचरणदास बाबाजी

मैं प्रसाद कब भेज्यो ? लाली तो हिंया है बी नाँय' बुढ़ियाने आश्चर्य सहित उत्तर दिया।

बाबा समझ गये कि करुणामयी राधारानीने उसकी लालीके रूपमें उनपर कृपा की थी। वे बातको टालते हुए बोले- 'अच्छा तो मुझे भ्रम हो गया। वह कोई और रही होगी।'

उस समयसे बाबा कुटियाके भीतर ही राधारानीके ध्यानमें रहने लगे। कहीं आना-जाना बिल्कुल बंद कर दिया।

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

स्वामी श्रीबालमुकुन्ददासजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।