ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 68

श्रीयदुनन्दनदास बाबाजी

श्रीयदुनन्दनदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीयदुनन्दनदास बाबाजी
श्रीयदुनन्दनदास बाबाजी — ब्रज के भक्त भाग 3

श्रीयदुनन्दनदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ वृन्दावन ]

श्रीयदुनन्दनदास बाबा उन भाग्यवान सन्तोंमें से थे, जिन्हें भजन करना नहीं होता, जिनका भजन स्वतः होता है, जिनसे भजनके सिवा और कुछ हो ही नहीं सकता, क्योंकि भजन उनके स्वभावमें होता है, जिनका जीवन आदिसे अन्त तक भजनानन्दके प्रवाहमें स्वयं बहा चला जाता है, जो याग-यज्ञ, तपस्या या कोई कठोर साधना करके नहीं, प्रभुकी मधुर यादमें नाच-कूदकर और सरल प्राणसे उन्हें पुकार-पुकारकर सहजही उन्हें प्राप्तकर लेते हैं।

उनका जन्म हुआ पश्चिम बंगालके बाँकुड़ा जिलेके बेलोड़ा ग्राममें। प्रारम्भसे ही नृत्य-गान और लीला-अभिनयमें उनकी रुचि थी। होती न, भगवान्ने उन्हें बनाया

ही जो था इसलिए। वैसा ही उन्हें रूप दिया था, वैसा ही मधुर कण्ठ और वैसी ही भाव-सम्पत्ति। जिन सात्विक भावोंको साधक भक्तिकी ऊँची कक्षामें पहुँचकर प्राप्त करता है. वे उन्हें प्रारम्भसे ही नैसर्गिक रूपमें प्राप्त थे। लीला अभिनयोंमें वे राधाका अभिनय किया करते थे। श्रीकृष्णके विरहमें राधामें अश्रु, कम्प पुलक और मूर्छा आदि जिन सात्विक भावोंका उदय होता है, उनका अन्य अभिनेता राधाका अभिनय करते समय असफल अनुसरण ही करते हैं। पर, यदुनन्दनदास बाबाका अभिनय केवल उनका अनुकरण ही न होता। किसी अंशमें उसमें उनका सच्चा आभास होता।

राधाका अभिनय करते-करते वे राधाके चरणोंमें पूर्णरूपसे समर्पित हो गये। श्रीजीव गोस्वामीकी परम्पराके श्रीनन्दलाल गोस्वामीसे दीक्षा ले राधारानीकी मंजरी रूपसे मानसिक सेवा करने लगे। १८ वर्षकी अवस्थामें गृह त्यागकर व्रज चले आये। भाव-विह्वल हो 'हा किशोरी! हा, राधे! हा प्राणेश्वरी!' पुकारते हुए बहुत दिनों तक व्रजकी लीला-स्थलियों, वनों और उपवनोंमें फिरा किये। उस अवस्थामें एक दिन किसी स्थानपर राधा भावकी मूर्ति श्रीगौरांग महाप्रभुकी एक झलक देखकर धन्य हुए।

महाप्रभुके दर्शनकर उनका भावोन्माद और बढ़ गया। उस दशामें घूमते-घूमते वे राधारानीकी मध्याह्न लीला-स्थली सूर्यकुण्ड पहुँचे। वहाँ राधारानीका स्मरण कर लगे रो-रोकर प्रलाप करने- 'हा राधे! हा, प्राणेश्वरी ! यही तो है तुम्हारी प्रिय लीला-स्थली। पर कहाँ हो तुम ? कहाँ हैं ललिता, विशाखा कुन्दलता आदि तुम्हारी सखियाँ! सुना है, तुम्हारी लीला नित्य है, तुम आज भी सखियों सहित यहाँ श्रीकृष्णके साथ भाँति-भाँतिकी मधुर लीलाओंका आस्वादन कर रही हो। पर, मैं अपने ही कर्मदोषके कारण अंधा हो रहा हूँ और देख नहीं पा रहा हूँ तुम्हें, क्यों नहीं मेरे दोषोंको भूलकर अपने करुणा-कटाक्षसे मेरे नेत्र खोल देती, करुणामयी ! ऐसे नेत्रोंसे क्या लाभ, जो तुम्हारे दर्शनके योग्य न हों ?

