ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 84

श्रीस्वामी बलदेवदासजी

श्रीस्वामी बलदेवदासजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीस्वामी बलदेवदासजी
श्रीस्वामी बलदेवदासजी — ब्रज के भक्त भाग 3

श्रीस्वामी बलदेवदासजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ वृन्दावन ]

जगत्‌का नियम है- पहले साधन, पीछे सिद्धि; पहले कुआँ खोदना, फिर पानी पीना। पर, परमार्थ जगत्में कभी-कभी इसका उल्टा होता है - पहले सिद्धि होती है, पीछे साधना होती है। भगवान्‌के नित्य-सिद्ध या कृपा-सिद्ध भक्तोंके जीवनमें ऐसा ही होता है। उनके नित्य-सिद्ध परिकरोंको सिद्धिके लिए साधना नहीं करनी होती। सिद्धि तो उन्हें अनादिकालसे ही प्राप्त रहती है। वे जगत्में आविर्भूत होते हैं भगवदिच्छासे जगत्‌के जीवोंके लिए साधनाका आदर्श उपस्थित करने। श्रीस्वामी बलदेवदासजी

कृपासिद्ध जीवोंको भी सिद्धि प्राप्त करनेके लिए साधना नहीं करनी होती। उनपर बिना साधन-सापेक्ष है ही नहीं। भगवान् परम स्वतन्त्र हैं। जिसपर इच्छा होती है कृपा करते हैं। कभी-कभी ऐसे व्यक्तिपर भी अनायास कृपा कर देते हैं. जिसने कोई साधन-भजन किया ही नहीं। पर, जब उसके ऊपर कृपा हो जाती है, तब वह साधन-भजनके सिवा और कुछ करता ही नहीं। उसपर पहले कृपा होती है पीछे उसका भजन होता है। श्रीस्वामी बलदेवदासजीके जीवनमें भी ऐसा ही हुआ। उन्हें बाल्यावस्थामें ही पहले भगवत्प्राप्ति हुई। फिर अबाध गतिसे वह चली उनके भजन-साधनमय पावनजीवनकी निर्मल धारा।

वजके किसी ब्राह्मण परिवारमें जन्म लेकर वे आठ वर्षकी अवस्थामें ही बड़े भाईकी मृत्युके पश्चात् वीतराग हो घरसे निकल पड़े और द्वारिका जानेवाले साधुओंकी मण्डलीके साथ हो लिये। द्वारिकामें जब रणछोरजीके मन्दिरमें गये, रणछोरजीका भोग लग रहा था। मन्दिरके दरवाजेपर परदा पड़ा हुआ था और पुजारी जगमोहनमें इधर-उधर डोल रहा था। उस समय बलदेवदासजीको एकाएक जाने कैसा आवेश हुआ, वे पुजारीकी पीठ मुड़ते ही परदा उठाकर मन्दिरके भीतर घुस गये। वहाँ उन्हें रणछोरजीके साक्षात् दर्शन हुए। उन्होंने देखा कि मूर्तिरूपमें तो वे सिंहासनपर विराजमान हैं और प्रत्यक्षरूपमें नीचे बैठे भोग आरोग रहे हैं। वे तन्मय हो, उनका रूप निहारते रहे। थोड़ी देरमें जब भोग आरोगनेवाले स्वरूप अन्तर्धान हो गये, वे भी चुपकेसे बाहर निकल आये।

उन्हें न मन्दिरके भीतर जाते किसीने देखा, न बाहर आते। इसलिए किसीके द्वारा रोक-टोक या डॉट-फटकार भी नहीं की गयी। जिसे रणछोरजी स्वयं भीतर बुलाकर दर्शन देना चाहें और जिसका मार्ग उनकी शक्ति योगमाया अपने-आप प्रशस्त कर दें, उसे किसीके द्वारा रोका जाना सम्भव ही कब है ?

