ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 85

श्रीस्वामी रूपमाधुरीशरणजी

श्रीस्वामी रूपमाधुरीशरणजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीस्वामी रूपमाधुरीशरणजी
श्रीस्वामी रूपमाधुरीशरणजी — ब्रज के भक्त भाग 3

श्रीस्वामी रूपमाधुरीशरणजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

गुरु-सान्निध्य और आध्यात्मिक शिक्षा

[ वृन्दावन ]

श्रीस्वामी रूपमाधुरीशरणजीका जनम सम्वत् १९५५ में ज्येष्ठ मासकी शुक्ल २ को जयपुरके एक कुलीन माहेश्वरी तोषनीवाल वंशमें हुआ था। आपके का नाम था श्रीदामोदरजी और माताका श्रीमती गणेशी देवी। दोनों बड़े परायण और सत्संगी थे।

श्रीरूपमाधुरीजीकी प्रारम्भसे ही भजन-साधनमें विशेष रुचि थी। इसलिए उन्ने शिक्षाकी ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। पर, उन्हें हिन्दी, संस्कृत और आजका सामान्य ज्ञान था। उन्होंने अपनी शिक्षाके सम्बन्धमें लिखा है

पढ़ो लिखो मैं कछु नहीं, मूरख हूँ मतिहीन । हरिदासन को दास हूँ, रूप माधुरी दीन ।।

विद्यामें व्युत्पन्नता न होते हुए भी विद्याका जो चरम-फल है - सरलता, महानता, विषय-वैराग्य, दैन्य और भक्ति-वह सब उनकी नैसर्गिक सम्पति था। कोटी अवस्थामें ही उन्होंने शुक सम्प्रदायके प्रसिद्ध रसिक सन्त श्रीसरसमाधुरीजी स्वराजसे दीक्षा प्राप्त कर ली और आजीवन ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए भक्ति-पथका पथिक बननेका निश्चय कर लिया। उन्होंने स्वयं तो भक्ति-पथका अवलम्बन किया ही, जयपुरके असंख्य लोगोंको वे अपने निवास-स्थानपर प्रति वारको सत्संगका आयोजन करते। कभी-कभी नगर-कीर्तन द्वारा मोह-निद्रामें पड़े जयपुरवासियोंको झकझोर कर जगा देते, उनसे तुलसीदासकी अग्रांकित पंक्तियोंको दहराते हुए हरिनामका दीपक जलाकर अपने हृदयके अन्धकारको दूर करनेका आग्रह करते -

'श्रीस्वामी बलदेवदासजीके कुछ फुटकर पद भी पाये जाते हैं।

राम नाम मनिदीप धर जीह देहरी द्वार ।

तुलसी भीतर बाहिरै जौ चाहे उजियार ।।

उनकी गुरुभक्ति सराहनीय थी। जयपुरम ही शुक सम्प्रदायका एक प्रमुख स्थान है. जहाँ श्रीसरसमाधुरीजी रहते थे। वे उनके सानिध्यमें रहकर उनकी अधिक-से-अधिक सेवा करते। गुरु-स्थानके सभी उत्सवोंमें उनका महत्त्वपूर्ण योगदान होता। सरसमाधुरीजीके संगके प्रभावसे उनका सरस हृदय और अधिक सरस हो गया। वे राधा-कृष्णकी अष्टयाम-लीलाके चिन्तनमें तल्लीन रहने लगे।

गुरुदेवकी आज्ञासे उन्होंने श्रीगोपालमन्त्रके १८ पुरश्चरण किये। पुरश्चरणके दिनोंमें वे केवल दूध पीकर और मौन धारण करते रहते। गुरुवारको सत्संगके समय मौन तोड़ देते। पुरश्चरणके समय एक दिन उन्होंने एक विचित्र अनुभव हुआ। उन्होंने सुनी बहुत बाजोंकी गगनभेदी ध्वनि। वह ध्वनि धीरे-धीरे उनके घरके निकट आती जान पड़ी, जैसे कोई बड़ी बारात चली आ रही हो। थोड़ी देरमें उन्होंने देखा बाजोंके साथ एक देवी और उसके अनेक गणोंको घरके भीतर प्रवेश करते। देवी उनके सामने आकर खड़ी हो गयीं, उनका कुछ अनिष्टि करनेके उद्देश्यसे। पर, वे निर्विघ्न मन्त्र जप करते रहे। उसी समय अकस्मात् देवी और उसके गणोंमें भगदड़ मच गयी श्रीशुकदेवजीको आते देख।