ऐसे जीवनसे भी क्या लाभ, जो तुम्हारी करुणा-दृष्टिकी संजीवनीसे संजीवित न हो !'

बाबाकी करुण पुकार राधारानीने सुन ली। सिद्ध मधुसूदनदास बाबाके शिष्य श्रीहरिगोपालदासको प्रेरणा देकर उनके लिए वह मार्ग प्रशस्त कर दिया जिसपर चलकर वे उन तक पहुँच सके। हरिगोपालदास बाबा सिद्ध श्रीमधुसूदनदास बाबाके शिष्य थे। राधारानीने मधुसूदनदास बाबासे स्वप्नमें कहा था- 'तुम जिस घाटपर सूर्यकुण्डमें स्नान करते हो, उसके निकट कण्ठ तक जलमें एक शिला है। वह पहले कुण्डके तटपर रखी रहती थी। उसपर मैने स्नान करते समय अपना मुकुट

रख दिया था। उसके स्पर्शसे शिला गल गयी और उसपर उसका चिह्न पड़ गया। तुम उस शिलाको निकालकर उसका पूजन किया करो।' मधुसूदनदास बाबा उस दो-ढाई मनकी शिलाको सेवा करने लगे। अब वह शिला उस कुटियाकी दीवारमें, जिसमें मधुसूदनदास बाबाकी समाधि है, इस प्रकार जड़ी है, जिससे मुकुटके चिह्नके दर्शन हो सकें। श्रीहरिगोपालदास बाबा उस शिलाकी सेवा करते थे। वृद्ध होनेपर उन्होंने वह सेवा अपने शिष्य श्रीजयकृष्णदास बाबाको दे दी थी। जयकृष्णदास बाबासे उन्होंने कहा- 'इस युवकको वेष देकर अष्टकालीन लीलास्मरणकी शिक्षा दो।'

सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ

यदुनन्दनदास बाबाने जयकृष्णदास बाबासे वेश लिया और लीलास्मरणकी रीति सीखी। लीला-स्मरण करते हुए सूर्यकुण्डमें रहकर वे गुरुदेव और परमगुरुकी सेवा करने लगे। उनकी सेवाका मुख्य अंग था बिहागड़ा कीर्तन द्वारा उन्हें सुखी करना। बिहागड़ा कीर्तन सिद्ध मधुसूदनदास बाबाने प्रकट किया था। उसका सुर-ताल इतना कठिन है कि अच्छे-अच्छे कीर्तनियाँ भी उसे नहीं गा सकते। यदुनन्दनदास बाबा उसमें बड़े निपुण थे। उनका कीर्तन सुन दोनों महात्मा भाव-विभोर हो जाते, उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते और आशीर्वाद देते।

हरिगोपालदास बाबा उस समयके प्राचीन और वयोवृद्ध महात्माओंमें-से थे। पण्डित रामकृष्णदास बाबा उनका बड़ा आदर करते और उन्हें श्रीम‌द्भागवत और रूप-सनातन आदिके ग्रन्थोंका पाठ सुनाते। यदुनन्दनदास बाबाको भी उनका पाठ सुननेका अवसर मिल जाया करता।

यदुनन्दन बाबा गुरुवर्गकी सेवामें तो तत्पर रहते ही, अन्य साधुओं और व्रजवासियोंकी सेवा भी वे तन-मनसे करते। प्रतिवर्ष अग्रहण मासके शुक्लपक्षकी अष्टमी तिथिपर मधुसूदनदास बाबाके तिरोभावके उपलक्ष्यमें बड़ा उत्सव मनाया जाता है। उसमें वे अपने हाथसे सब महात्माओंके लिए रसोई बनाते। चौरासीकोस व्रजकी परिक्रमापर भी महात्मा लोग प्रतिवर्ष उन्हें अपने साथ ले जाया करते। परिक्रमामें रसोईकी सेवाका भार उनके ऊपर छोड़ निश्चिन्त रहते। वे महात्माओंके लिए रसोई प्रेमसे बनाते, पर स्वयं सदा मधुकरी माँगकर ही खाते। मधुकरी न मिलनेपर उपवासी रहते। मधुकरीमें रोटियाँ अधिक मिल जाती तो उन्हें सुखाकर रख लेते और भिंगो-भिंगो कर खाते।