उसी दिन रातमें रणछोरजीने बलदेवदासजीको स्वप्नमें आज्ञाकी 'दिल्लीके निकट लुकसर ग्राममें ठाकुरदास नेरा परम भक्त रहता है। उससे जाकर दीक्षा लो और वह जिस रीतिसे उपदेश करे, उस रीतिसे भजन करो, उधर ठाकुरदासजीको भी उन्होंने इसी प्रकार आज्ञा देकर कहा- 'मेरा भक्त बलदेवदास तुम्हारे पास आ रहा है। बालक जानकर उसकी उपेक्षा न करना। उसे दीक्षा देकर भजनकी रीति बता देना।'

रणछोरजीने जिसके लिए इतना किया, उसका दिल्लीका मार्ग भी अपने-आप प्रशस्त हो जाना था। द्वारिकाजीमें बालक बलदेवदासकी भेंट हुई कुछ चरणदासजी

सन्तोंसे, जो दिल्ली जा रहे थे। उन्होंने प्रेमसे उसे ठाकुरदासजीके पास ले चलनेका आश्वासन दिया। वह उनके साथ वहाँ पहुँच गया। उसे देखते ही ठाकुरदासजीने कहा- 'आओ वत्स, मैं तुम्हारी प्रतीक्षामें था' और उसे हृदयसे लगा लिया। मन्त्र-दीक्षा देकर भजनकी रीतिका उपदेश किया।

बलदेवदासजी उनके पास रहकर उनकी और उनके ठाकुर श्रीयुगलबिहारीजीकी तन-मनसे सेवा करने लगे। उस अल्पावस्थामें ही उन्होंने ठाकुर-सेवाकी सारी विधि सीख ली। यूगलबिहारीजीकी रसोई भी वह स्वयं बनाने लगे।

सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ

ठाकुरदासजी एक उच्चकोटिके सन्त थे। उनके सम्बन्धमें एक घटना प्रसिद्ध है। एक बार उनके आश्रममें एक अभ्यागतका अचानक देहान्त हो गया। पुलिसने आश्रमवासियोंको परेशान करना शुरू किया। उस समय ठाकुरदासजीने मुर्देको अपनी खड़ाऊँसे ठोकर मारते हुए कहा- 'उठ, ऐसे क्यों पड़ा है साधुओं को परेशान करनेके लिए।' वह झट उठ खड़ा हुआ। तभीसे लोग उन्हें एक सिद्ध सन्तके रूपमें जानने लगे।

वे मानसी सेवामें दो-दो दिन एक ही आसनपर बैठे रह जाते। उन्हें देहकी बिलकुल सुध न रहती। प्रसाद-सेवन करते समय वे कभी रोदन करने लगते, कभी बहुत प्रसन्न होने लगते। बलदेवदासजी यह देखकर विस्मयमें डूब जाते। जब वे उनसे इसका कारण पूछते, तो वे टाल जाते। एक दिन उन्होंने इसका रहस्य जाननेका बहुत हठ किया। तब ठाकुरदासजीने कहा- 'जब मैं भोजन करता हूँ, तब गोपालजी भी मेरे साथ बैठकर मेरे थालमें-से भोजन करने लगते हैं। मैं कभी यह सोचकर रो देता हूँ कि गोपालजी मेरा जूठा खाते हैं, कभी यह सोचकर प्रसन्न होता हूँ कि वे मुझसे कितना प्रेम करते हैं।' ठाकुरदासजी बलदेवदासजीको अपने

इस प्रकारके अनुभवोंकी बातें अकसर बताया करते। बलदेवदासजीपर इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। उनका भक्तिभाव गुरुदेवके सान्निध्यमें दिन-पर-दिन बढ़ता गया। वे भी गुरुदेवकी तरह मानसिक चिन्तनमें लीन रहने लगे।