शुकदेवजीने पधारकर देवीसे तो उनकी रक्षा की ही, उनके मस्तकपर अपना वरदहस्त रखकर आशीर्वाद भी दिया।

शुकदेवजीका आशीर्वाद प्राप्त करनेके पश्चात् उनका गृहस्थमें रहना असम्भव हो गया। उन्होंने शुक सम्प्रदायकी संगरूरकी गद्दीके महन्त श्रीबालमुकुन्ददास महाराजसे संन्यास-दीक्षा ली और शेष जीवन वृन्दावनमें एकान्त भजनमें व्यतीत करनेके उद्देश्यसे वृन्दावन चले गये। वहाँ युगलघाटपर 'सरजकुञ्ज' के नामसे एक स्थानका निर्माण किया। उसमें युगल सरकारकी प्रतिष्ठा कर उनकी रसमयी सेवाकी व्यवस्था की।

सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ

वृन्दावनमें भी वे भगवत्स्वरूपों और आचार्योंकी जयन्तियाँ बड़े उत्साहसे मनाते। सन्तोंकी सेवा भी खूब करते, पर यह सब करते हुए भी जगत्‌के प्रपंचसे दूर रहते। एक पल भी बिना भजनके न जाने देते-

जग प्रपञ्च परस्यो नहिं, करि वृन्दावन वास ।

निमिष न खोयो भजन बिन रूप माधुरी दास ।।

(श्रीजगदीश राठौर)

उन्होंने शुक सम्प्रदायको श्रीरामसखोजीके अप्रकाशित (गुप्त) वाणीगन्ध फिरस मञ्जरी'का अपने गुरुजीके पास अध्ययन किया था। उसीके अनुसार वे ३ बजेसे राधा-कृष्णकी अष्टयाम लीला-चिन्तनमें लगे रहते। साथ-साथ राधा' नामका जप करते। राधा-कृष्णके भक्त होते हुए भी वे राधारानीके अनन्य उपासक थे, जैसा कि राधाजीके प्रति उनके कुछ विनय सूचक पदोंसे विदित है -किशोरी मैं तो भली-बुरी सो तेरी।

अब जिन करो अबेर लड़ैती, रखियो चरणन नेरी । अवगुण मेरे सकल बिसारो, जानि आपनी चेरी ।।

भक्तिरस-मञ्जरीके अनुसार राधाजीकी उपासना ही सर्वोपरि है-

साधन एक अनूप है, सो मैं कहत सुनाय । राधा, राधा भजन सम, दूजो नाहिं उपाय ।।

(भक्तिरस मञ्जरी)

औरूपमाधुरीजी बोलते बहुत कम थे। खाते-पीते भी उतना ही थे, जितना शरीर-धारण करनेके लिए नितान्त आवश्यक समझते थे। उनके स्थानमें जगह भी इतनी ही थी, जितनी उनके और उनके कुछ शिष्योंके रहनेके लिए आवश्यक थी। उसका विस्तार करनेके लिए जब कोई धन देना चाहता, तो उसे अस्वीकार कर देते। रातमें किसीको अपने स्थानपर ठहरने न देते।