कुछ दिन बाद जयकृष्णदास बाबा मधुसूदनदास बाबा द्वारा सेवित शिलाकी सेवा यदुनन्दनदास बाबाको देकर बरसाने चले गये। यदुनन्दन बाबा उस सेवाको

प्राप्तकर बहुत प्रसन्न हुए। उसे साक्षात् राधारानीकी सेवा समझ बहुत दिन तक बडे प्रेमसे करते रहे। पीछे वृन्दावन जाकर पण्डित बाबाके साथ दाऊजीकी बगीचीमें रहने लगे। पण्डित बाबाके धाम पधारनेके पश्चात् दाऊजीकी बगीचीके सामने भागवत-भवनके प्रांगणके कोनेमें एक कुटियामें रहने लगे। उन्होंने सारा जीवन लोगोंके विशेष आग्रह करनेपर भी न अपनी कुटियाका कहीं निर्माण किया और न कुछ संचय किया। देहकी रक्षाके लिए व्रजवासियोंके टूक छोड़ और किसी वस्तुका कभी सहारा नहीं लिया। जिसने अपने जीवनको प्रारम्भसे ही पूर्णरूपसे राधारानीके चरणोंमें समर्पित कर दिया हो, उसे देह-गेह, आहार-विहारकी चिन्ता कैसी ? उसका योग-क्षेम तो वे स्वयं करती हैं।

अपनी ओरसे शरीरकी उपेक्षा करते हुए भी बाबा ११२ वर्ष तक जीवित रहे और लगभग अन्त तक पूर्ण स्वस्थ और प्रसन्न रहे। उन्हें अप्रसन्न या विषादकी मुद्रामें कभी किसीने नहीं देखा। उन्हें यदि कोई कटु शब्द भी कह देता तो वे हँसते रहते। लगता कि वे ऐसी धातुके बने हैं, जिसे कटुता स्पर्श ही नहीं करती। उनकी शारीरिक और मानसिक स्वस्थता देख लोग आश्चर्य करने लगते कि केवल व्रजवासियोंके टूकपर रहनेवाला बिना घर-द्वारका यह बाबाजी इतना स्वस्थ और प्रसन्न कैसे रहता है ? पर, इसका एक सीधा कारण था, वे राधा-प्रेमामृतरूपी टॉनिकका पान करते थे और कुपथ्यसे सदा दूर रहते थे। सांसारिक विषयोंका भोग या उनकी अपेक्षा ही वह कुपथ्य है, जिससे मनुष्यका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ता है।

पर, बाबाकी संसारसे निरपेक्षता इतनी प्रबल थी कि कुपथ्यका उनके लिए प्रश्न ही नहीं उठता था।

बाबाके अन्तिम जीवनके २०-२५ वर्ष भागवत-निवासमें ही बीते। देह त्यागनेके ४-५ वर्ष पूर्व उनका शरीर शिथिल पड़ गया था। पर, उनकी स्थिति परमहंसोंकी-सी रहने लगी थी। वे संसारको पूर्णतः भूल चुके थे। उन्हें अपने शरीर तककी सुध न रहती। क्षुधा-तृष्णाका भी भान न होता। हर समय 'राधे-राधे, हा राधे!' रटा करते। अकसर 'हा राधे, हा प्राणेश्वरी!' कह उच्च स्वरसे रोदन करने लगते। उनकी वेदना भरी चीख सुन ऐसा कौन व्यक्ति है, जिसका हृदय विदीर्ण न हो जाता, जिसमें उनका भाव संक्रमित हो उसे अनजाने प्रेमके दो आँसू बहानेको विवश न कर देता ! ऐसी अवस्थामें उनकी देखभाल करने और उनका आहार-विवश न कर देता!