कुछ दिन पश्चात् ठाकुरदासजी धाम पधार गये। बलदेवदासजी उनके स्थानके महन्त हुए। महन्ताईका भार वे अधिक दिन तक न झेल सके। उसे अपने गुरुभाई श्रीध्यानदासजीपर डाल केवल गुरुदेवकी खड़ाऊँ लेकर वे भ्रमण के लिए निकल पड़े। चारों धामोंकी यात्रा की। उसके पश्चात् अधिकतर वृन्दावनमें कालीयदहपर या

व्यासपेरेमें सन्त गोविन्ददासजीके पास रहने लगे। उन्होंने अपने लिए कभी किसी कुटियाका निर्माण नहीं किया।

उन दिनों शुक-सम्प्रदायके दिल्ली गुरुद्वारेके रसिक सन्त श्रीमोहनदासजी जिनका 'प्रेम पयोधि' नामका ग्रन्थ है. वन्दावनके युगल घाटपर ग्वालियर वाले प्राचीन मन्दिर में आकर रहा करते। उनका संग बलदेवदासजी अधिक-से-अधिक करते और उसमें अनिर्वचनीय सुखका अनुभव करते। दोनों सन्त प्रिया-प्रियतमकी समयी बातें करते-करते भाव-समाधिमें डूब जाते।

बलदेवदासजी नित्य प्रातः ३ बजे वृन्दावनकी परिक्रमाको जाया करते। एक दिन परिक्रमाके मार्गमें उन्होंने देखा कि एक जगह बड़ा भण्डारा हो रहा है और सेहत से साधु बैठे प्रसाद पा रहे हैं। उन्होंने बलदेवदासजीसे भी प्रसाद पानेको कहा।

देवदासजीने कहा- 'मैं इस समय प्रसाद नहीं पाऊँगा।'

'तो परोसा लेते जाओ' उन्होंने आग्रह करते हुए कहा। बलदेवदासजीने परोसा अंगोछेमें बाँध लिया। कुटियापर पहुँचकर नित्य-नियमसे निवृत्त हो जब अंगोछा खोला, तो यह देखकर वे आश्चर्यचकित हुए कि उसमें अखाद्य भरा है। - उत्ोंने अँगोछे सहित उसे फेंक दिया और फिरसे यमुना-स्नान कर अपने आपको पवित्र किया।

दूसरे दिन जब वे फिर परिक्रमाको गये, तो साधु-रूपमें उन भूतोंकी मण्डलीसे फिर उनकी भेंट हुई। वे कौतूहलवश रुककर उनसे बातें करने लगे। उन्होंने कहा- 'क्या तुम बता सकते हो, तुम्हारी ऐसी गति क्यों हुई ?"

उत्तरमें उन्होंने कहा- 'हम वृन्दावनके ही हैं। हमने ठाकुर-सेवाके लिए प्राप्त धन और सामग्रीका स्वयं उपभोग किया था, इसलिए हमें यह योनि प्राप्त हुई है। वृन्दावनमें रहनेके कारण यमराजका हमारे ऊपर अधिकार नहीं था। वे हमें न ले जा सके, इसलिए धाममें रहकर ही हम भूतेश्वरके शासनमें अपने कियेका फल भोग रहे हैं।'

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

बलदेवदासजी अच्छे संगीतज्ञ थे। वे नित्य तानपूरेपर आवेशमें देर तक ठाकुरजीके सामने गान करते थे। श्रीमद्भागवत्का नित्य पाठ करते थे और एक हजार दानोंकी तुलसीकी मालापर नाम-जप करते थे। जपके साथ प्रेम-मञ्जरीके आनुगत्यमें मानसिक-स्मरण करते थे। व्रजकी लताओंके नीचे बैठकर लीला-स्मरण करना उन्हें बहुत अच्छा लगता था। कभी-कभी किसी लताके नीचे बैठकर स्मरण करते उन्हें सारा दिन बीत जाता था। क्षुधातृष्णाका भी लोप हो जाता था।