वृन्दावन आनेके पश्चात् उनका परिवार बहुत बढ़ गया। अनेकों शिष्य हो गये। शिष्य-सेवक बराबर उनके स्थानपर जाते रहते, पर उनके आनेसे उनके अपने कार्यक्रममें कोई अन्तर न पड़ता। घड़ीकी सुईके अनुसार नियमित समयपर ठाकुर-सेवा, प्रसाद-सेवा, भजन-कीर्तनादि होता रहता। सभीको उसके अनुसार चलना पड़ता। प्रसादादिके समय यदि कोई न पहुँच पात, तो उससे वंचित रहता। गरीब-अमीर, छोटे-बड़े सभीके साथ उनका व्यवहार एक-सा होता।

वे बड़े सत्संगप्रेमी थे। साम्प्रदायिक भेदभाव उनमें लेशमात्र भी न था। सभी सम्प्रदायोंके ऊँचे सन्तोंका वे सत्संग करते थे। गौड़ीय सम्प्रदायके पण्डित रामकृष्णदास बाबाजी, श्रीगौरांगदास बाबाजी, श्रीपाणकृष्णदास बाबाजी, श्रीअवधदास बाबाजी, और निम्बार्क सम्प्रदायके श्रीहंसदासजी तथा प्रियाशरणजीसे उनकी विशेष प्रीति थी। उन्होंने 'श्रीनवसन्तमाल' नामक अपने ग्रन्थमें ४१ सन्तोंका उल्लेख किया

है, जिनका उन्होंने सत्संग किया। उनमें से प्रत्येकका गुणगान करते हुए उन्होंन उनपर कवित्त लिखे हैं, जैसे श्रीगौरांगदास बाबाजीके सम्बन्धमें उन्होंने लिखा है-

रहते बंगदेश खास, अब कीनों व्रजवास, जिनकी वाणी रसरास, सन्त गौरांगदासजू ।

गौरहरि नित गावे, लाल-ललीको लड़ावे, संग किये प्रेम प्यावे, छटी, मोह-माया फाँस जु ।

राधा नामके उपासी सखीभाव सुखीरासी, सेवा मानसी विलासी, सुख पावे गये पास जु ।

सम्पत्ति लाखनकी त्यागी, ऐसे भारी अनुरागी, ये तो पूरे बड़भागी, बन्दै रूपदास जु ।

भजन और सत्संगके प्रभावसे रूपमाधुरीजीकी चित्तवृत्ति युगलके चरणोंमें अधिकाधिक लीन रहने लगी। धीरे-धीरे ऐसी स्थिति हो गयी कि सोते-जागते, चलते-फिरते हर समय युगलकी नयी-नयी रूपमाधुरीका सहज ही आस्वादन होने

व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ

लगा-

सुरत भई सहजानन्दमई ।। टेक ।।

या सुख आगे कहुँ कछु नाहीं, दुबिधा दूर भई । सोवत जागत, डोलत-बोलत, छिन छिन मौज नई ।। युगल लालकी सरस रूप छवि, मो उर माहिं छई । 'रूपमाधुरी' गुरु कृपा करि, ऐजी मौज दई ।।

उस समयकी उनकी अलौकिक स्थितिका कुछ अनुमा

पाया जा सकता है

उस समयकी एक-दो घटनाओंसे जो उनके द्वारा घटीं। श्रीसरसमाधुरीजीके शिष्य राँचीके श्रीरामचरणजी भाला उनमें गुरुबुद्धि रखते थे। जब सम्भव होता वे गुरुपूर्णिमापर उनका पूजन करते थे। एक बार वे आषाढ़के महीनेमें सपरिवार वृन्दावन आये। गुरुपूर्णिमासे कुछ पहले बिना किसीसे कुछ कहे वृन्दावनसे निकल

पड़े मुजफ्फरनगरके निकट शुकताल जानेके उद्देश्यसे, जहाँ शुकदेवजीने राजा परीक्षितको श्रीमद्भागवत् कथा सुनायी थी और श्रीशुक-सम्प्रदायके आचार्य श्रीचरणदासजी महाराजको मन्त्र दिया था। वहाँ श्रीशुकदेवजीके मन्दिरमें शुकदेवजीके दर्शनकर गुरुपूर्णिमा तक वे वृन्दावन लौट आना चाहते थे।