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

ऐसी अवस्थामें उनकी देखभाल करने और उनका आहार-विहार चलानेके लिए राधारानीने अपने प्रिय सेवक श्रीविष्णुदास बाबाको शिष्य रूपमें उन्हें दे रखा था। वे प्राणसे उनकी सेवा करते। पर, कभी-कभी उनकी

अवस्था देख चिन्तामें पड़ जाते। कई-कई दिन उन्हें बिना आहार और निद्राके प्राणेश्वरीकी यादमें रोते-चीखते बीत जाते। पर, अधिकांश वे लीला-चिन्तन करते हुए राधारानीके सेवासुखमें डूबे रहते। बाहरसे देखकर यह निर्णय करना मुश्किल होता कि वे सो रहे हैं, या जाग रहे। जब बहुत समय ऐसे बीत जाता और उन्हें कुछ खिलाने-पिलानेके उद्देश्यसे थोडा हिलाया जाता, तो चौंककर कहते- 'क्या करते हो ? राधे-राधे करो।' उस अवस्थामें उनका राधा-नाम बराबर चलता रहता। यदि उन्हें दो घंट जल जबरदस्ती पिलाया जाता, तो वह भी नामके साथ ही गलेसे नीचे उतरता। राधा-नाम उन्हें सिद्ध हो गया था।

इस बीच बाबाके सिरमें कारबंकिल फोड़ा हो गया। शरीरमें और भी कई जगह फोडे हो गये, पर उनका राधा-नाम और चिन्तन पूर्ववत् चलता रहा। उन्हें फोडोंके कारण वेदना तो होती ही होगी, पर इसका उन्हें अनुभव होता हो, इसका उन्होंने कभी कोई संकेत नहीं किया। उन्हें इंजेक्शन दिये जाते, उसका भी उन्हें कोई भान होता प्रतीत न होता।

सन् १९७७ के भाद्रमासके शुक्लपक्षकी अष्टमीको श्रीराधाष्टमी थी। उस दिन यदुनन्दन बाबाको अपनी जन्मभरकी राधा-आराधनाका फल मिलना था। प्रातः कालसे वे चिन्तनमें दिव्य व्रजधामके अन्तर्गत मणिमय वृष्णभानुपुरमें सखियों द्वारा की जा रही राधारानीके अभिषेककी तैयारियोंका दर्शनकर रहे थे। अभिषेककी सामग्री एकत्र कर ली गयी थी। शृङ्गारके लिए दिव्य वस्त्र और सुगन्धित पुष्पोंके भाँति-भाँतिके आभूषण यत्नसे तैयार कर रख दिये गये थे। स्नान-बेदी पुष्पोंसे सजा दी गयी थी। राधारानीके पधारनेके प्रतीक्षा थी।

बाबा जब इस प्रकार चिंतनमें डूबे थे, उनका शरीर निश्चल, निस्पंद अवस्थामें शैय्यापर पड़ा था। श्वासकी गति बहुत धीमी पड़ गयी थी। विष्णुदास बाबाको यह देख चिन्ता हुई। उन्होंने भक्तप्रवर डॉ० अमरसेनको बुलवा भेजा। वे भागे आये। उनकी परीक्षा करनेके पश्चात् बोले- 'बाबा लगभग ठीक हैं। चिन्ताकी कोई बात नहीं। अभी मैं जा रहा हूँ। राधारानीका अभिषेक करनेके पश्चात् फिर आऊँगा।'

बाबाको डॉ० सेन द्वाराकी गयी परीक्षाका कोई पता नहीं। वे अब भी चिन्तनमें डूबे राधारानीके स्नान-बेदीपर पधारनेकी प्रतिक्षा कर रहे थे। अभिषेकका समय आ गया। राधारानी सुरसाल वाद्यों और नर्तकियोंके नूपुरोंकी सुमधुर झंकारके बीच शुभ्र

वस्त्रोंमें चाँदनीकी-सी छटा बिखेरती हुई बेदिकापर आ विराजी। सुगन्धित जलसे उन्हें स्नान करा, नीलाम्बर पहना, शृङ्गार-बेदीपर ले जाया गया। शृंगारके पश्चात् पौर्णमासीदेवी, कीर्तिदा, यशोदा और रोहिणी माँ आदिने आशीर्वाद दिया। मध्याह्नमें प्रफुल्ल-बदना यूथेश्वरियाँ छम-दम करती अपने-अपने उपहार लेकर आने लगीं। उसी समय १२ बजकर २० मिनटपर यदुनन्दन बाबा भी अपने सिद्ध मञ्जरी देहसे वहाँ पहुँच गये! उपहारमें उन्होंने अपने-आपको राधारानीको समर्पित कर दिया। राधारानीने अपने चरण-कमल उनके मस्तकपर रख उन्हें अंगीकार किया। उनका जड़-देह जहाँ था वहीं पड़ा रह गया!

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

श्रीयदुनन्दनदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।