एक बार वे बरसाने गये हुए थे। वहाँ विलासगढके निकट लताओंके नीचे बैठे भजन कर रहे थे। भजनमें इतना आवेश हो गया कि वे लगातार तीन दिन तक उसे स्थानपर बैठे भजन करते रहे। उनकी अयाचक वृत्ति थी। किसीसे खानेके लि कुछ माँगनेका प्रश्न ही न था। किसीके यहाँ जाकर उन्हें कुछ दे आनेका भी प्रश्न स्वप्नमें कहा- 'मेरा अनन्य भक्त बलदेवदास विलासगढके निकट तीन दिनसे नहीं था, क्योंकि उनका किसीको पता ही न था। उस समय श्रीराधारानीने पुजारीले भूखा पड़ा है। उसे मेरा प्रसाद पहुंचा दो।' पुजारीने तुरन्त श्रीजीकी आज्ञाका पालन किया।

क शरीर

बलदेवदासजीने प्रेमाश्र विसर्जन करते हुए श्रीजीका प्रसाद प्रेमसे ग्रहण किया। फिर प्रतिष्ठाके भयसे तुरन्त उस स्थानको छोड वे गहवरवन चले गये। वहाँ

एकान्तमें रो-रोकर श्रीजीसे कहने लगे - 'हाय करुणामयी ! तुम इस अधमपर इतनी कृपा करती हो। फिर अदृश्य रहकर विरहकी वेदना क्यों देती हो ? परोक्षमें कृपाकर उत्कण्ठाका वर्धन करती हो। प्रत्यक्षमें दूर रहकर प्राणोंका मर्दन करती हो। कब तक इस तरह प्यास बढ़ाकर बिना बुझाये तड़पाती रहोगी स्वामिनी ?'

इस प्रकार मन-ही-मन जब वे आक्षेप कर रहे थे, उन्होंने राधारानीको देखा सखियों सहित वन-बिहारमें फूल चयन करते और उनकी और प्यारसे दृष्टि फेरकर कहते- 'मैं दूर कब हूँ तुझसे पगली ?'

तभीसे उनकी स्वरूप-सिद्ध हो गयी और वे सिद्ध देहसे मञ्जरी रूपमें राधा-कृष्णकी अष्टकालीन-सेवामें तल्लीन रहने लगे। बाहरी सेवा-पूजा उन्हें कुछ भारस्वरूप लगने लगी। वे किसी योग्य शिष्यकी कामना करने लगे जिसे अपने ठाकुर और गुरुदेवकी पादुका सौंप सकें। उसी समय उन्हें श्रीजीकी प्रेरणा हुई अलवरके पास बहादुरपुर जानेकी, जहाँ चरणदासी सन्त श्रीडण्डौती रामजीका स्थान और उनके बिहारीजीका मन्दिर है। वहाँ श्रीशिवदयालजी नामके एक नवकिशोर अपनी ननिहालमें रहकर विद्याध्ययन करते थे। उनकी बिहारीजीके मन्दिरमें बलदेवदासजीसे भेंट हुई। बलदेवदासजी जान गये कि उनके द्वारा भविष्यमें चरणदासी सम्प्रदायका विशेष उत्कर्ष होगा। इसलिए उन्हें शिष्य बनाकर और उन्हींको अपने ठाकुर और गुरुदेवकी पादुका सौंपकर वे निश्चिन्त हुए।

वहीं श्रीसरसमाधुरी शरणजीके नामसे चरणदासी सम्प्रदायमें एक प्रसिद्ध रसिक सन्त हो गये हैं।

पादुक्का और अपने सेवित श्रीविग्रहको सरसमाधुरीजीको सौप देने के पास अपने शरीरके सिवा और कुछ न रह गया। सरसमाधुरी अपनी इस अलौकिक सम्पत्तिको सौंप देना इस बातका संकेत था कि वे श्री वसुन्धराको सौंपकर अपनी लीला संवरण करने जा रहे हैं। तदनुसार २०१९५८, आषाढ सुदी नवमीको उन्होंने अपनी लौकिक लीला संवरण कर दिव्य लीलामें प्रवेश किया।

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

श्रीस्वामी बलदेवदासजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।