श्रीनन्दकिशोरदास गोस्वामी प्रभु

उनकी पत्नी श्रीमती सुरजबाईको बहुत चिंता हुई। उन्होंने जब रूपमाधुरीजीसे उनके अकस्मात अन्तर्धान हो जानेकी बात कही. तो उन्होंने कहा- ' चिंता मत करो। वह शीघ आ जायगा।'

पुर्णिमाके एक दिन पूर्व रामचरणजी मार्गमें किसी बीहड जंगलमें भटक गये। श्रीरूपमाधुरीजीका पूजन कर सकेंगे, बहुत दुःखी होने लगे। उसी समय एक यह सोचकर कि अब वे गुरुपूर्णिमापर न तो शुकताल ही पहुँच सकेंगे न बुडसवार वहाँ आ निकला। उसने पूछा- 'आप यहाँ कैसे भटक रहे हैं?' उन्होंने अपनी दुःखभरी कहानी कह सुनायी। तब घुड़सवारने कहा- 'आप चिंता न करें। मथुराकी ओर ही जा रहा हूँ। आपको वृन्दावन पहुंचा दूँगा।' वे उसके पीछे श्रीरूपमाधुरीजीने कहा 'गुरु-पूजा वहीं क्यों न कर लो, जहाँ गया था ? जानता घोडेपर बैठ लिये और दसरे दिन प्रातः वृन्दावन पहुँच गये। उन्हें देखते ही श्रीं तुझे यहाँ लानेके लिए ठाकुरजीको घुड़सवार भेजना पड़ा।'

श्रीराधाकृष्णदासजी, जो आजकल श्रीरूपमाधूरीजीके स्थानके महन्त हैं, उस समय उनके ठाकुरकी सेवा किया करते थे। उन्हें हैजा हुआ और वृन्दावनके हैजा अस्पतालमें दाखिल किया गया। अस्पतालमें उनकी मृत्यु हो गयी। सन्ध्या समय अस्पतालसे रूपमाधरीजीको खबर भेजी गयी। खबर पाकर वे बहुत दुःखी हुए। मन-ही-मन श्रीचरणदासजी महाराजसे कहने लगे- 'यह आपने क्या किया ? मेरी अवस्था ठाकूर-सेवा करने लायक है नहीं। अब सेवा कैसे होगी. आप जाने।' अस्पताल उन्होंने कहला दिया- 'इस समय मेरे पास आदमी हैं नहीं। प्रात: शवको उठानेकी व्यवस्था कर दी जाएगी।' प्रातः जब लोग इस व्यवस्थामें लगे हए कथे, डॉक्टरके यहाँसे संवाद आया- 'मरीज अब जीवित दीख रहा है। आप कोई व्यवस्था न करें।'

कार्तिक कृष्ण १४ सम्वत् २०३२ को सतहत्तर वर्षकी आयुमें श्रीरूपमाधुरीजीने नित्य धाममें प्रवेश किया।

उनके प्रमुख शिष्योंमें हैं श्रीराधाकृष्णदासजी और श्रीवंशीदासजी। उनकी वाणियोंका संग्रह 'श्रीरूपमाधुरीजीकी वाणी के नामसे प्रकाशित है। कई और भी छोटे-छोटे ग्रन्थ उन्होंने लिखे हैं, जिनमें मुख्य हैं- (१) श्रीगुरुपरत्व, (२) श्रीशुकमहत्त्व, (३) चरणावत-वैष्णव-सदाचार (४) शुक-सम्प्रदाय-रहस्य,

(५) तिमिर-प्रकाश, (६) नवसन्तमाल।

गुरु और साधना — जीवन-संदेश

गुरु के प्रति श्रद्धा और साधना में निरंतरता भक्ति-परंपरा के प्रमुख विषय हैं। इस चरित्र को पढ़ते समय यह देखना उपयोगी है कि सीख और आचरण किस तरह एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

कथा का सार

श्रीस्वामी रूपमाधुरीशरणजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।